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This Article is From Mar 18, 2026

Harish Rana: हरीश राणा का निधन, जानिए कैसे तय होता है इच्छामृत्यु का तरीका, क्या मरीज को होता है दर्द?

Harish Rana: 13 सालों से कोमा में रहे हरीश राणा का आज 24 मार्च को निधन हो गया है. बता दें कि 32 साल के हरीश एम्स के पैलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती हुए थे. 14 मार्च को उन्हें एम्स में इच्छा मृत्यु के लिए शिफ्ट किया गया था. 

Harish Rana: हरीश राणा का निधन, जानिए कैसे तय होता है इच्छामृत्यु का तरीका, क्या मरीज को होता है दर्द?
Harish Rana Euthanasia Case.

Harish Rana Death: 13 सालों से कोमा में रहे हरीश राणा का आज 24 मार्च को निधन हो गया है. बता दें कि 32 साल के हरीश एम्स के पैलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती हुए थे. 14 मार्च को उन्हें एम्स में इच्छा मृत्यु के लिए शिफ्ट किया गया था. 11 दिनों से मेडिकल बोर्ड की निगरानी में प्रक्रिया को किया गया था शुरू.और आज वो इस दुनिया को अलविदा कह कर चले गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को हरीश के इच्छा मृत्यु की अर्जी को किया था स्वीकार. आइए जानते हैं क्या था पूरा मामला. 

पूरे देश की नजर उस समय एम्‍स में अंद‍िम व‍िदाई की ओर बढ़ रहे बेटे ह‍रीश राणा पर थी. गाज‍ियाबाद के 13 साल का लंबा इंतजार करने के बाद जब माता-पिता से बेटे की हालत देखी नहीं गई, तो उन्होंने इच्छा मृत्यु के लिए गुहार लगाई. इस खबर ने पूरे देश को भावनाओं के समंदर में ला छोड़ा. लोगों ने हरीश के माता-पिता के दर्द को आत्मसात किया और हरीश राणा के हालात (Harisha Rana Condition) पर दुख जताया. लेकिन कुछ सवाल यूथेनेशिया (Euthanasia) यानी इच्छामृत्यु को लेकर सभी के मन में उठे.हरीश को पैसिव यूथनेशिया (Passive Euthanasia) दिया गया है, यानी उसे धीरे-धीरे दवाओं, आहार और जल या उसके जीवन के लिए जरूरी चीजें देनी बंद कर दी जा रही हैं.

ऐसे में बहुत से लोगों के मन में संशय है कि क्या इससे हरीश को दर्द हो रहा होगा.यूथनेशिया का यही तरीका क्यों चुना गया, इस बारे में हमने बात की एक्सपर्ट से. उन्होंने बताया कि यूथनेशिया का प्रकार मेडिकल बोर्ड द्वारा तय किया जाता है, जिसमें मरीज की स्थिति, उसकी इच्छा और परिवार की सहमति को ध्यान में रखा जाता है.

गंभीर और लाइलाज बीमारियों के मामलों में यूथेनेशिया (Euthanasia) यानी इच्छामृत्यु का विषय हमेशा से मेडिकल, कानूनी और नैतिक बहस का केंद्र रहा है. खासतौर पर जब किसी मरीज की हालत ऐसी हो जाए कि उसके ठीक होने की संभावना बेहद कम हो, तब यह सवाल उठता है कि उसे एक्टिव या पैसिव यूथेनेशिया में से कौन सा विकल्प दिया जाए और क्या यह प्रक्रिया मरीज के लिए दर्दनाक होती है या नहीं.

इस पूरे विषय पर आकाश हेल्थकेयर के क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के सीनियर कंसल्टेंट एवं प्रमुख डॉक्टर अजीत सिंह बताते हैं कि यूथेनेशिया का फैसला बेहद संवेदनशील होता है और यह कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है.

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कैसे तय होता है एक्टिव या पैसिव यूथेनेशिया?

डॉ. अजीत सिंह के अनुसार किसी भी मरीज को एक्टिव या पैसिव यूथेनेशिया देने का निर्णय सिर्फ मेडिकल स्थिति पर ही नहीं, बल्कि देश के कानून, मरीज की इच्छा (लिविंग विल) और परिवार की सहमति पर निर्भर करता है. भारत में फिलहाल एक्टिव यूथेनेशिया की अनुमति नहीं है, इसलिए ज्यादातर मामलों में पैसिव यूथेनेशिया ही अपनाया जाता है. पैसिव यूथेनेशिया में डॉक्टर लाइफ सपोर्ट सिस्टम जैसे वेंटिलेटर हटाने, फीडिंग ट्यूब बंद करने या जीवन बढ़ाने वाली दवाओं को रोकने का फैसला लेते हैं. वहीं एक्टिव यूथेनेशिया में किसी दवा या इंजेक्शन के जरिए सीधे मौत दी जाती है, जो भारत में अवैध है.

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क्या एक्टिव यूथेनेशिया ज्यादा ‘आसान' होता है?

इस सवाल पर डॉ. स्पष्ट करते हैं, “मेडिकल साइंस में ‘आसान' शब्द का इस्तेमाल करना सही नहीं है. हमारा उद्देश्य हमेशा मरीज के दर्द और तकलीफ को कम करना होता है, न कि प्रक्रिया को आसान बनाना. हालांकि सैद्धांतिक रूप से कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि एक्टिव यूथेनेशिया तेज और कम पीड़ादायक हो सकता है, लेकिन यह कानूनी और नैतिक रूप से हर जगह स्वीकार्य नहीं है.”

वे बताते हैं कि पैसिव यूथेनेशिया में मरीज को पेलिएटिव केयर दी जाती है, जिसमें दर्द निवारक दवाएं, सेडेटिव और मानसिक आराम देने वाली चिकित्सा शामिल होती है.

क्या पैसिव यूथेनेशिया दर्दनाक होता है?

यह सबसे बड़ा सवाल होता है कि जब लाइफ सपोर्ट हटाया जाता है या इलाज रोका जाता है, तो क्या मरीज को दर्द होता है? इस पर डॉ. कहते हैं,

“सही तरीके से दी गई पेलिएटिव केयर के साथ पैसिव यूथेनेशिया को दर्दनाक नहीं होने दिया जाता. मरीज को लगातार मॉनिटर किया जाता है और जरूरत पड़ने पर मॉर्फिन जैसी दर्द निवारक दवाएं और सेडेटिव दिए जाते हैं, जिससे वह आराम की स्थिति में रहता है.”

वे यह भी जोड़ते हैं कि कई बार बीमारी की अंतिम अवस्था में शरीर की संवेदनशीलता खुद ही कम हो जाती है, जिससे दर्द का अनुभव भी कम हो सकता है.

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‘किलिंग' और ‘लेटिंग डाई' का फर्क: क्या वाकई कोई अंतर है?

यूथेनेशिया को लेकर सबसे बड़ी नैतिक बहस ‘किसी को मारना' और ‘किसी को मरने देना' के बीच अंतर को लेकर होती है. कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इलाज रोकना (Passive euthanasia) नैतिक रूप से स्वीकार्य है, क्योंकि इसमें डॉक्टर सीधे मौत नहीं देता, बल्कि प्राकृतिक प्रक्रिया को होने देता है. वहीं एक्टिव यूथेनेशिया में डॉक्टर की सीधी भूमिका होती है, लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट इस फर्क को उतना स्पष्ट नहीं मानते. उनका कहना है कि लाइफ सपोर्ट हटाना भी एक जानबूझकर लिया गया फैसला है, जिसका परिणाम मौत ही होता है. ऐसे में दोनों के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है.
डॉ. अजीत इसे लेकर बताते हैं कि “मेडिकल प्रैक्टिस में इरादा यानि इंटेंशन बहुत महत्वपूर्ण होता है. अगर उद्देश्य मरीज की पीड़ा को कम करना है और सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है, तो इसे मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाता है.

हरीश राणा केस: क्या मरीज को भूख, प्यास या दर्द महसूस होता है?

हाल ही में चर्चा में आए हरीश राणा जैसे मामलों को लेकर लोगों के मन में सबसे ज्यादा सवाल यही होता है कि क्या ऐसे मरीज भूख, प्यास या दर्द महसूस करते हैं.

डॉ. अजीत सिंह बताते हैं जब कोई मरीज पैसिव यूथेनेशिया के तहत होता है, तो उसकी पूरी देखभाल पेलिएटिव केयर टीम करती है. इस दौरान शरीर की स्थिति धीरे-धीरे ऐसी हो जाती है कि भूख और प्यास का एहसास काफी कम या खत्म हो जाता है. मरीज को डिहाइड्रेशन से होने वाली असहजता को कम करने के लिए माउथ केयर, आईवी फ्लूइड (जरूरत के अनुसार) और सेडेटिव दिए जाते हैं. दर्द की स्थिति में स्ट्रॉन्ग पेनकिलर दिए जाते हैं, जिससे मरीज को तकलीफ न हो.

क्या यह प्रक्रिया लंबी और कष्टदायक होती है?

डॉक्टर के अजीत सिंह मुताबिक पैसिव यूथेनेशिया में मृत्यु तुरंत नहीं होती, इसमें कुछ दिन या हफ्ते लग सकते हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मरीज पूरे समय दर्द में रहता है. सही मेडिकल सपोर्ट के साथ उसे अधिकतम आराम देने की कोशिश की जाती है.

यूथेनेशिया केवल एक मेडिकल निर्णय नहीं, बल्कि कानूनी और नैतिक संतुलन का विषय है. एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया के बीच अंतर को लेकर भले ही बहस जारी हो, लेकिन डॉक्टरों का मुख्य उद्देश्य एक ही रहता है- मरीज को गरिमा के साथ, कम से कम दर्द में अंतिम समय देना.
हरीश राणा जैसे मामलों में भी यही कोशिश होती है कि मरीज को अनावश्यक पीड़ा न हो और वह शांत व सम्मानजनक तरीके से अपने अंतिम समय तक पहुंच सके.

(यह लेख आकाश हेल्थकेयर के क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के सीनियर कंसल्टेंट एवं प्रमुख डॉक्टर अजीत सिंह से बातचीत पर आधारि‍त है)

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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