- प्रदर्शन में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के नेतृत्व ने विपक्षी दलों के बीच असंतोष उत्पन्न किया है
- INDIA ब्लॉक के साझा प्रदर्शन में समन्वय की कमी के कारण सहयोगी दलों ने गांधी परिवार के दबदबे पर आपत्ति जताई है
- राहुल गांधी ने तीन दिनों में लगभग साढ़े छब्बीस घंटे सड़क पर प्रदर्शन में बिताए, जिससे उनकी चर्चा अधिक हुई है
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन का चेहरा क्या अब अकेले राहुल गांधी ही बन गए हैं. कॉकरोच जनता पार्टी ने भी प्रदर्शन का ऐलान किया है, लेकिन विपक्षी दलों की बात करें तो उनमें सिर्फ राहुल गांधी ज्यादा लाइमलाइट में नजर आ रहे हैं. इसे लेकर महाराष्ट्र में ठाकरे सेना से लेकर यूपी में अखिलेश यादव की सपा तक असहज हैं. ऐसे में यह सवाल पूछना वाजिब है कि क्या विरोध प्रदर्शन अब राहुल गांधी का वन मैन शो बन गया है, जबकि अन्य विपक्षी नेता पीछे हैं. इसे लेकर आम आदमी पार्टी के सौरभ भारद्वाज ने दर्द जाहिर भी किया था. उनका कहना था कि ऐसा नहीं चलेगा कि राहुल और प्रियंका की रील कटेगी.
यह पूरा मामला 6 अक्तूबर से शुरू हुआ था. अखिलेश यादव समेत कई नेता हिरासत में ले लिए गए थे. फिर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने आकाशवाणी भवन में ही धरना देना शुरू कर दिया. इसकी खूब चर्चा हुई और मीडिया कवरेज में राहुल गांधी और प्रियंका की ही चर्चा रही. इसी को लेकर अखिलेश की सपा समेत कई दलों को आपत्ति है. सहयोगी दलों का कहना है कि जो प्रदर्शन INDIA ब्लॉक का साझा आयोजन था, वह भाई और बहन पर केंद्रित रह गया. INDIA ब्लॉक में शामिल सपा से जुड़े एक सूत्र ने कहा कि यह अच्छी बात नहीं है. इस प्रदर्शन में समन्वय बेहद खराब रहा है.
यह INDIA ब्लॉक का साझा प्रदर्शन था, गांधी परिवार के लोगों का नहीं था. उनका कहना था कि पूरे शो को राहुल गांधी और प्रियंका ने चुराने की कोशिश की. ऐसे ही राय लेफ्ट के दलों की भी रही है. हालांकि राहुल गांधी और प्रियंका के ही चर्चा में रहने की वजह यह भी बनी कि उन्होंने सड़क पर वक्त भी काफी गुजारा. अनुमान के मुताबिक राहुल गांधी कुल 11.5 घंटे तक मंगलवार को सड़क पर रहे. फिर 7 अक्तूबर को वह साढ़े 9 घंटे आंदोलन करते रहे. यही हाल 8 अक्तूबर को रहा. इस तरह वह कुल तीन दिनों में करीब 26.5 घंटे तक सड़क पर रहे.
फिर भी साथी दलों की आपत्ति इस बात को लेकर है कि समन्वय सही नहीं रहा. राहुल गांधी और प्रियंका ने आखिरी समय में रूट बदल दिया और आकाशवाणी जाकर प्रदर्शन किया. इससे उनकी तो कवरेज हुई, लेकिन अन्य लोग पहले ही हिरासत में ले लिए गए. 6 तारीख के प्रोटेस्ट में कुल 23 दल शामिल थे. लेकिन बाद में संख्या घटती चली गई. सपा, शिवसेना उद्धव गुट और शरद पवार की पार्टी ने इसमें हिस्सा नहीं लिया. कांग्रेस और कुछ लेफ्ट के दल ही आए. यहां तक कि 10 अक्तूबर को तो तेजस्वी यादव ने आने से ही इनकार कर दिया है और आखिरी वक्त में उनका प्लान बदल गया. वहीं 8 तारीख को लंच के दौरान तो सपा और उद्धव सेना के लोग थे, लेकिन वे मार्च में शामिल नहीं हुए.
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