मुख्य चुनाव आयुक्त रह चुके एसवाई कुरैशी ने देश के चुनावी सिस्टम में बड़े बदलाव का सुझाव दिया है. उन्होंने कहा कि भारत को अब 'मिश्रित चुनावी प्रणाली' अपनाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, जिसमें हर वोटर को दो वोट डालने का अधिकार मिले- एक वोट अपने पसंदीदा प्रत्याशी के लिए और दूसरा वोट अपनी पसंद की पार्टी को देने के लिए मिलना चाहिए. उन्होंने लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में करीब 268 आनुपातिक 'लिस्ट सीटें' जोड़ने का भी सुझाव दिया, जिससे सांसदों की कुल संख्या 811 से अधिक हो जाएगी. उन्होंने इस सिस्टम के फायदे भी बताए.
लाखों वोट, पर सांसद एक भी नहीं
चेन्नई में वी. शंकर अय्यर मेमोरियल लेक्चर देते हुए कुरैशी ने बताया कि इस चुनावी सिस्टम का आइडिया उन्हें 2014 के चुनाव नतीजों और उत्तर प्रदेश के एक खास आंकड़े देखकर आया. यूपी में बसपा को कुल वोटों के 20 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन सीट एक भी नहीं मिली. इसका मतलब यह कि लाखों दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों ने वोट डाले, लेकिन फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) सिस्टम की वजह से संसद में उनकी आवाज पहुंचाने वाला कोई नहीं पहुंचा. उन्होंने कहा कि मौजूदा फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट सिस्टम से कई बार लाखों वोट मिलने के बावजूद पार्टियों का प्रतिनिधित्व शून्य रह जाता है, जो लोकतंत्र की एक बड़ी खामी है.
हर पार्टी को मिल सकेगा प्रतिनिधित्व
कुरैशी ने अपने प्रस्तावित मिश्रित वोटिंग मॉडल को समझाते हुए कहा कि अगर किसी पार्टी को 40 फीसदी वोट मिलते हैं लेकिन वह केवल 30 प्रतिशत सीटें ही जीत पाती है तो उसे अतिरिक्त 'लिस्ट सीटें' देकर उसका प्रतिनिधित्व उसके वोट शेयर (40%) के बराबर लाया जाएगा. संघीय संतुलन बनाए रखने के लिए ये लिस्ट सीटें राष्ट्रीय स्तर के बजाय राज्य स्तर पर आवंटित की जानी चाहिए. साथ ही केवल उन्हीं पार्टियों को ये सीटें मिलनी चाहिए जिन्हें कम से कम 4 से 5 प्रतिशत वोट मिले हों ताकि बहुत छोटी और गैर-गंभीर पार्टियों की बाढ़ न आ जाए.
क्या होंगे फायदे, कुरैशी ने बताया
कुरैशी ने अपने प्रस्तावित सिस्टम के कुछ दूसरे फायदे भी गिनाए. उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था से महिलाओं को 2029 तक तुरंत आरक्षण दिया जा सकता है क्योंकि नई सीटों पर अनिवार्य कोटा लागू करना आसान होगा. उन्होंने इसे उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सीटों के परिसीमन विवाद का हल भी बताया. उन्होंने कहा कि लोकसभा में सीटें बढ़ने से किसी भी राज्य की सीटें कम नहीं होंगी, जिससे दक्षिणी राज्यों का राजनीतिक प्रभाव बना रहेगा और उत्तरी राज्यों को उनकी आबादी के मुताबिक प्रतिनिधित्व मिल सकेगा.
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