महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके को राज्य का सबसे अधिक सूखाग्रस्त इलाका माना जाता है. इसी इलाके के नागपुर जिले के एक गांव की रहने वाली सुनीता अंबादास चाफले अपने काम की वजह से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रही हैं. सुनीता ने जैविक खेती और देसी बीजों के संरक्षण को अपने रोजगार का जरिया बनाया है. वो अपनी डेढ़ एकड़ जमीन पर जैविक खेती करती हैं. वो देसी बीजों का संरक्षण और संवर्धन भी करती हैं. बीजों के संरक्षण का काम उन्होंने अपनी दादी से सीखा था. इसके अलावा वो लोगों को बारिश के पानी के संरक्षण और जैविक खेती कैसे करें इसके गुर भी बताती हैं. इसकी वजह से उन्हें कई सम्मान भी मिल चुके हैं. बीते बुधवार को भारतीय किसान संघ ने उन्हें सम्मानित किया. इसी दौरान उन्होंने एनडीटीवी से बातचीत की.
कैसा रहा है सुनीता अंबादास चाफले का सफर
सुनीता ने बीज संरक्षण का काम अपनी दादी से सीखा. वो बताती हैं कि उनकी दादी के पास करीब 50 तरह के देसी बीज थे. उनको देखकर ही मेरे अंदर भी देसी बीजों का संकलन का शौक पैदा हुआ. उनकी दादी ने जिन बीजों का संकलन किया था, उनसे ही उन्होंने अपना काम शुरू किया. उनकी दादी के पास 50 तरह के देसी बीज थे. लेकिन सुनीता ने संकलित बीजों की संख्या बढ़ाकर 65 तक पहुंचा दी. उन्होंने बताया कि अगले साल तक इन बीजों की संख्या बढ़कर 70 हो जाएगी. कौन-कौन से बीजों का संकलन किया है, इस सवाल के जवाब में सुनीता कहती हैं कि उनके पास सफेद और लाल भिंडी है. टमाटर में उनके पास चेरी टमाटर, काशी टमाटर और बड़ा टमाटर के बीज हैं. उनके पास कद्दू और पेठा के भी बीज हैं. वो बताती हैं कि उनके पास एक-एक फल की पांच-पांच प्रजातियों के बीज हैं.
सुनीता बताती हैं कि जैसे ही उन्हें पता चलता है कि कहीं पर किसी व्यक्ति के पास कोई अच्छा देसी बीज है तो वो उसके पास चली जाती हैं और उनसे बीज लेकर आती हैं. उन्होंने बताया कि वो जिसे भी देसी बीज देती हैं, वो उस बीज से पैदा हुआ दो फल उस व्यक्ति से लेकर आती हैं और उनके बीज निकालकर रख लेती हैं. इस तरह से उनका संग्रह बढ़ता रहता है. इन बीजों को सुनीता अपने घर में ही मिट्टी के बर्तनों में रखती हैं. जब ये बीज उनकी जरूरत से ज्यादा होने लगते हैं तब ही वो उन्हें बेचती हैं.
यह काम सुनीता अच्छा खाने और अच्छे स्वास्थ्य के लिए करती हैं. वो दूसरे लोगों से भी कहती हैं कि आप भी इस दिशा में आगे बढ़ें. इसी काम को करते हुए सुनीता देश के अलग-अलग शहरों में जाकर अपने बीजों का स्टाल लगा चुकी हैं. वो कहती हैं कि कई शहरों में लगने वाली प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाने के लिए उन्हें बुलाया जाता है.
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सुनीता बचपन से ही अपने पैरों पर खड़ा होकर अपना काम-धंधा करना चाहती थीं. लेकिन मौका नहीं मिला. शादी के बाद सब ठीक चल रहा था. लेकिन करीब 16 साल पहले पति की मौत हो गई. इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी सुनीता पर आ गई. दुख की इस घड़ी में सुनीता ने हार नहीं मानी. वो खेती-बाड़ी करती रहीं और बच्चों को पढ़ाती रहीं. वो अपने पति की ही तरह धान-गेहूं के अलावा मिर्च की खेती करती थीं. लेकिन इससे उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. इसके बाद उन्होंने कुछ अलग करने की सोची. करीब 10 साल पहले वो जैविक खेती की ओर मुड़ीं. वो बताती हैं कि एक व्यक्ति ने उन्हें भारतीय किसान संघ से जोड़ा. वहां से मिली सीख के बाद उन्होंने जैविक खेती को अपनाया.

सुनीता अंबादास चाफले किसान सम्मेलनों और प्रदर्शनियों में अपने देसी बीजों के स्टॉल लगाकर बेचती हैं.
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सुनीता अंबादास चाफले के बचपन का सपना क्या था
सुनीता बताती हैं कि बचपन से ही उनका सपना था कि मैं अपना काम-धंधा शुरू करुं. उनके गांव की जनसंख्या करीब 500 है. उनके गांव के किसान पारंपरिक खेती-बाड़ी करते हैं. लेकिन इसके विपरीत सुनीता ने कुछ लीक से हटकर करने की सोची. वो बताती हैं कि अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए उन्होंने जैविक खेती करना शुरू किया. उन्होंने अपने डेढ़ एकड़ खेत में इसे करना शुरू किया. वो अपने खेत को टुकड़ों में बांट कर अनाज के अलावा शाक-भाजी और फूलों की खेती करती हैं. सुनीता के पति केवल एक फसल ही लेते थे. लेकिन वो पूरे साल कोई न कोई फसल पैदा करती हैं.
बीज संरक्षण और जैविक खेती के हुनर को अपनी दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने के सवाल पर सुनीता कहती हैं कि उनके बेटे ने उनका काम सीख लिया है. वह कामकाज में मेरी मदद करता है. इसके अलावा सुनीता के भतीजे-भतीजी भी उनका काम में हाथ बंटाते हैं. इस तरह सुनीता अपना हुनर अपनी दूसरी पीढ़ी को सौंप रही हैं. लेकिन वह यह भी बताती हैं कि उनका बेटा विक्की इन दिनों 12वीं पास करने के बाद आईटीआई में पढ़ रहा है. वो इस काम को पार्ट टाइम जॉब की ही तरह करना चाहता है. उसका इरादा पढ़-लिखकर नौकरी करने का है. सुनीता के पिता और ससुर दोनों की मौत हो चुकी है. इस वजह से वो अपनी मां और अपनी सास को अपने साथ ही रखती हैं.
सुनीता जहां-जहां भी सम्मेलनों और प्रदर्शनियों में जाती हैं, वहां-वहां वो अपना स्टॉल लगाती हैं. वो अपने साथ बीज के पैकेट ले जाती हैं. वो शाक-भाजी और फल-फूल के बीजों के इन पैकेटों को 10-10 रुपये प्रति पैकेट के हिसाब से बेचती हैं. कुछ पैकेट अधिक कीमत के भी हैं. इससे उनकी आय भी बढ़ी है. उन्होंने बताया कि इस तरह से उन्होंने इस साल अब तक तीन लाख रुपये कमाए हैं.

महिला किसानों को सम्मान देने के लिए भारतीय किसान संघ की ओर से दिल्ली में आयोजित सम्मान समारोह में लगा सुनीता अंबादास चाफले का स्टॉल.
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सोशल मीडिया से भी बढ़ा सुनीता अंबादास चाफले का कारोबार
सुनीता ने अपने कामकाज को तकनीक से भी जोड़ा है. देसी बीजों के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने अपना यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज बनाया है. सोशल मीडिया पर देखकर लोग उनसे बीजों के लिए संपर्क करते हैं. वो ऐसे लोगों को कूरियर के जरिए देसी बीज भेज देती हैं.
वो 60 किसानों का एक स्वयं सहायता समूह भी चलाती हैं. इसमें शामिल सभी किसान मिलकर जैविक खेती करते हैं. सुनीता खेतों में डालने के लिए उर्वरक भी जैविक तरीके से पशुओं को गोबर और दूसरी वनस्पतियों से ही तैयार करते हैं. इसे वो अपने खेतों में डालती हैं और अपने समूह के दूसरे किसानों को भी उपलब्ध कराती हैं.
सुनीता ने दूसरे किसानों से अपील की कि वो रासायनिक खाद पर आधारित खेती को छोड़कर जैविक खेती अपनाएं. इस तरह वो खुद भी शुद्ध खाना खाएं, अपने बच्चों को खिलाएं और दूसरों को जैविक उत्पाद खिलाएं. इससे लोगों का स्वास्थ्य ठीक रहेगा. उन्होंने बताया कि वो अपने आसपास के छह तालुका के लोगों को जैविक खेती के बारे में बता चुकी हैं. वो हर 15 दिन पर इन गांवों में जाती हैं. वो महिलाओं का भी स्वयं सहायता समूह चलाती हैं. इसकी लीडर वो खुद हैं.
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