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जनगणना 2027: आंकड़े सामने आने के बाद समाज में क्या क्या बदलेगा, जानें आरक्षण कम होगा या बढ़ेगा

जनगणना अगले महीने शुरू हो जाएगी. पहले चरण में मकानों की गिनती, उनमें रहने वालों और उनकी सुविधाओं की गिनती की जाएगी. लोगों की गिनती अगले साल अप्रैल में होगी. हालांकि कुछ राज्यों में यह पहले ही हो जाएगी. आइए जानते हैं कि जनगणना का प्रभाव क्या होगा.

जनगणना 2027: आंकड़े सामने आने के बाद समाज में क्या क्या बदलेगा, जानें आरक्षण कम होगा या बढ़ेगा
नई दिल्ली:

इस बार जनगणना-2027 दो चरणों में कराई जाएगी. इसका पहला चरण एक अप्रैल से शुरू होकर 30 सितंबर तक चलेगा. इसमें मकानों और उसमें उपलब्ध सुविधाओं को दर्ज किया जाएगा. इसे हाउस लिस्टिंग चरण कहा जाता है. जनगणना का दूसरा चरण, जिसमें लोगों की गणना होगी वह अगले साल नौ फरवरी से शुरू होकर फरवरी की अंतिम तारीख तक चलेगी. हालांकि केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड राज्य में लोगों की गिनती का यह काम इस साल अक्तूबर में ही किया जाएगा. इस बार की जनगणना की खास बात यह है कि इसमें जातियों की गणना भी होगी. जनगणना के नतीजे 2027 में ही आ सकते हैं.जनगणना के आंकड़े के भारत में सरकारी योजनाओं और आरक्षण से लेकर राजनीति तक पर प्रभाव डालेंगे. आइए जानते हैं कि जनगणना का भारत के समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा. 

महिला आरक्षण कब लागू होगा

संसद ने सितंबर 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया था. यह कानून संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था करता है. लेकिन इस अभी लागू नहीं किया गया है. सरकार ने कहा था कि जनगणना के आंकड़े आने के बाद ही इस कानून को लागू किया जाएगा. जनगणना के बाद सरकार परिसीमन करवाएगी. इसके बाद महिला आरक्षण को लागू किया जाएगा. महिला आरक्षण लागू होने के बाद संसद और विधानसभाओं की सूरत बदल जाएगी. इनमें अधिक संख्या में महिलाएं नजर आएंगी. साल 2024 के लोकसभा के चुनाव में केवल 74 महिलाएं ही चुनी गई थीं.लेकिन 33 फीसदी महिला आरक्षण लागू होने के बाद संसद में महिलाओं की संख्या 150 से अधिक हो जाएगी. वह भी तब जब संसद में सदस्यों की संख्या 545 ही हो. अगर परिसीमन के बाद संसद में सीटों की संख्या बढ़ी तो महिलाओं की संख्या भी संसद में बढ़ जाएगी.

क्या संसद में घटेगा दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व

जनगणना के बाद सीटें बढ़ने को लेकर एक राजनीतिक पेंच भी है. दरअसल दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि अगर 2027 की जनगणना को परिसीमन का आधार बनाया गया तो संसद में उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है. उनका कहना है कि दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की कोशिशें ठीक से हैं. इससे उनके यहां जनसंख्या बढ़ोतरी की रफ्तार कम है. उन्हें लगता है कि उत्तर भारत के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण ठीक से नहीं किया, इसलिए उनके यहां जनसंख्या अधिक है. दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि अधिक जनसंख्या होने की वजह से संसद में उत्तर भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है और उनका कम हो सकता है. इसे देखते हुए तमिलनाडु,केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्य परिसीमन के लिए 2027 की जगह 1971 की जनगणना को ही आधार बनाने की मांग कर रहे हैं. हालांकि केंद्र सरकार ने इसको लेकर अभी कुछ नहीं कहा है. दरअसल 1976 में परिसीमन के लिए 1971 की जनगणना को अगले 25 साल के लिए आधार माना गया था. वहीं 2001 में भी ऐसा ही किया गया और 1971 की जनगणना को ही अगले 25 साल के लिए परिसीमन का आधार मान लिया गया. यह समय सीमा इस साल खत्म हो रही है.  

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Photo Credit: AI Generated

जाति जनगणना से क्या होगा

पिछले साल सरकार ने घोषणा की थी कि अगली जनगणना में जातियों की गिनती भी की जाएगी. इसकी मांग देश के पिछड़े वर्गों के लोग पिछले काफी समय से कर रहे थे. सरकार ने 16 जून 2025 को जनगणना का नोटिफिकेशन जारी किया. लेकिन इसमें यह कहीं नहीं था कि जातियों की गणना भी इस जनगणना में की जाएगी. इसके बाद से लोग इस बात के संदेह जताने लगे कि सरकार शायद जाति जनगणना न कराए. लेकिन अभी भी इसको लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है. इससे पहले की जनगणना में केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और धार्मिक अल्पसंख्यकों की गिनती की जाती है. सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले नेताओं के दबाव में आकर 2010 में तत्कालीन मनमोहन सरकार ने जाति जनगणना पर सैद्धांतिक सहमति दी थी. लेकिन जाति का कॉलम जनगणना के फार्म में शामिल नहीं किया गया. इसकी जगह सरकार ने जातियों का सामाजिक-आर्थिक करवाया, लेकिन इसकी रिपोर्ट कभी जारी नहीं की गई. 

सरकार की घोषणा के बाद से एक बार फिर से जातिगत जनगणना की उम्मीदें बंधी हैं कि इस बार जातियों की गणना भी की जाएगी. इसका सबसे अधिक फायदा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को मिलेगा. क्योंकि इससे देश की आबादी में उनकी सही संख्या का पता चलेगा. इसके बाद ओबीसी के लोग अपने लिए और कल्याण योजनाओं और आरक्षण बढ़ाने की मांग कर सकते हैं. क्योंकि एससी-एसटी का आरक्षण उनकी जनसंख्या के बराबर दिया जाता है. हालांकि सरकार ने 2019 में 103वां संविधान संशोधन कर सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी का आरक्षण दिया था. लेकिन सरकार ने इसके लिए कोई सर्वे नहीं कराया था कि यह 10 फीसदी का आंकड़ा कहां से आया.

क्या बढ़ेगी आरक्षण की सीमा

ओबीसी को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 27 फीसदी आरक्षण दिया जाता है. इस 27 फीसदी आरक्षण का भी कोई आधार नहीं है, क्योंकि ओबीसी का तर्क है कि उनकी जनसंख्या करीब 50 फीसदी है, इसलिए उनका आरक्षण भी 50 फीसदी होना चाहिए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि आरक्षण किसी भी सूरत में 50 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए. हालांकि इसे दरकिनार कर तमिलनाडु 69 फीसदी आरक्षण देता है. ऐसा इसलिए है कि तमिलनाडु के आरक्षण को नौवीं अनुसूची में रखा गया है, जिसकी न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती है. ऐसे में जातिगत जनसंख्या के आंकड़े सामने आने के बाद ओबीसी अपनी जनसंख्या के मुताबिक आरक्षण की मांग कर सकता है, जैसा कि एससी-एसटी को दिया जाता है. इसके लिए सरकार को संविधान संशोधन करना होगा. 

गांव से शहर की ओर पलायन

हाल के सालों में लोगों ने गांवों से शहर की ओर पलायन किया है. इससे शहरों की बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव तेजी से बढ़ा है. इसकी वजहों से शहरों की स्थिति भयावह होती जा रही है. जनगणना के पहले चरण में मकानों, उनमें रहने वाले लोगों की संख्या,मकान की स्थिति और दूसरी तरह की जानकारियां दर्ज की जाएगी. इससे शहरों और गांवों की स्थिति का ठीक-ठीक आंकड़ा सामने आएगा. ये आंकड़े कल्याणकारी और विकास की योजना बनाने वालों के लिए कई तरह की सहूलियत लेकर आएंगे. इससे शहरों और गांवों के बेहतर विकास की योजनाएं ठीक से बनाई जा सकेंगी. 

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