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मछली पर बंगाल में राजनीति बढ़ी, लेकिन खपत घटी, बंगालियों के नॉनवेज प्रेम पर चौंकाने वाले आंकड़े

बंगालियों में एक कहावत चलती है- 'माछे-भात बंगाली'. इसी से पता चलता है कि बंगालियों में मछली को लेकर कितना प्रेम है. आंकड़े बताते हैं कि बंगाल उन राज्यों में है, जहां सबसे ज्यादा मछली खाई जाती है.

मछली पर बंगाल में राजनीति बढ़ी, लेकिन खपत घटी, बंगालियों के नॉनवेज प्रेम पर चौंकाने वाले आंकड़े
west bengal elections and fish politics
IANS
  • NFHS के आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल में पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मछली खाने का प्रतिशत अधिक है
  • बंगाल में मछली-भात को सांस्कृतिक पहचान माना जाता है और यह वहां के लोगों के दैनिक आहार का अहम हिस्सा है
  • पश्चिम बंगाल में मांस-मछली और अंडे पर खर्च कुल खाने-पीने के खर्च का लगभग 20 प्रतिशत है
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पश्चिम बंगाल में चुनाव चल रहा है और मुद्दा बन गया है- 'मछली'. बंगाल के चुनाव में 'मछली खाने' को लेकर जितनी सियासत हो रही है, वह दिखाती है कि बंगाल में 'मछली' कितना मायने रखती है? बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर का कुछ दिन पहले मछली खाने का वीडियो भी सामने आया था. वहीं, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दावा कर रही हैं कि अगर बीजेपी सत्ता में आ गई तो बंगालियों का मछली-भात खाना बंद करवा देगी. टीएमसी नेताओं के इस बयान के बाद बंगाल में भाजपा के नेताओं को हाथों में मछली लेकर प्रचार तक करना पड़ा. 

अब बीजेपी सांसद रवि किशन ने भी मछली को लेकर एक बड़ा बयान दे दिया है. उन्होंने कहा कि 4 मई के बाद 4 गुना मछली खाओ. हम लोग भांति-भांति की मछली यहां लेकर आएंगे. रवि किशन का कहना है कि जहां-जहां एनडीए की सरकार है, वहां की मछलियों को लेकर बंगाल के कुएं-तालाबों में डालेंगे. उन्होंने 4 मई के बाद 4 गुना मछली खाइए, कोई दिक्कत नहीं है.

बंगाल के लोगों का मछली से प्रेम किसी से छिपा नहीं है. बंगाल में तो 'माछे-भात बंगाली' कहावत भी चलती है. बंगाल में मछली-भात यानी मछली-चावल को सांस्कृतिक पहचान माना जाता है. लेकिन बंगालियों के मछली प्रेम को लेकर असल आंकड़े चौंका रहे हैं. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े बता रहे हैं कि बंगाल के लोगों का मछली प्रेम पहले की तुलना में अब घटा है.

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बंगालियों के मछली प्रेम पर क्या कहते हैं आंकड़े?

बंगालियों के मछली प्रेम को आंकड़े भी साबित करते हैं. बंगाली उन लोगों में से हैं, जो सबसे ज्यादा मछली खाते हैं. 

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के मुताबिक, देशभर में 45.7 पुरुष और 35.7% महिलाएं मछली खाती हैं. जहां देशभर में मछली खाने वालों में पुरुष आगे हैं तो वहीं बंगाल में इसका उल्टा है. बंगाल में 87.8% महिलाएं और 87.4% पुरुष मछली खाते हैं. यानी, मछली खाने में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं थोड़ी सी आगे हैं.

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हालांकि, आंकड़े यह भी बताते हैं कि बंगाल में मछली खाने वाले पहले से कम हुए हैं. NFHS-5 2019 से 2021 के बीच हुआ था. जबकि, 2015-16 में हुए NFHS-4 के नतीजों की मानें तो उस समय बंगाल में 91.4% महिलाएं और 91.3% पुरुष मछली खाते थे. 

इस हिसाब से, 2015-16 की तुलना में 2019-21 में बंगाल में मछली खाने वाले महिला-पुरुषों की संख्या में लगभग 4 फीसदी की कमी आई है.

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मांस-मछली खाने में कितना खर्च करते हैं बंगाली?

बंगाली हर महीने खाने-पीने पर जितना खर्च करते हैं, उसका लगभग 20 फीसदी सिर्फ मांस-मछली खाने पर जाता है. हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे (HCES) 2023-24 की रिपोर्ट में एक परिवार के औसत खर्चे का हिसाब-किताब पता चलता है. 

इसकी मानें तो बंगाल के शहरी इलाकों में रहने वाला एक परिवार हर महीने अपने खर्च का कुल 44.16% खाने-पीने पर खर्च करता है. इसी तरह बंगाल के गांव में रहने वाला एक परिवार खाने-पीने पर 51.54% खर्च करता है.

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यह सर्वे बताता है कि 2023-24 में बंगाल के गांव में रहने वाला एक परिवार हर महीने औसतन 1,866 रुपये खाने-पीने पर खर्च करता था. इसमें से 368 रुपये मांस-मछली और अंडे पर खर्च करता था. इसी तरह शहरी इलाकों में रहने वाला एक बंगाली परिवार का खाने-पीने पर महीनेभर का औसत खर्च 2,550 रुपये था, जिसमें से 479 रुपये मांस-मछली और अंडे पर हुआ.

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इस सर्वे से पता चलता है कि खाने-पीने में मांस-मछली और अंडे पर बंगाली परिवार बहुत ज्यादा खर्च करता है. मांस-मछली और अंडे पर खर्च करने में बंगाली परिवार केरल के बाद दूसरे नंबर पर हैं. केरल में शहरी परिवार हर महीने 21 फीसदी और ग्रामीण परिवार 23 फीसदी खर्च मांस-मछली और अंडे पर करता है.

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