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नब्ज टटोलतीं वो बेबाक, विश्वसनीय रिपोर्ट्स जो मार्क टली की पहचान बनीं

मार्क टली- 1971 के भारत-पाक युद्ध,1975 के आपातकाल; 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, सिख विरोधी दंगे, भोपाल गैस त्रासदी से लेकर 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस तक की आंखोदेखी को मुखर अंदाज में पेश करना जिनकी पहचान बना.

नब्ज टटोलतीं वो बेबाक, विश्वसनीय रिपोर्ट्स जो मार्क टली की पहचान बनीं
AFP
  • भारत में मार्क टली की कई रिपोर्ट्स ने तत्कालीन सरकारों के लिए मुश्किलें खड़ी कीं और राजनीति पर असर छोड़ा.
  • इंदिरा गांधी की हत्या की सबसे पहले पुष्टि करने वाले मार्क टली ने बाबरी मस्जिद विध्वंस पर भी बेबाकी से लिखा.
  • किताबों में वो लिखे- भारत में एक तरह का अंधा सेक्युलरिज्म है. यह भी कि- गर्व है पूरे भारत से अपने रिश्ते पर.
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संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन की तारीख 24 अक्टूबर से ठीक 10 साल पहले इसी दिन 1935 में कोलकाता के टॉलीगंज में जन्में मार्क टली की पत्रकारिता और उनकी रिपोर्ट्स ने भारतीय राजनीति और समाज पर गहरा असर छोड़ा. रविवार (25.01.2026) को मार्क टली का नई दिल्ली में निधन हो गया. निर्भीक, निडर, प्रखर, बेबाक, भरोसेमंद, विश्वसनीय. ऐसे कितने ही शब्द उनके बारे में अपने शोक संदेशों में जानेमाने लोगों ने, यहां तक की उनके विरोधियों ने भी सोशल मीडिया पर लिखा. भारत में की गई उनकी अनेकों रिपोर्ट्स ने तत्कालीन सरकारों के लिए मुश्किलें खड़ी कीं और देश में राजनीतिक हलचल पैदा की थीं. ये वो रिपोर्ट्स थी जिन्होंने मार्क टली को सर मार्क टली बनाया.

भारत-पाक युद्ध (1971)

मार्क टली ने इसे पाकिस्तानी सेना की 'घोर अपमानजनक हार' और बांग्लादेश के एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उदय होने को ऐतिहासिक घटना बताया.

आपातकाल (1975-77)

1975 में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लगाए गए आपातकाल के दौरान मार्क टली ने सेंसरशिप को मानने से इनकार कर दिया था. इसकी वजह से उन्हें भारत से निष्कासित कर दिया गया था. तब बीबीसी की रिपोर्ट्स भारतवासियों के लिए सूचना का एकमात्र विश्वसनीय स्रोत बन गई थीं, जिससे सरकार की साख पर गहरा असर पड़ा. अपनी किताब में उन्होंने लिखा, "आखिरकार, आपातकाल लोकतंत्र की कहानी में सिर्फ एक कॉमा साबित हुआ."

जुल्फिकार भुट्टो मुकदमा और फांसी (1979)

मार्क टली ने पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के खिलाफ चले मुकदमे और 1979 में उन्हें दी गई फांसी को भी कवर किया था. हालांकि वो कहते थे ज़ुल्फिकार अली भुट्टो की फांसी की स्टोरी मेरी स्टोरी नहीं थी, वो भुट्टो की कहानी थी. 

ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984)

उन्होंने जून 1984 में इंदिरा गांधी सरकार के ऑपरेशन ब्लू स्टार को एक 'बड़ी रणनीतिक भूल' बताते हुए अपनी किताब Amritsar: Mrs Gandhi's Last Battle में लिखा कि कैसे सैन्य कार्रवाई में सरकारी दावों से कहीं अधिक नुकसान और मौतें हुई थीं, जिससे सरकार की बहुत आलोचना हुई.

इंदिरा गांधी की हत्या (1984)

31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की खबर को सबसे पहले बीबीसी ने पुष्टि करते हुए लिखा कि भारतीय मीडिया इसे बताने में विफल रहा, जिससे उनकी रिपोर्टिंग की विश्वसनीयता और बढ़ गई. तब आकाशवाणी और दूरदर्शन ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की पुष्टि करने में देरी की थी. तब मार्क टली और उनके सहयोगी सतीश जैकब की बीबीसी रिपोर्ट ने सबसे पहले इस खबर को पूरी दुनिया और भारत के लोगों तक पहुंचाया था.

सिख विरोधी दंगे (1984)

31 अक्टूबर से 3 नवंबर 1984 के बीच हुए सिख विरोधी दंगों पर उन्होंने लिखा कि कैसे राजधानी दिल्ली में सिखों के खिलाफ हिंसा के दौरान कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी.

भोपाल गैस त्रासदी (1984)

2 और 3 दिसंबर को हुए भोपाल गैस त्रासदी के बारे में मार्ट टली ने लिखा कि यह दुनिया की सबसे भयानक औद्योगिक त्रासदी है. उन्होंने इसे कॉरपोरेट लापरवाही और भयावह मानवीय संकट बताते हुए पूरी दुनिया के सामने उजागर किया.

राजीव गांधी सरकार का पतन (1989)

मार्क टली ने स्वयं स्वीकार किया था कि 1989 के आम चुनाव के दौरान उनकी रिपोर्ट्स और कवरेज ने राजीव गांधी की सरकार को गिराने में एक भूमिका निभाई थी. उन पर अक्सर चुनावी माहौल को प्रभावित करने वाली रिपोर्टिंग का आरोप लगा.

राजीव गांधी की हत्या (1991)

21 मई 1991 को जब तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में हुए आत्मघाती हमले में राजीव गांधी का निधन हो गया तब भी बीबीसी के लिए मार्क टली ने ही इसकी रिपोर्टिंग की थी. उन्होंने इसे भारतीय राजनीति के एक हिंसक अध्याय का अंत बताया था और बाद में श्रीलंका में भारतीय सेना को भेजे जाने के राजीव गांधी के फैसले की आलोचना भी की थी.

बाबरी मस्जिद विध्वंस (1992)

मार्क टली ने भारतीय इतिहास की इस घटना को भी बतौर चश्मदीद कवर किया और लिखा कि वहां मौजूद भीड़ पत्रकारों के प्रति बेहद आक्रामक थी, जिससे उन्हें जान बचाने के लिए एक मंदिर में शरण लेनी पड़ी. 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दौरान टली वहीं मौजूद थे. उन्होंने लिखा कि भीड़ ने उन पर हमला करने की कोशिश की और उन्हें एक मंदिर में छिपकर अपनी जान बचानी पड़ी.

बचपन में हिंदी सीखने की मनाही थी

मार्ट टली का बचपन भारत में ही बीता पर उन्हें हिंदी सीखने की मनाही थी. वो खुद हिंदी बोलना और लिखना चाहते थे. लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए उनके पीछे एक आया को लगा दिया गया. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में मार्ट टली ने बताया कि एक बार जब वो अपने पिता के भारतीय ड्राइवर के साथ हिंदी में बात करने की कोशिश कर रहे थे तो उनकी आया ने उन्हें थप्पड़ जड़ते हुए सख्ती से कहा था कि ये "आपकी जबान नहीं है." 

बीबीसी में आने की कहानी

मार्क टली ने बीबीसी की एक इंटरव्यू में बीबीसी से जुड़ने और भारत में पत्रकारिता के बारे में बताया था. टली ने बताया था कि एक विज्ञापन के जरिए उन्होंने बीबीसी में आवेदन किया. शुरू में उन्होंने वहां पर्सनल डिपार्टमेंट में काम किया. वहां से एक साल बाद भारत आने का मौका मिला क्योंकि उन्हें थोड़ी बहुत हिंदी आती थी. फिर जब भारत में आए तब शुरू-शुरू में पर्सनल विभाग में ही आए फिर उन्होंने खुद ही पत्रकारिता करने का फैसला किया. पहली स्टोरी विंटेज कार पर एक फीचर थी. उस दौरान हिंदी अखबार पढ़ कर हिंदी सीखना शुरू किए. उन्होंने कहा कि वो बीबीसी से जुड़े इसी वजह से उनका नाम भी बड़ा हुआ.

"मुझे लगता है आप जासूसी करते हैं"

जब देश में इमरजेंसी लगी तब विद्याचरण शुक्ल केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री थे. मार्क टली तब इमरजेंसी पर कई खबरें लिख रहे थे. उन्हें सूचना-प्रसारण मंत्रालय बुलाया गया. उनसे विद्याचरण शुक्ल ने पूछा कि उन्हें खबरें कैसे मिलती हैं. तब उन्होंने कहा कि हमारे पास पत्रकार हैं. विद्याचरण शुक्ल ने उनसे कहा कि मुझे लगता है कि आप जासूसी करते हैं. मार्क टली ने कहा कि आपको ऐसा क्यों लगता है कि मैं जासूस हूं. तब उनका कहना था कि अगर जासूस नहीं हैं तो हिंदी क्यों सीखी?

बीबीसी छोड़ने की कहानी

मार्क टली ने बीबीसी के डायरेक्टर जनरल जॉन बिर्ट पर बीबीसी को डर के साये में चलाने का आरोप लगाया था. उनका मानना था कि बिर्ट की प्रबंधन शैली ने संस्थान के भीतर डर का माहौल पैदा कर दिया है. टली ने कहा कि बीबीसी प्रबंधक उन्हें चुप करना चाहते थे. उन्होंने आरोप लगाया कि संस्थान उन पर ऐसी शर्तें थोप रहा था जिससे वे सार्वजनिक रूप से अपने स्टैंड का बचाव नहीं कर सकते थे. रिपोर्ट्स के अनुसार, जॉन बिर्ट ने एक निजी रात्रिभोज के दौरान मार्क टली को  दिल्ली ब्रांच मैनेजर कहकर संबोधित किया था, जिसे टली ने अपनी पत्रकारिता की वरिष्ठता और अनुभव का अपमान माना. 1994 में बीबीसी से इस्तीफा देने के बावजूद मार्क टली भारत में ही रहे और उन्होंने बीबीसी रेडियो 4 के लिए एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में समथिंग अंडरस्टूड जैसे कार्यक्रमों को 2019 तक जारी रखा.

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Photo Credit: Penguin Publication

मार्क टली की किताबें

मार्क टली की कलम की धार केवल बीबीसी की पत्रकारिता तक ही सीमित नहीं रहीं. भारत को दुनिया की जुबान में उतारने वाले उनके शब्दों ने किताबों का रूप भी लिया. पैदाइश से अपने जीवन के दो तिहाई हिस्से भारत में गुजारने और यहां की विश्वसनीय रिपोर्टिंग के लिए पूरी दुनिया में ख्याति हासिल करने वाले मार्क टली को भारत सरकार ने 1992 में पद्म श्री और 2005 में पद्म भूषण से सम्मानित किया. वहीं 2002 में  उन्हें नाइटहुड की उपाधि दी गई जिससे वो सर मार्क टली बन गए. उन्होंने अपने अनुभव पर कई किताबें लिखीं.

  • Amritsar: Mrs Gandhi's Last Battle
  • No Full Stops in India
  • India in Slow Motion
  • India's Unending Journey
  • Non-Stop India
  • The Heart of India
  • Upcountry Tales
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Photo Credit: AFP

किताबों में मार्ट टली की बेबाकी

इन किताबों में मार्क टली ने धर्म, सेक्युलरिज्म, आस्था, ईश्वर, अपनी पहचान, भारत और इंग्लैंड की तुलना जैसे कई विषयों पर लिखा. बेबाकी यहां भी उनकी मजबूत हथियार थी.

धर्म और सेक्युलरिज्म पर अपनी किताब 'नो फुल स्टॉप इन इंडिया' में टली लिखते हैं, "इस देश में एक तरह का अंधा सेक्युलरिज्म है. अगर कोई हिंदू धर्म की बात करे तो उसे तुरंत कट्टरवादी कह दिया जाता है." टली लिखते हैं कि भारत में धर्म की बात करना अक्सर गलत तरीके से देखा जाता है, जबकि यह समाज की जड़ में मौजूद है.

इसी किताब में वो यह भी लिखते हैं, "मैं भारत एक कट्टर ईसाई बनकर आया था, लेकिन यहां रहकर मुझे लगा कि भगवान तक पहुंचने के कई रास्ते होते हैं.”

'इंडिया अनएंडिंग जर्नी' में मार्ट टली ने लिखा, "मैं भारत में पैदा हुआ, लेकिन मुझे सिखाया गया कि भारतीय कैसे नहीं बनना है.”

'इंडिया इन स्लो मोशन' में वो लिखते हैं, "भारत को जल्दी में नहीं समझा जा सकता. ये देश धीरे चलता है, लेकिन बहुत मजबूती से चलता है."

'द हार्ट ऑफ इंडिया' में उन्होंने लिखा, "मुझे गर्व है सिर्फ कोलकाता से नहीं, पूरे भारत से अपने रिश्ते पर."

ये शब्द उन्होंने केवल उकेरा नहीं बल्कि ताउम्र इसे जिया... पहली सांस से आखिरी सांस तक उन्होंने इसे निभाया, हर उस सच्चे भारतीय की तरह जो इस देश की शान हैं और रहेंगे. सही मायने में मार्क टली केवल एक पत्रकार नहीं थे, वो भारत की आत्मा के अनुवादक थे.

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