झारखंड का युवा एक बार फिर सड़कों पर है. सोमवार, 10 अगस्त को JPSC-JSSC रिफॉर्म्स मंच के बैनर तले बड़ी संख्या में छात्र झारखंड विधानसभा की ओर मार्च करने निकल पड़े. भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ छात्रों का आंदोलन अब तेज होता दिख रहा है. रांची में भारी पुलिस बल तैनात है, लेकिन प्रदर्शनकारियों के तेवर कम नहीं हुए हैं. दरअसल, झारखंड की सड़कों पर आंदोलन सिर्फ नारे और पोस्टरों तक सीमित नहीं रहा है. यहां विरोध की अपनी एक आवाज है, अपना एक गीत है, जो हर बड़े आंदोलन में फिर सुनाई देने लगता है- ‘गांव छोड़ब नाहीं.'
यह झारखंड के प्रसिद्ध जन-आंदोलन और प्रतिरोध का गीत है, जिसे फिल्मकार मेघनाद ने लिखा और लोकगायक पद्मश्री मधु मंसूरी हंसमुख ने अपनी आवाज दी. आखिर इस गीत में ऐसा क्या है कि दशकों बाद भी यह झारखंड के आंदोलनों की आवाज बना हुआ है?
गाने के बोल में छिपा झारखंड का दर्द
इस गाने में किस तरह झारखंड के दर्द, वहां के आदिवासीऔर मेहनतकश समुदायों के बीच विस्थापन, खदानों, और शोषण के खिलाफ संघर्ष की पहचान को जगह दी गई है, वह इस गाने के बोल में साफ झलकता है. आप पहले गाने के बोल देखिए
गांव छोड़ब नहीं, जंगल छोड़ब नाहीं,
माई माटी छोड़ब नही लड़ाई छोड़ब नाहीं
बांध बनाए, गांव डुबोए, कारखाना बनाए ,
जंगल काटे, खदान खोदे , सेंक्चुरी बनाए,
जल जंगल जमीन छोडी हमिन कहा कहा जाए,
विकास के भगवान बता हम कैसे जान बचाए
जमुना सुखी, नर्मदा सुखी, सुखी सुवर्णरेखा,
गंगा बनी गन्दी नाली, कृष्णा काली रेखा,
तुम पियोगे पेप्सी कोला, बिस्लरी का पानी,
हम कैसे अपना प्यास बुझाए, पीकर कचरा पानी?
पुरखे थे क्या मूरख जो वे जंगल को बचाए,
धरती रखी हरी भरी नदी मधु बहाए,
तेरी हवस में जल गई धरती, लुट गई हरियाली,
मचली मर गई, पंछी उड गई जाने किस दिशाए
मंत्री बने कम्पनी के दलाल हम से जमीन छीनी,
उनको बचाने लेकर आए साथ में पल्टनी
हो… अफसर बने है राजा ठेकेदार बने धनी,
गांव हमारी बन गई है उनकी कोलोनी
बिरसा पुकारे एकजुट होवो छोड़ो ये खामोशी,
मछवारे आवो, दलित आवो, आवो आदिवासी,
हो खेत खालीहान से जागो, नगाड़ा बजाओ,
लड़ाई छोड़ी चारा नही सुनो देशवासी
आज भी भारत के जंगलों और पहाड़ों में इस गीत की आवाज सुनाई देती है- गांव नहीं छोड़ेंगे, अपनी मिट्टी नहीं छोड़ेंगे. दरअसल, ‘गांव छोड़ब नाहीं' सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि उन आदिवासियों और मेहनतकश लोगों के संघर्ष की आवाज है, जिनके सामने विकास परियोजनाओं के नाम पर विस्थापन, जंगलों की कटाई और जमीन छिनने का खतरा खड़ा होता रहा है. इसकी सबसे बड़ी ताकत यही है कि इसके बोल किसी एक गांव या एक दौर की कहानी नहीं कहते, बल्कि देशभर में हाशिए पर धकेले जा रहे समुदायों के दर्द को सामने रखते हैं. और इसी वजह से दशकों बाद भी जब कहीं हक, जमीन और अस्तित्व की लड़ाई छिड़ती है, तो यह गीत फिर गूंज उठता है- एक सवाल के साथ, आखिर विकास किसके लिए है और उसकी कीमत कौन चुका रहा है?
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