क्लाइमेट चेंज का असर हमारे स्वास्थ्य के साथ खेती और आजीविका पर भी पड़ रहा है. दार्जिलिंग के चाय बागान इसका एक उदाहरण हैं. यहां चाय की खेती शुरू हुए करीब 185 साल हो चुके हैं. बदलते तापमान और बारिश से चाय की पैदावार प्रभावित हो रही है.
दार्जिलिंग में चाय बागानों का इतिहास
North Bengal University की एक किताब के अनुसार दार्जिलिंग में चाय की खेती की शुरुआत 1841 में हुई. डॉ. कैंपबेल ने दार्जिलिंग और ऊपरी टुकवर क्षेत्र में चाय के पौधे लगाए.1856 के बाद दार्जिलिंग में व्यावसायिक स्तर पर चाय बागानों का विस्तार हुआ. 1870 से 1874 के बीच चाय बागानों की संख्या 56 से बढ़कर 113 हो गई. 1860 से 1864 के बीच जिंग, अंबूटिया, तकदाह और फुसेइंग जैसे चाय बागान दार्जिलिंग टी कंपनी ने विकसित किए. टुकवर और बादामटाम चाय बागान, लेबोंग टी कंपनी ने स्थापित किए. चाय बागानों के विस्तार के साथ बड़े खेती वाले भू-भाग को प्लांटेशन में बदला गया. 1900 से 1943 के बीच दार्जिलिंग थाना क्षेत्र में 71 चाय बागान 25,800 एकड़ क्षेत्र में फैले हुए थे.
चाय के लिए बड़ी संख्या में श्रमिक आए
किताब के अनुसार चाय उद्योग श्रम पर निर्भर था. बागानों में जंगल की सफाई, जमीन तैयार करने, जल निकासी, पौधे लगाने, सिंचाई, कीट नियंत्रण और चाय की पत्तियां तोड़ने से लेकर उन्हें कारखाने तक पहुंचाने का काम होता था. स्थानीय लोग कम मजदूरी के कारण चाय बागानों में काम करने के इच्छुक नहीं थे. इसलिए बिहार के छोटानागपुर क्षेत्र, मध्य प्रदेश के रायगढ़ और ओडिशा से श्रमिकों को लाया गया. दार्जिलिंग की पहाड़ियों में नेपाली भाषी श्रमिकों की भी बड़ी संख्या में भर्ती हुई.
चाय बागानों के विस्तार के साथ दार्जिलिंग की आबादी और सामाजिक संरचना में भी बदलाव आया. चाय उद्योग के लिए बाहर से आने वाले श्रमिक इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे.
अब मौसम चाय के लिए चुनौती बन रहा है
दार्जिलिंग की चाय पर साल 2025 में Atmosphere में “Impact of Changes in Rainfall and Temperature on Production of Darjeeling Tea in India” शोधपत्र प्रकाशित हुआ है. शोधकर्ताओं ने साल 1991 से 2023 तक दार्जिलिंग के तापमान, बारिश और चाय उत्पादन के आंकड़ों का अध्ययन किया. तापमान और बारिश के आंकड़े भारत मौसम विज्ञान विभाग और चाय उत्पादन के आंकड़े Tea Board of India से लिए गए.
अध्ययन में पाया गया कि बारिश के साथ अधिकतम और न्यूनतम तापमान भी बढ़ रहा है. अध्ययन की अवधि में चाय की खेती के क्षेत्र और चाय उत्पादन में गिरावट आई. शोधकर्ताओं के अनुसार बारिश में बढ़ोतरी बढ़ते तापमान के नकारात्मक प्रभाव को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं थी.
बारिश बढ़ी, फिर भी पैदावार में गिरावट
शोध में बताया गया है कि दार्जिलिंग में अधिकतम बारिश मानसून के महीनों में होती है और न्यूनतम तापमान सर्दियों के महीनों में रहता है. चाय की पैदावार के लिए मौसम का समय भी महत्वपूर्ण है. गर्मी और मानसून के दौरान अधिक तापमान चाय की पैदावार को प्रभावित करता है. दूसरी ओर सर्दियों में अधिक तापमान और गर्मी तथा सर्दी के महीनों में अधिक बारिश, चाय की पैदावार के लिए लाभकारी हो सकती है. शोधकर्ताओं के अनुसार चाय के लिए जरूरी तापमान और बारिश सही महीनों में नहीं मिलने से चाय की पैदावार में गिरावट आई.
चाय के स्वाद पर असर, जलवायु अनुकूल किस्मों पर जोर
दार्जिलिंग की चाय की पहचान उसके खास स्वाद और गुणवत्ता से है. शोधकर्ताओं के अनुसार बारिश सामान्य तौर पर चाय उत्पादन के लिए लाभकारी हो सकती है. लेकिन बारिश का अनिश्चित होना और बढ़ता तापमान इस लाभ को कम कर देता है. गलत समय पर बहुत अधिक बारिश चाय के खास स्वाद और गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकती है.
शोधकर्ताओं ने बदलते मौसम के बीच चाय उत्पादन को बनाए रखने के लिए जलवायु के अनुकूल चाय की किस्मों पर काम करने की जरूरत बताई है. गर्मी और सूखे को सहन करने वाली किस्मों के विकास पर जोर दिया गया है. बारिश के बदलते स्वरूप के बीच वर्षाजल संग्रह और सिंचाई व्यवस्था को बेहतर करने की बात भी शोध में कही गई है. आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों के साथ पारंपरिक खेती के ज्ञान को जोड़ने का सुझाव दिया गया है.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के भूगोल विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नेत्रानंद साहू इस शोधपत्र के लेखकों में शामिल हैं. वे कहते हैं कि GI टैग वाली दार्जिलिंग चाय अपने खास स्वाद और खुशबू के लिए दुनियाभर में जानी जाती है, लेकिन बदलता मौसम इस पर दबाव बढ़ा रहा है. साल 1991 से 2023 तक के तापमान और चाय उत्पादन के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि तापमान में बढ़ोतरी और चाय की पैदावार के बीच नकारात्मक संबंध है. बारिश में होने वाला बदलाव तापमान बढ़ने के असर को पूरी तरह खत्म नहीं कर पा रहा है.
डॉ. साहू कहते हैं कि जमीनी स्तर पर चाय उत्पादकों और स्थानीय लोगों से हुई बातचीत में भी मौसम में बदलाव, चाय उगाने की परिस्थितियों में बदलाव और घटती पैदावार को लेकर चिंता सामने आई. ये बातें शोध के निष्कर्षों से जुड़ती हैं और बदलते मौसम के हिसाब से चाय बागानों में बदलाव करने की जरूरत है.