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हरीश राणा की इच्छामृत्यु की खबर से हिमाचल के पालेटा गांव के लोग क्यों हैं गमगीन ? जानें खास कनेक्शन

पालेटा गांव के निवासी खुशी राम भूरिया कहते हैं कि कोरोना काल में अशोक राणा का परिवार हरीश को लेकर अपने पैतृक गांव आया था, लेकिन यह बच्चा बिस्तर पर ही पड़ा रहता था.  परिवार इसकी परवरिश एक नवजात की तरह ही करता रहता था, लेकिन अब इस बात से उनका मन भी व्यथित है कि बच्चे को बचाया नहीं जा सकता है.

हरीश राणा की इच्छामृत्यु की खबर से हिमाचल के पालेटा गांव के लोग क्यों हैं गमगीन ? जानें खास कनेक्शन
हरीश राणा की इच्छामृत्यु की खबर से हिमाचल के गांव में सन्नाटा.
  • हरीश राणा की इच्छामृत्यु प्रक्रिया से उनका परिवार ही नहीं हिमाचल के गांव के लोग भी गमगीन हैं
  • हरीश राणा का परिवार हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के जयसिंहपुर के पालेटा गांव का रहने वाला है
  • गांव में हरीश राणा और उनके परिवार के धैर्य की बातें हो रही है, लेकिन उनकी इच्छामृत्यु से सभी गहरे दुख में हैं
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कांगड़ा:

हरीश राणा की इच्छामृत्यु की प्रकिया शुरू हो चुकी है. इस फैसले से सिर्फ उनका परिवार ही नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा के छोटे से गांव पालेटा में भी सन्नाटा पसरा हुआ है. आप सोच रहे होंगे कि हरीश को गाजियाबाद के रहने वाले हैं तो फिर उनकी इच्छामृत्यु की खबर से हिमाचल के इस गांव के लोग इतने गमगीन क्यों हैं. तो बता दें कि हरीश राणा का हिमाचल के इस गांव से खास कनेक्शन है. हरीश की इच्छामृत्यु से गांव के लोगों के दिल पर क्या बीत रही है, वे इतने परेशान क्यों हैं, पढ़ें ये ग्राउंड रिपोर्ट.

दरअसल हरीश का परिवार कांगड़ा जिले के जयसिंहपुर में सरी पंचायत के पालेटा .गांव का रहने वाला है. पालेटा गांव का बेटा हरीश सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एम्स में असाध्य पीड़ा से मुक्ति पा रहा है. ऐसा नहीं है कि गांव वाले हरीश के दर्द से अनजान हैं लेकिन मानवीय तौर पर ये बर्दाश्त कर पाना मुश्किल है कि गांव का बेटा ऐसे दुनिया छोड़ दे. बता दें कि हरीश अपने तीन भाई बहनों में सबसे बड़े हैं. उनकी छोटी बहन की शादी हो चुकी है, जबकि छोटा भाई अविवाहित है.

हिमाचल का रहने वाला है हरीश राणा का परिवार

हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने 1989 में हिमाचल से दिल्ली का रुख इसलिए किया था कि बच्चों की अच्छी परवरिश हो सके और उनका जीवन बेहतर हो सके. सब कुछ अच्छा चल रहा था. पत्नी और तीन बच्चों के साथ परिवार हंसी खुशी जी रहा था, लेकिन एक अनहोनी ने परिवार को ऐसा सदमा दिया कि वह बुरी तरह से टूट गया. एक जवान बच्चे का 13 साल तक बिस्तर पर लालन-पालन करना किसी के लिए भी असंभव सा लगता है.

अशोक राणा और उनकी पत्नी निर्मला देवी ने आह तो भरी लेकिन उफ्फ नहीं की. लेकिन अब बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े इस दंपति ने बेटे के लिए देश की शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया. शीर्ष अदालत ने 11 मार्च को माता-पिता की पीड़ा समझते हुए हरीश को इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी.

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हरीश राणा की इच्छामृत्यु की खबर से पालेटा गांव के लोग दुखी

पालेटा गांव के निवासी खुशी राम भूरिया कहते हैं कि कोरोना काल में अशोक राणा का परिवार हरीश को लेकर अपने पैतृक गांव आया था, लेकिन यह बच्चा बिस्तर पर ही पड़ा रहता था.  परिवार इसकी परवरिश एक नवजात की तरह ही करता रहता था, लेकिन अब इस बात से उनका मन भी व्यथित है कि बच्चे को बचाया नहीं जा सकता है. उन्होंने बताया कि तीन भाइयों में अशोक दूसरे नंबर पर हैं. बड़े भाई प्रीतम और छोटे भाई बलदेव हैं.

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20 अगस्त 2013 को रक्षाबंधन पर टूटा दुखों का पहाड़

 प्रीतम लुधियाना में रहते हैं जबकि बलदेव भी दिल्ली में रहते हैं. इस बच्चे के लिए माता-पिता ने जो तप किया वह कोई नहीं कर सकता है. गंव में तीनों भाइयों के अपने घर हैं. अशोक राणा रिश्तेदारों के विवाह समारोह में भी आते रहते थे, जबकि माता निर्मला बच्चे के साथ वहीं रहती थीं. खुशी राम ने बताया कि अशोक राणा के परिवार में पत्नी निर्मला देवी, बेटा हरीश राणा और आशीष राणा और एक बेटी है. अभी अशोक परिवार के साथ गाजियाबाद में रहते हैं. बेटा हरीश 2013 में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक अंतिम वर्ष का छात्र था. 20 अगस्त 2013 को रक्षाबंधन पर हरीश ने शाम 6:30 बजे अपनी बहन से बात की थी. उस समय हरीश की उम्र करीब 22 साल थी. एक घंटे बाद उन्हें खबर मिली कि उनका बेटा उनके पेइंग गेस्ट भवन की चौथी मंजिल से गिर गया.

पिता ने सैंडविच बेचे, फिर भी नहीं उठा बेटा

 बेटे के इलाज के लिए उन्होंने अपना दिल्ली का मकान सितंबर 2021 में बेच दिया और गाजियाबाद चले गए. सभी अस्पतालों ने हाथ खड़े कर दिए. बेटे के लिए अशोक राणा ने सब कुछ किया. दिल्ली का तीन मंजिला घर बेचा, सड़कों पर सैंडविच बेचे, हर महीने 70 हजार का इंतजाम किया. बस एक आस थी कि शायद एक दिन बेटा आंख खोले.

पलेटा में बना अशोक राणा का घर हरीश और उनके परिवार के लिए भविष्य की नई उम्मीदों का केंद्र था. आज उसी घर के आंगन में सन्नाटा है और गांववासी गमगीन हैं. गांव में होने वाली चर्चाओं में केवल हरीश व उनके परिवार के धैर्य की बातें हो रही हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि हरीश के स्वजनों ने उन्हें इस स्थिति से निकालने के लिए हरसंभव प्रयास किया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था.

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