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जिस प्रोजेक्ट को माना जा रहा था 'फेल', अब उसने पकड़ी दमदार रफ्तार, भारत के पहले स्वदेशी जेट इंजन की कहानी

HAL के स्वदेशी HTFE-25 टर्बोफैन इंजन ने अपने कोर परीक्षण में 99.5% डिजाइन स्पीड हासिल कर महत्वपूर्ण सफलता दर्ज की है.

जिस प्रोजेक्ट को माना जा रहा था 'फेल', अब उसने पकड़ी दमदार रफ्तार, भारत के पहले स्वदेशी जेट इंजन की कहानी
भारत का अपना Turbofan Engine
HAL
  • HAL ने करीब दस वर्षों की मेहनत के बाद स्वदेशी टर्बोफैन इंजन HTFE-25 का सफल परीक्षण किया
  • HTFE-25 इंजन 25 किलो न्यूटन थ्रस्ट देने वाला लो-बाईपास ट्विन-स्पूल टर्बोफैन इंजन है
  • इस इंजन में आधुनिक 3D प्रिंटिंग तकनीक से बने टाइटेनियम-अल्युमीनियम-वैनेडियम मिश्रधातु के पुर्जे हैं

भारत रक्षा क्षेत्र में खूब तरक्की कर रहा है. भारत ने अग्नि और ब्रह्मोज जैसी खतरनाक मिसाइल बनाई हैं. अब भारत अपना स्वदेशी टर्बोफैन इंजन बना रहा है. यह कोई आम इंजन नहीं है, यह बड़े विमानों में लगाया जाता है. यह इंजन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने तैयार किया है. भारत के पहले स्वदेशी टर्बोफैन इंजन (HTFE-25) को एक समय फेल माना जाने लगा था. लेकिन HAL ने करीब 10 साल की कड़ी मेहनत के बाद  मिशन में वो कामयाबी हासिल कर ली है, जिसकी खूब तारीफ हो रही है. आखिर ये टर्बोफैन इंजन मिशन क्या है? आइए बताते हैं.

HALने स्वदेशी HTFE-25 इंजन के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से (कोर) का कड़ा परीक्षण किया गया, जिसमें इसने अपनी अधिकतम डिजाइन स्पीड का 99.5 प्रतिशत सफलतापूर्वक हासिल कर लिया है. एक दशक के लंबे संघर्ष और 'फेलियर' के टैग के बाद मिली यह सफलता साबित करती है कि भारत का यह स्वदेशी सपना अब सच होने की दहलीज पर है.

क्या है HTFE-25?

हिंदुस्तान टर्बोफैन इंजन-25 (HTFE-25) एक स्वदेशी विमान इंजन है, जिसे 25 किलो न्यूटन (kN) थ्रस्ट पैदा करने के लिए डेवलेप किया जा रहा है. इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 2013 में बेंगलुरु स्थित HAL के एयरो इंजन रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर (AERDC) में हुई थी.

यह एक लो-बाईपास, ट्विन-स्पूल टर्बोफैन इंजन है, जिसमें 3-स्टेज लो-प्रेशर कंप्रेसर, 5-स्टेज हाई-प्रेशर कंप्रेसर और एयर-कूल्ड टरबाइन ब्लेड का इस्तेमाल किया गया है.

3D प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल

इंजन में आधुनिक 3D-प्रिंटेड टाइटेनियम-एल्युमीनियम-वैनेडियम (Ti-6Al-4V) अलॉय के पुर्जों का इस्तेमाल किया गया है. इससे इंजन का वजन कम होता है, मजबूती बढ़ती है और बेहतर थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो मिलता है. HTFE-25 का थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो लगभग 5.56 बताया गया है और यह करीब 11 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ान के लिए सक्षम है.

किन विमानों में हो सकता है इस्तेमाल?

यह इंजन विशेष रूप से बेसिक मिलिट्री ट्रेनर विमान, एडवांस्ड ट्रेनर विमान, छोटे बिजनेस जेट, भारी ड्रोन (UAV) और भविष्य के स्वदेशी मानव रहित कॉम्बैट प्लेटफॉर्म के लिए तैयार किया जा रहा है. HAL के अनुसार, सिंगल इंजन कॉन्फिगरेशन में यह लगभग 5 टन तक के विमान को शक्ति दे सकता है. ट्विन इंजन कॉन्फिगरेशन में यह 9 टन तक के विमान के लिए उपयोगी हो सकता है. इसका संभावित उपयोग HJT-36 सितारा और CATS जैसे प्लेटफॉर्म में भी हो सकता है.

क्यों महत्वपूर्ण है 99.5% कोर स्पीड?

एक्सपर्ट्स के अनुसार यह उपलब्धि केवल एक संख्या नहीं है. किसी भी टर्बोफैन इंजन का सबसे जटिल हिस्सा उसका कोर इंजन होता है, जिसमें हाई-प्रेशर कंप्रेसर, कंबस्टर और हाई-प्रेशर टरबाइन शामिल होते हैं. कोर सेक्शन का 99.5% डिजाइन स्पीड तक पहुंचना यह दिखाता है कि इंजन अत्यधिक तापमान झेल सकता है और उच्च दबाव में काम कर सकता है. इसके अलावा यह भारी यांत्रिक तनाव सहन कर सकता है. यानी इंजन की सबसे कठिन इंजीनियरिंग चुनौतियों को काफी हद तक पार कर लिया गया है.

एक दशक का लंबा सफर

HTFE-25 का विकास सफर आसान नहीं रहा है. दिसंबर 2015 में कोर इंजन पहली बार सफलतापूर्वक चला. 2019 तक 300 से अधिक परीक्षण पूरे किए गए. इसके बाद कई वर्षों तक प्रगति अपेक्षाकृत धीमी रही. 2024 के मध्य तक पूरा टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर इंजन अपनी डिजाइन स्पीड का केवल 55 प्रतिशत ही हासिल कर पाया था, जिसके कारण परियोजना की आलोचना हुई.

HAL ने कैसे बढ़ाई रफ्तार?

इन चुनौतियों से निपटने के लिए HAL ने दिसंबर 2023 में लगभग 10000 वर्ग मीटर क्षेत्र में नई डिजाइन और टेस्टिंग फैसिलिटी शुरू की. नई फैसिलिटी के बाद टेस्टिंग क्षमता बढ़ी और विकास प्रक्रिया में तेजी आई.

इस प्रोजेकिट की एक खास बात यह भी है कि HAL ने इसके विकास के लिए मुख्य रूप से अपने आंतरिक कॉर्पोरेट फंड का इस्तेमाल किया है. यानी परियोजना सीधे तौर पर वायुसेना या रक्षा मंत्रालय की फंडिंग पर निर्भर नहीं रही. इससे तकनीकी विकास में स्वतंत्रता मिली.

HAL का लक्ष्य इस इंजन को 2030 तक उत्पादन के लिए तैयार करना है. भारत लंबे समय से सैन्य और नागरिक विमानों के लिए विदेशी इंजनों पर निर्भर रहा है. ऐसे में HTFE-25 की सफलता इंजन तकनीक में आत्मनिर्भरता बढ़ाएगी, आयात पर निर्भरता कम करेगी, ड्रोन और ट्रेनर विमान कार्यक्रमों को मजबूत करेगी और भविष्य के स्वदेशी विमान विकास के लिए आधार तैयार करेगी.

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