- डीपफेक और डिजिटल अरेस्ट को अलग अपराध के रूप में परिभाषित करने के लिए केंद्र सरकार नया विधेयक पेश कर सकती है.
- इस तरह के मामलों में सजा आज भी दी जाती है लेकिन अलग-अलग धाराओं के तहत कार्रवाई होती है.
- नया कानून बनने से सटीक परिभाषा के मुताबिक FIR, डिजिटल सबूत और पीड़ितों को राहत की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी.
अगर आपको कोई वीडियो कॉल आए और सामने पुलिस की वर्दी पहने व्यक्ति कहे कि आपके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग या ड्रग्स का केस दर्ज है. फिर वह आपको वीडियो कॉल पर लेकर घंटों डराए, बैंक खाते की न केवल जानकारी मांगे बल्कि पैसी भी ट्रांसफर करा ले. या फिर आपका चेहरा किसी अश्लील या फर्जी वीडियो में जोड़कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाए. तो पिछले दो-तीन साल में ऐसी घटनाएं अब अपवाद नहीं रह गई हैं. ये डिजिटल अरेस्ट और डीपफेक के रूप में देश में साइबर अपराध का नया चेहरा बनकर उभरे हैं. इनके बढ़ते मामलों के बीच केंद्र सरकार इन दोनों अपराधों के लिए अलग और स्पष्ट कानून लाने की तैयारी कर रही है.
SC ने ऐसा क्या कहा कि केंद्र ने इसी सत्र में कानून लाने की बात की?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि डीपफेक और डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों से निपटने के लिए मौजूदा कानूनी ढांचा पर्याप्त नहीं है. पीठ ने माना कि तकनीक बहुत तेजी से बदल रही है, जबकि कानून उसी गति से विकसित नहीं हो पाए हैं.
डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों में स्वतः संज्ञान लेते हुए, चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की बेंच ने कहा कि हालांकि कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है लेकिन इन अपराधों से निपटने के लिए कोई विशेष कानून नहीं है. ऐसे में संसद को इस दिशा में ठोस कानून बनाने पर विचार करना चाहिए.
एटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमाणी को संबोधित करते हुए बेंच ने कहा कि सरकार को डिजिटल अरेस्ट को दंडात्मक कानून के रूप में औपचारिक रूप से परिभाषित करने की जरूरत है.
उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल अरेस्ट में जबरन वसूली, लूट, संगठित अपराध जैसी बातें शामिल हैं. उन्होंने पूछा कि क्या सरकार को इस अपराध के लिए कड़ी सजा (जिसमें अपराधी की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान भी हो) वाला एक अलग कानून बनाना चाहिए?
जस्टिस बागची ने कहा कि नए आपराधिक कानून बनाना और उन्हें लागू करना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है.
उन्होंने कहा, "हमारे पास अब डीपफेक जैसी चीजें हैं, जिनका इस्तेमाल लोगों को गुमराह करने या धोखाधड़ी और किसी और के रूप में खुद को दिखाने (छद्म रूप बनाने) के लिए किया जा सकता है. संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत मिली अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल करके, हम न तो किसी अपराध को परिभाषित कर सकते हैं और न ही कोई नया अपराध बना सकते हैं."
इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेंच को बताया कि केंद्र ने इस मुद्दे पर उनसे सलाह-मशविरा किया है और संसद के मौजूदा सत्र में बिल पेश किए जाने की संभावना है.
डिजिटल अरेस्ट क्या होता है?
असल में डिजिटल अरेस्ट कोई कानूनी शब्द नहीं है. यह साइबर ठगों द्वारा अपनाया गया तरीका है, जिसमें वे खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग, आरबीआई, ट्राई या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को वीडियो कॉल पर डराते हैं. इसके बाद कहा जाता है कि आपके खिलाफ गंभीर मामला दर्ज है. गिरफ्तारी से बचना है तो जांच पूरी होने तक वीडियो कॉल बंद मत कीजिए. फिर धीरे-धीरे बैंक खाते, ओटीपी, निवेश और जमा पूंजी तक पहुंच बना ली जाती है. भारत में कोई भी जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर डिजिटल अरेस्ट नहीं कर सकती. यह पूरी तरह साइबर ठगी है.
डीपफेक क्या है?
डीपफेक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से तैयार किया गया ऐसा फर्जी वीडियो, ऑडियो या फोटो होता है, जिसमें किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज या हावभाव इस तरह बदल दिए जाते हैं कि वह बिल्कुल असली लगे. इसका इस्तेमाल कई तरह से हो रहा है. जैसे- महिलाओं की फर्जी अश्लील तस्वीरें और वीडियो बनाने में. नेताओं के फर्जी बयान फैलाने में. फिल्मी कलाकारों और सार्वजनिक हस्तियों की नकली वीडियो बनाने में. बैंकिंग और पहचान से जुड़ी धोखाधड़ी में. ब्लैकमेल और उगाही में.
अभी कौन-कौन से कानून लागू होते हैं?
वैसे तो इन अपराधों पर अभी कोई सीधा कानून नहीं है, पर अदालतें अपराधियों पर कार्रवाई करती हैं. उदाहरण के लिए. भारतीय न्याय संहिता की धोखाधड़ी, जालसाजी, किसी अन्य व्यक्ति की नकली पहचान बनाना, आपराधिक धमकी और उगाही से जुड़ी धाराएं. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की कई धाराएं. महिलाओं की अश्लील तस्वीरें या वीडियो प्रसारित करने से जुड़े प्रावधान. साइबर धोखाधड़ी और पहचान की चोरी से जुड़े प्रावधान. ये सब मौजूदा कानून में हैं और इनके तहत ही लोगों की गिरफ्तारियां भी की जा सकती हैं और उन्हें सजा भी दी जा सकती है.
फिर नया कानून लाने की जरूरत क्यों?
दरअसल, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसके लिए अलग से कानून बनाने यानी इसके तहत दंड को परिभाषित किए जाने की जरूरत है. ऐसा इसलिए है क्योंकि AI आधारित डीपफेक हो या डिजिटल अरेस्ट, दोनों के लिए कानून में फिलहाल स्टैंडअलोन या अलग से कोई परिभाषा नहीं है. यानी फिलहाल इसके आरोपियों को विभिन्न परिभाषित कानूनी शब्दों- जैसे कि जालसाजी, धोखाधड़ी आदि- के तहत आने वाले अपराधों के प्रावधानों के अनुसार सजा दी जा सकती है.
जब डिजिटल अरेस्ट में सुनाई गई पहली सजा
पिछले साल उत्तर प्रदेश में लखनऊ की एक अदालत ने साइबर फ्रॉड करने वाले शख्स को सात साल की सजा सुनाई. उस शख्स का नाम देबाशीष राय था और उसने खुद को सीबीआई अधिकारी बताकर एक महिला डॉक्टर को 10 से अधिक दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखा और उनसे 85 लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए थे.
उसे बाद में पुलिस ने गिरफ्तार किया और स्पेशल चीफ ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट आलोक कुमार के अदालत ने उसे धोखाधड़ी और जालसाजी की विभिन्न धाराओं समेत सूचना तकनीकी की धारा 66डी के तहत दोषी करार देते हुए 7 साल की सजा दी और 68 हजार रुपये जुर्माना लगाया था.
स्टैंडअलोन परिभाषा क्यों जरूरी है?
यानी ऐसे मामलों में सजा के लिए कानून पूरी तरह से अनुपस्थित नहीं है, पर स्पष्टता की कमी है. जांच एजेंसियों को अलग-अलग धाराओं का सहारा लेना पड़ता है. कुल मिलाकर एआई आधारित डीपफेक वीडियो हों या डिजिटल अरेस्ट, कानून में इनके लिए कोई सटीक या स्टैंडअलोन परिभाषा फिलहाल मौजूद नहीं है.
मान लीजिए किसी ने AI की मदद से एक महिला का डीपफेक वीडियो बनाया. अभी ऐसे मामले में पुलिस को आईटी एक्ट, अश्लील सामग्री, मानहानि और धोखाधड़ी जैसी कई धाराएं जोड़नी पड़ती हैं. इसके लिए कोई एक कानून यह स्पष्ट नहीं कहता कि डीपफेक बनाना अपने आप में अलग अपराध है. डिजिटल अरेस्ट के मामलों में भी यही स्थिति है.

Photo Credit: AFP
नया कानून लाने से क्या बदलेगा?
ऐसे में अगर सरकार अलग कानून लाती है या स्पष्ट अपराध की श्रेणी बनाती है, तो कई बड़े बदलाव संभव हैं.
पहला, सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि कानून बताएगा कि डीपफेक क्या है और डिजिटल अरेस्ट किसे कहा जाएगा. इससे अदालतों और जांच एजेंसियों के सामने व्याख्या का विवाद कम होगा.
दूसरा, आज कई मामलों में पुलिस को अलग-अलग धाराएं तलाशनी पड़ती हैं. लेकिन कानून बनने की सूरत में संबंधित अपराध के नाम से सीधे एफआईआर दर्ज किया जा सकेगा.
तीसरा, अगर अपराध की परिभाषा स्पष्ट होगी तो इलेक्ट्रॉनिक सबूत जुटाने, संबंधित प्लेटफॉर्म से जानकारी लेने और आरोप तय करने की प्रक्रिया आसान और तेज हो सकती है.
चौथा, इससे सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही भी बढ़ सकती है. बहुत संभव है कि विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म से ऐसे कंटेंट को हटाने, उन पर कार्रवाई करने के साथ ही उन्हें जांच एजेंसियों के साथ सहयोग करने की कानूनी जिम्मेदारी भी दी जाए.
पांचवां, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल बनाने वाली कंपनियों के लिए भी नियम बनाए जा सकते हैं. बहुत संभव है कि सरकार एआई कंपनियों के लिए उनके एआई टूल के लिए जोखिम मूल्यांकन, वाटरमार्किंग, कंटेंट लेबलिंग जैसे उपायों को लेकर कोई नियम भी बनाए.
छठा, इस कानून के तहत सबसे अहम यह होगा कि ऐसे अपराधों के पीड़ितों को न्याय मिले. विवादित सामग्री हटाने, खाते को फ्रीज करने और इससे पीड़ित शख्स की पहचान सुरक्षित रखने जैसी अहम चीजों को लेकर भी कानून में स्पष्ट प्रावधान हो सकता है.
क्या सजा हो सकती है?
यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार विधेयक में क्या प्रावधान लाती है.
हालांकि यह संभव है कि, डीपफेक बनाने के लिए और डिजिटल अरेस्ट के जरिए ठगी के लिए न्यूनतम और अधिकतम सजा का अलग से प्रावधान हो. इससे जुड़े संगठित साइबर गिरोहों के लिए ज्यादा कठोर दंड रखा जाए. बार-बार ऐसे अपराध करने वालों के लिए और भी सख्त प्रावधान हों. हालांकि यह अनुमानित है, अंतिम तस्वीर तो संसदीय विधेयक आने के बाद ही स्पष्ट होगी.
फिलहाल, डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में आम लोगों को क्या करना चाहिए?
अगर कोई वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर पैसे मांगता है या घंटों कॉल पर रहने को कहता है, तो समझिए यह धोखाधड़ी हो सकती है.
- याद रखिए कि भारत में कोई भी ऐसी सरकारी एजेंसी नहीं है, जो वीडियो कॉल कर के डिजिटल अरेस्ट करती हो.
- किसी को भी ओटीपी, बैंक डिटेल या यूपीआई पिन न दें.
- संदिग्ध कॉल तुरंत काट दें. टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर अब कई नंबर स्पैम डिस्प्ले करते हैं. ऐसे कॉल न उठाएं.
- आधिकारिक नंबर पर संबंधित एजेंसी से पुष्टि करें. साइबर हेल्पलाइन 1930 या राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर तुरंत शिकायत करें.
डीपफेक और डिजिटल अरेस्ट टेक्नोलॉजी पर आधारित ऐसे अपराध हैं, जिन्होंने पारंपरिक कानूनों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है. इन मामलों में कार्रवाई और सजा संभव है, और दिया भी जा रहा है लेकिन विभिन्न कानूनी प्रावधानों का सहारा लेना पड़ता है. ऐसे में केंद्र सरकार अगर इन्हें स्पष्ट रूप से अलग अपराध की श्रेणी में रखते हुए सजा का प्रावधान करती है तो जांच से लेकर अभियोजन तक में पीड़ितों को राहत और दोषियों को सजा दिलाने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और प्रभावी हो सकती है.
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