पश्चिम एशिया में 100 से ज्यादा दिन तक चले युद्ध और संकट के दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिये तेल और गैस की सप्लाई अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बुरी तरह बाधित हुई. सौ से ज्यादा दिनों तक चले इस संकट के दौरान तेल और गैस की कीमतें अप्रत्याशित स्तर पर पहुंची, और अहम पेट्रोलियम पदार्थों के आयात पर खर्च बढ़ने की वजह से भारत में भी पेट्रोल-डीजल, CNG और LPG सिलिंडरों की कीमतों में कई बार बढ़ोतरी की गयी, जिससे ट्रांसपोर्ट का खर्च काफी बढ़ गया.
अब युद्ध खत्म होने के बाद भारत समेत दुनियाभर में रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) के स्रोतों को बढ़ावा देने पर जोर दिए जाने की उम्मीद है. इस सन्दर्भ में भविष्य में सस्टेनेबल ट्रांसपोर्ट व्यवस्था के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ियों को एक महत्वपूर्ण विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है.
जैसे-जैसे भारत बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को अपना रहा है, कई अहम चुनौतियां भी सामने आ रही हैं. इनमें EV फाइनेंसिंग इकोसिस्टम, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर लगाना, ग्रिड रेडीनेस, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इलेक्ट्रिफिकेशन और सस्टेनेबल व समावेशी EV ट्रांजिशन के लिए जरूरी पॉलिसी फ्रेमवर्क से जुड़े मुद्दे शामिल हैं.
EV के इंफ्रा पर चिंतन रिसर्च फाउंडेशन की चर्चा
अडानी ग्रुप के चिंतन रिसर्च फाउंडेशन ने बुधवार को इन सभी मुद्दों पर गहन चर्चा के लिए "भारत के EV ट्रांजिशन के लिए फाइनेंसिंग: इंफ्रास्ट्रक्चर, कैपिटल और पॉलिसी के रास्ते" विषय पर एक पॉलिसी डायलॉग आयोजित किया.
इसमें वरिष्ठ नीति-निर्माता, रेगुलेटर, वित्तीय संस्थान, इंडस्ट्री लीडर्स, इंफ़्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स और रिसर्चर एक ही मंच पर आये और भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इकोसिस्टम को बढ़ाने के विकल्पों पर लम्बी चर्चा की.
एनडीटीवी से बातचीत में चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर हेड, क्लाइमेट चेंज एंड एनर्जी ट्रांजीशन, डॉ. देबजीत पलित ने कहा-
उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार ने एक नयी पॉलिसी तैयार की है जिसमें स्कूल बसों को CNG से इलेक्ट्रिक बसों में कन्वर्ट करने का प्रस्ताव है. अभी दिल्ली में स्कूल बसें CNG पर चलती हैं. इलेक्ट्रिक गाड़ियों के विस्तार के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ फाइनेंसिंग बेहद जरूरी होगा. ये देश में क्लीन एनर्जी के विस्तार के लिए जरूरी होगा।
सरकार को क्या करना चाहिए?
डॉ. देबजीत पलित के मुताबिक, "भारत सरकार को एक कंपोजिट ट्रांसपोर्ट पॉलिसी लाना चाहिए. अभी इलेक्ट्रिक गाड़ियों को प्रमोट किया जा रहा है, फ्लेक्स फ्यूल को भी प्रमोट किया जा रहा है. इथेनॉल बेडिंग बढ़ाने की तैयारी है, और हाइड्रोजन व्हीकल की भी बातचीत चल रही है. लेकिन अभी क्लेरिटी नहीं है कि किस टाइप की व्हीकल भारत के लिए सबसे उपयुक्त होगा और किस सेक्टर में."
दिल्ली में शॉर्ट डिस्टेंस मोबिलिटी के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ियां बेहतर विकल्प होंगी, लेकिन लॉन्ग डिस्टेंस के लिए ये कारगर साबित होंगी? इन सवालों से निपटने के लिए एक समग्र ट्रांसपोर्ट पालिसी लाना जरूरी होगा.
चिंतन रिसर्च फाउंडेशन की राय है कि भारत सरकार को इस बारे में अलग-अलग स्टेकहोल्डर मंत्रालयों के साथ चर्चा शुरू करनी चाहिए क्योंकि इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार या नयी समग्र और एकीकृत परिवहन नीति तैयार करना आज किसी एक या दो मंत्रालय से जुड़ा मामला नहीं रह गया है.
संकट के कारण EV की बिक्री बढ़ने की उम्मीद
इसके लिए ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिस को स्टडी करना भी जरूरी होगा. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि मध्यपूर्व एशिया में संकट के बाद इस साल दुनियाभर में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बिक्री बढ़ने की उम्मीद है.
इस पॉलिसी डायलाग में भाग लेने पहुंचे विद्युत मंत्रालय के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की संयुक्त उद्द्यम कंपनी - EESL के प्रमुख - अंतर्राष्ट्रीय एवं उपकरण, अभिषेक गुप्ता ने एनडीटीवी से कहा-
पिछले 5-7 साल में सरकार के विशेष फोकस की वजह से इलेक्ट्रिक गाड़ियों का विस्तार हुआ है. अभिषेक गुप्ता कहते हैं, PM-eBus Sewa scheme के तहत उन्हें नीति आयोग से देशभर में 50,000 इलेक्ट्रिक बसों को डेप्लॉय करने का मैंडेट मिला है. अभी तक करीब 10000 इलेक्ट्रिक बसें डिप्लॉय की जा चुकी हैं, और उन्हें उम्मीद है कि 2029 तक 50,000 बसों को डेप्लॉय करने का टारगेट पूरा कर लिया जायेगा.
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