- SC ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं पर रिटेलर को मिलने वाली कीमत से अधिकतम एमआरपी तय करने का सुझाव दिया
- केरल HC ने केंद्र सरकार को पेटेंट कानून के तहत महंगी पेटेंटेड दवाएं सस्ती कीमत पर बनाने का अधिकार बताया है
- कानून धारा 100 केंद्र सरकार को सरकारी उद्देश्यों के लिए पेटेंटेड आविष्कार का उपयोग करने की अनुमति देती है
कैंसर के एक मरीज को जो दवाई मेडिकल की दुकान पर 27000 रुपये MRP पर मिल रही है, उसे डीलर (प्राइस टू रिटेलर) सिर्फ 3000 रुपये में लेते हैं. जिंदगी और मौत के बीच फासला बनने वाली ऐसी अहम दवाई के लिए मरीज 9 गुना कीमत क्यों दे रहा है? ठीक यही सवाल सुप्रीम कोर्ट ने उठाया है. सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने केंद्र सरकार से सवाल किया है कि कैंसर और दूसरी बीमारियों की दवाओं पर MRP को रिटेलर को मिलने वाली कीमत से 16 परेंसट से ज्यादा न रखने का एक समान नियम क्यों नहीं होना चाहिए.
ठीक एक दिन पहले ही इसी लाइन पर केरल हाई कोर्ट ने सुझाव दिया था कि केंद्र सरकार को 1970 के पेटेंट कानून में मिली अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके ब्रेस्ट कैंसर की महंगी पेटेंटेड दवाइयां बनानी चाहिए और उसे जरूरत वाले मरीज को सस्ती कीमत पर बेचना चाहिए. सवाल है कि पेटेंट कानून में सरकार को ऐसा कौन से अधिकार मिले हैं और किन परिस्थितियों में वह इनका इस्तेमाल कर सकती है. क्या सरकार इसका इस्तेमाल करके खुद दवाई बना सकती है या किसी और कंपनी से भी ऐसा करवा सकती है?
पेटेंट कानून क्या कहता है?
आप कोई भी नया आविष्कार या इनोवेशन करते हैं तो आपको एक हक मिलता है. हक इस बात का दूसरों से पहले आपका उस खोज पर हक हो. पेटेंट उसी हक की रक्षा करता है. पेटेंट कानून एक ऐसा कानूनी ढांचा है जिसके तहत सरकार किसी आविष्कारक को उसके नए आविष्कार के लिए एक निश्चित अवधि (आमतौर पर 20 साल) के लिए विशेष अधिकार देती है. 20 साल तक आपके अलावा कोई उसका इस्तेमाल नहीं करेगा. भारत में इसे हक को नियंत्रित करने के लिए मुख्य रूप से भारतीय पेटेंट अधिनियम 1970 लागू है.
केरल हाई कोर्ट के जज जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन ने अपने सुझाव में पेटेंट कानून के सेक्शन 100 का जिक्र किया है. यह धारा कहती है कि केंद्र सरकार को सरकारी उद्देश्यों के लिए आविष्कारों का उपयोग करने की शक्ति प्राप्त है.
- इस धारा का सब-सेक्शन (1) केंद्र सरकार और उसके द्वारा लिखित रूप में अधिकृत किसी भी व्यक्ति को सरकारी उद्देश्यों के लिए किसी आविष्कार का उपयोग करने की अनुमति देता है.
- सब-सेक्शन (2) के अनुसार यदि कोई आविष्कार पेटेंट के पहले दावे के दिन से पहले ही सरकार या सरकारी संस्थान द्वारा किसी दस्तावेज में दर्ज कर लिया गया था, या उसका ट्रायल कर लिया गया था, तो सरकार उस आविष्कार का उपयोग बिना किसी रॉयल्टी दिए कर सकती है. हालांकि, इसमें यह शर्त शामिल है कि यह जानकारी सरकार को पेटेंटहोल्डर की ओर से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं मिली होनी चाहिए.
- सब-सेक्शन (3) आम मामलों पर लागू होता है, जहां आविष्कार का इस्तेमाल इस्तेमाल से पहले या बाद में तय की गई शर्तों पर किया जाता है यहां कोई समझौता न होने पर पेटेंट-होल्डर मामले की परिस्थितियों के हिसाब से सिर्फ उचित मुआवजा पाने का हकदार होता है.
क्या सरकार खुद दवा बनाकर बेच सकती है?
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पेटेंट कानून की धारा 100 के तहत केंद्र सरकार को सरकारी कामों के लिए पेटेंटेड आविष्कार का इस्तेमाल करने का जो अधिकार मिला है, वह सिर्फ सरकार के अपने अंदरूनी इस्तेमाल तक ही सीमित है, या फिर इसमें पेटेंटेड दवा बनाना और उसे बिना किसी कमर्शियल मकसद के अलग-अलग मरीजों को सप्लाई करना भी शामिल है?
यानी कोर्ट का कहना है कि केंद्र सरकार या उससे अधिकृत कोई व्यक्ति, पेटेंट वाली दवा बनाने और उसे जरूरतमंद व्यक्ति को बेचने के लिए उस पेटेंट का इस्तेमाल कर सकता है, बशर्ते कि यह फायदे के लिए न किया जा रहा हो. यहां ध्यान रहे कि कोर्ट ने केंद्र को दवा का उत्पादन तुरंत शुरू करने का निर्देश नहीं दिया. कोर्ट ने कहा कि सरकार को दवा की कीमत, ऐसी दवाओं की जरूरत वाले मरीजों की संख्या और मौजूदा सब्सिडी योजनाओं के असर के बारे में डेटा इकट्ठा करने के बाद ही अंतिम फैसला लेना चाहिए.
यह फैसला मील का पत्थर क्यों है?
NDTV से बात करते हुए वकील मैत्रेयी ने कहा कि यह जीवन बचाने वाली दवाओं तक पहुंच के मामले में एक अहम फ़ैसला है. हालांकि उनके अनुसार इसके लागू होने के पहलू में यह कुछ कमज़ोर है. इसकी वजह बताते हुए कहा कि कोर्ट की ओर से केंद्र सरकार के लिए इसे लागू करने की कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है.
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