राजस्थान के एक ऐसे शहर की कहानी, जिसकी पहचान किसी राजा या महाराजा से नहीं, बल्कि सेठों से होती है. हम बात कर रहे हैं शेखावाटी के रामगढ़ की, जिसे रामगढ़ सेठान भी कहा जाता है. बात उन दिनों की है जब राजस्थान के चूरू में पोद्दार व्यापारियों का दबदबा हुआ करता था. उनकी आलीशान हवेलियां उनकी हैसियत बयां करती थीं. लेकिन कहते हैं ना, अमीरी अक्सर आंखों में खटकने लगती है. वहां के राजा को जलन हुई और उसने इन व्यापारियों पर भारी टैक्स लगा दिया. सेठों का स्वाभिमान जाग उठा. उन्होंने इस फैसले का विरोध किया और चूरू छोड़ते हुए एक कसम खाई- "हम जहां भी जाएंगे, इससे भी भव्य और आलीशान नगर बसाएंगे."
रेगिस्तान में बसाया सपनों का शहर
फिर साल 1791 में रामदास पोद्दार के परिवार ने सीकर जिले में रामगढ़ बसाया. राजस्थानी में एक ताना मारा जाता था कि 'बणिए क्या गांव बसाएंगे', लेकिन इन सेठों ने इसे पूरी तरह गलत साबित कर दिया. देखते ही देखते देश के बड़े-बड़े सेठ यहां आकर बसने लगे. फतेहपुर के रुई व्यापारी बंसल यहां आए तो 'रुईया' कहलाए.
इनका व्यापार सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं था. ये ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ के साथ भी बिजनेस करते थे और जरूरत पड़ने पर कंपनी को ब्याज पर भारी-भरकम रकम भी देते थे. आपको जानकर ताज्जुब होगा कि रामगढ़ का पुराना नाम नशे की ढाणी था, क्योंकि यहां अफीम की जबरदस्त पैदावार होती थी. अफीम का ये व्यापार मुंबई, अफगानिस्तान से लेकर चीन तक फैला था. देश के मशहूर बिड़ला घराने के शिवनारायण बिड़ला ने भी अपना पहला स्वतंत्र व्यापार यहीं से शुरू किया था.

इसके अलावा ये इलाका खूंखार डाकुओं का अड्डा था. लेकिन हमारे मारवाड़ी सेठ भी कम दिमाग वाले नहीं थे. उन्होंने डाकुओं से पंगा लेने के बजाय उनसे गठबंधन कर लिया. एक ऐसा अनोखा रिश्ता बना कि डाकू सेठों की हिफाजत करते और बदले में सेठ डाकुओं को पनाह देते.
जब राजा ने ली सेठों की परीक्षा
रामगढ़ के सेठों का रुतबा ऐसा था कि सीकर के राजमहल में उन्हें खास तवज्जो और अलग कुर्सी मिलती थी. एक बार सीकर के राजा से किसी ने इसकी शिकायत कर दी कि आप रामगढ़ वालों को इतना सिर पर क्यों बिठाते हैं. राजा ने अपनी अवाम को सेठों की ताकत दिखाने के लिए एक खेल खेला. राजा ने अचानक पूरे सीकर से एक करोड़ रुपये (आज के अरबों रुपये के बराबर) की मांग रख दी. आम जनता ने तो हाथ खड़े कर दिए.
लेकिन, जब राजा के मंत्री रामगढ़ के सेठों के पास पहुंचे, तो सेठों का जवाब सुनकर दरबार सुन्न रह गया. उन्होंने बेखौफ होकर पूछा- "महाराज से पूछ कर आइये कि रकम किसमें चाहिए? रुपयों में, चांदी में या सोने में?" राजा ने मुस्कुराकर अपने लोगों से कहा- "अब समझे मैं इनका इतना सम्मान क्यों करता हूं."

क्या होता था एक असली सेठ?
इन सेठों की अमीरी के साथ-साथ दरियादिली के किस्से भी मशहूर हैं. एक रात एक सेठ ने सर्दियों में सियारों के रोने की आवाज सुनी. मुनीम से पूछा तो उसने मजाकिया लहजे में कह दिया कि 'मालिक, सियार सर्दी से ठिठुर रहे हैं'. अगले ही दिन सेठ ने सियारों के लिए रजाइयों का इंतजाम करवा दिया. दरअसल, उस दौर में सेठ सिर्फ पैसे वाले को नहीं कहा जाता था. यह एक उपाधि थी, जो तब मिलती थी जब कोई व्यापारी जनता की भलाई के लिए स्कूल, धर्मशाला, गौशाला मंदिर, कुएं और बावड़ी बनवाता था.
हवेली के मुख्य दरवाजे की चौखट देखकर ही आप बता सकते थे कि वो सेठ कितना बड़ा है. दरवाजे में जितनी परतें होती थीं, वो बताती थीं कि उस सेठ ने जनता के लिए कितने नेक काम किए हैं. दरवाजे पर लटकती लकड़ी की चिड़ियों की आकृतियां बताती थीं कि उस हवेली में इस परिवार की कितनी पीढ़ियां रह चुकी हैं.

आज खामोश हैं हवेलियां, कहां चले गए सेठ
इनकी बनाई हवेलियां किसी अजूबे से कम नहीं हैं. 'मस्जिद वाली हवेली' हो या रंग महल की खूबसूरत चित्रकारी, आज भी इनकी दीवारों से इतिहास बोलता है. उस दौर में अंग्रेज अफसरों तक ने इन सेठों को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी कहा था. लेकिन आज कहानी का रुख बदल चुका है. कभी दौलत और शानो-शौकत से आबाद ये हवेलियां आज वीरान पड़ी हैं. बेहतर जिंदगी और व्यापार की तलाश में यहां के सेठ अपना घर-बार छोड़कर कोलकाता, मुंबई और असम के बड़े शहरों में जाकर बस गए. रामगढ़ की ये सूनी हवेलियां आज भी खामोशी से अपने लोगों का इंतजार कर रही हैं.

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