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पहाड़ों से घिरे 16 घर...120 की आबादी : सरकार ने नहीं सुनी तो खुद ही बना दी गांव तक सड़क

छत्तीसगढ़ के कांकेर के पुसाझर गांव में सरकार ने पक्के मकान तो दिए पर सड़क देना भूल गई. जानिए कैसे 120 की आबादी वाले इस गांव ने खुद पहाड़ काटकर रास्ता बनाया और खुद ही सीमेंट-सरिया ढोकर पहला पक्का घर तैयार कर लिया. पढ़िए पूरी ग्राउंड रिपोर्ट.

पहाड़ों से घिरे 16 घर...120 की आबादी : सरकार ने नहीं सुनी तो खुद ही बना दी गांव तक सड़क

सालों तक जिन रास्तों पर बारूद की गंध और नक्सलियों का खौफ था, आज वहां लोग सिस्टम की नाकामी के शिकार हो रहे हैं. ये दास्तां है छत्तीसगढ़ के घोर नक्सल प्रभावित रहे जिले कांकेर की. यहां के पुसाझर गांव में  सरकार ने पक्के मकान तो मंजूर कर दिए लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए सड़क देना भूल गई. नतीजा ये हुआ कि गांव वालों ने खुद ही अपनी जमा पूंजी इकट्ठा की और पहाड़ को काटकर रास्ता बना दिया. इसके लिए पूरे गांव ने श्रमदान किया और कड़ी मेहनत के बाद गांव तक आने के लिए कच्चा रास्ता तैयार कर दिया. ये सब इसलिए ताकि पक्के घर का सपना पूरा हो सके. बताया जा रहा है कि कच्ची सड़क बनाने के बाद गांव वाले खुद ही मीलों दूर से ईंट, सीमेंट और सरिया अलग-अलग साधनों से ले आए. जिससे गांव में अब एक पक्का घर तैयार हो गया है. क्या है पूरी कहानी पढ़िए इस रिपोर्ट में.

Pusajhar Village Road Story: गांव वालों ने खुद ही श्रमदान करके सड़क तैयार कर दिया.

Pusajhar Village Road Story: गांव वालों ने खुद ही श्रमदान करके सड़क तैयार कर दिया.
Photo Credit: नीरज तिवारी

अपनी जमा पूंजी और श्रमदान से बदली तस्वीर

दरअसल सालों से उपेक्षा झेल रहे इन ग्रामीणों के सब्र का बांध जब टूट गया, तो उन्होंने आपस में बैठक की. गांव के हर परिवार ने अपनी गाढ़ी कमाई से जमा पूंजी इकट्ठा की और पूरा गांव श्रमदान के लिए निकल पड़ा. पुरुष, महिलाएं और युवा सभी एक साथ पहाड़ काटकर रास्ता बनाने में जुट गए. ग्रामीणों के पक्के इरादों के आगे आखिर पहाड़ को भी झुकना पड़ा और कड़ी मेहनत के बाद गांव तक पहुंचने का एक कच्चा रास्ता बनकर तैयार हो गया. दरअसल प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सरकार ने इस गांव के कुछ परिवारों के लिए पक्के मकान स्वीकृत तो कर दिए थे, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी. ग्रामीणों द्वारा तैयार किया गया कच्चा रास्ता इतना संकरा और दुर्गम था कि कोई भी ट्रैक्टर या निर्माण सामग्री ढोने वाला बड़ा वाहन गांव तक नहीं पहुंच पा रहा था. मुख्य बाजार बीढ़ापाल यहां से पूरे 13 किलोमीटर दूर था. लेकिन ग्रामीणों ने हार नहीं मानी. उन्होंने अलग-अलग साधनों का जुगाड़ किया और सिर तथा पीठ पर सीमेंट की बोरियां, सरिया और रेत लादकर पहाड़ों के रास्ते चढ़ना शुरू किया.

Pusajhar Village Road Story: गांव वालों के श्रमदान से तैयार हुई सड़क अब ऐसी दिखती है

Pusajhar Village Road Story: गांव वालों के श्रमदान से तैयार हुई सड़क अब ऐसी दिखती है
Photo Credit: नीरज तिवारी

बनकर तैयार हुआ पहला पक्का आशियाना

ग्रामीणों की यह तपस्या आखिरकार रंग लाई. मीलों दूर से बेहद कठिन रास्तों से होते हुए निर्माण सामग्री गांव तक पहुंचाई गई. गांव वालों ने खुद ही नींव खोदी, खुद ही मसाला तैयार किया और आपसी सहयोग से अब गांव में एक खूबसूरत पक्का घर बनकर तैयार हो गया है. यह पक्का घर सिर्फ ईंट और सीमेंट का ढांचा नहीं है, बल्कि यह इन ग्रामीणों के स्वाभिमान, अटूट हौसले और आपसी एकता का जीता-जागता प्रतीक है.देखा जाए तो पुसाझर गांव के लोगों के लिए यह रास्ता केवल घर बनाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह उनकी जिंदगी की लाइफलाइन है. सड़क के अभाव में पहले बीमार लोगों को अस्पताल ले जाना एक बड़ी चुनौती थी, और बच्चों के लिए स्कूल पहुंचना भी बेहद मुश्किल था. ग्रामीणों ने अपनी तरफ से एक रास्ता तो तैयार कर दिया है, लेकिन अब भी उनकी मांग है कि सरकार और प्रशासन इस कच्चे रास्ते को चौड़ी और पक्की सड़क में तब्दील करे, ताकि गांव के बाकी लोगों का भी जीवन आसान हो सके.

Pusajhar Village Road Story: गांव वालों न सिर्फ सड़क तैयार किया बल्कि खुद ही सीमेंट वैगरह लाकर गांव में PM आवास योजना के तहत पक्का मकान भी तैयार कर लिया.

Pusajhar Village Road Story: गांव वालों न सिर्फ सड़क तैयार किया बल्कि खुद ही सीमेंट वैगरह लाकर गांव में PM आवास योजना के तहत पक्का मकान भी तैयार कर लिया.
Photo Credit: नीरज तिवारी

कलेक्टर बोले- चरणबद्ध तरीके से होगा विकास

इस पूरे मामले पर कांकेर के कलेक्टर कुंदन कुमार से जब पत्रकारों ने सवाल किया तो उन्होंने बेहद ईमानदारी से स्वीकार किया कि क्षेत्र में कई ऐसे अंदरूनी गांव हैं जहां अब तक विकास की बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं. कलेक्टर ने बताया कि यह इलाका लंबे समय तक घोर नक्सलवाद से प्रभावित रहा था, जिसके चलते विकास के काम बुरी तरह बाधित हुए थे. लेकिन अब चूंकि नक्सलवाद का प्रभाव लगभग खत्म हो चुका है, इसलिए प्रशासन प्राथमिकता के आधार पर ऐसे सभी सुदूर गांवों का चरणबद्ध तरीके से विकास करने और वहां तक पक्की सड़क पहुंचाने के लिए पूरी कोशिश कर रही है. यह कहानी देश के हर उस कोने के लिए एक बड़ी सीख है जहां लोग सुविधाओं के अभाव में केवल सरकारों को कोसते रहते हैं, जबकि पुसाझर के लोगों ने खुद ही अपनी किस्मत लिख डाली.
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