चुनाव आयोग को लेकर सामने आई मीडिया रिपोर्ट के बाद से विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है. विपक्षी दलों का दावा है कि एसआईआर के दौरान देशभर में वोटर लिस्ट से 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए. विपक्ष ज्ञानेश कुमार को तत्काल पद से हटाने और उनकी गिरफ्तारी की मांग कर रहा है. साथ ही सीईसी के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की भी तैयारी कर रहा है. हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना इतना आसान नहीं है.
सरकार चाहे तो भी मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को सीधे नहीं हटा सकती. ऐसा इसलिए क्योंकि CEC को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समान विशेषाधिकार प्राप्त हैं. CEC को हटाने की प्रक्रिया जटिल है. यह प्रावधान इसलिए किया गया है, ताकि सरकार चुनाव आयोग के कामकाज में सीधे हस्तक्षेप न कर सके.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: हटाने के प्रयास और उदाहरण
स्वतंत्र भारत के इतिहास में अब तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से नहीं हटाया गया है. हालांकि, अतीत में कुछ प्रयास किए गए थे.
टी.एन. शेषन के खिलाफ वामपंथी मांग (1992): 1992 में वामपंथी दलों ने तत्कालीन CEC टी.एन. शेषन के खिलाफ औपचारिक हटाने की कार्यवाही शुरू करने की मांग की थी, लेकिन यह प्रयास औपचारिक प्रस्ताव तक नहीं पहुंच पाया, क्योंकि इसे लाने के लिए जरूरी संसदीय समर्थन जुटाया नहीं जा सका.
चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव
नवीन चावला के खिलाफ एनडीए की याचिका (2006): मार्च 2006 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने चुनाव आयुक्त (EC) नवीन चावला को हटाने के लिए भारत के राष्ट्रपति को याचिका दी थी.
नवीन चावला के खिलाफ CEC की सिफारिश (2009): 2009 में तत्कालीन CEC एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की औपचारिक सिफारिश की थी. उन्होंने पक्षपातपूर्ण व्यवहार और राजनीतिक पूर्वाग्रह के आरोप लगाए थे. इस सिफारिश को तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार ने अस्वीकार कर दिया था.

CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया संविधान के प्रावधानों से नियंत्रित होती है, जो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई हैं.
अनुच्छेद 324(5): संविधान का अनुच्छेद 324(5) स्पष्ट रूप से कहता है कि CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरीके और आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है.
अनुच्छेद 124(4): अनुच्छेद 124(4) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को राष्ट्रपति के आदेश से ही हटाया जा सकता है. यह आदेश तभी जारी हो सकता है जब संसद के दोनों सदनों द्वारा एक प्रस्ताव पारित किया जाए. इस प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत का समर्थन होना चाहिए. यह प्रस्ताव उसी सत्र में राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए और यह सिद्ध दुराचार या अक्षमता के आधार पर ही लाया जा सकता है.

CEC को हटाने की चरणबद्ध प्रक्रिया
CEC को हटाने की प्रक्रिया में पांच स्पष्ट चरण शामिल हैं:
- नोटिस जमा करना - CEC को हटाने का औपचारिक नोटिस राज्यसभा के सभापति या लोकसभा के अध्यक्ष को जमा किया जाता है. नोटिस लाने के लिए न्यूनतम समर्थन आवश्यक है — लोकसभा में कम से कम 100 सदस्य या राज्यसभा में कम से कम 50 सदस्य.
- जांच समिति का गठन- यदि नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है, तो पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) एक तीन सदस्यीय विशेष समिति का गठन करते हैं. इस समिति में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश या मुख्य न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और पीठासीन अधिकारी की राय में एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल होते हैं.
- जांच और रिपोर्ट - गठित समिति आरोपों की जांच करती है और अपनी औपचारिक जांच रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को सौंपती है.
- संसदीय मतदान - यदि जांच समिति CEC को सिद्ध दुराचार या अक्षमता का दोषी पाती है, तो मामला संसद के पटल पर मतदान के लिए लाया जाता है. प्रस्ताव पारित करने के लिए असाधारण बहुमत की आवश्यकता होती है — सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और दोनों सदनों में उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत.
- राष्ट्रपति का आदेश - यदि प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों से सफलतापूर्वक पारित हो जाता है, तो इसे भारत के राष्ट्रपति के सामने प्रस्तुत किया जाता है, जो CEC को पद से हटाने का आधिकारिक आदेश जारी करते हैं.
वर्तमान संसद का अंकगणित
दोनों सदनों में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल करना वर्तमान संसदीय समीकरणों में किसी भी विपक्षी गुट के लिए लगभग असंभव है.



प्रस्ताव पास होना लगभग नामुमकिन क्यों है?
लोकसभा में 360 का आंकड़ा हासिल करना वर्तमान विपक्षी संख्याओं से कहीं अधिक है. यदि हम भाजपा की 240 सीटों को भी छोड़ दें, तो केवल 300 सदस्य बचते हैं. इसलिए 360 संभव नहीं है. इसी प्रकार राज्यसभा में 162 का आंकड़ा हासिल करना गणितीय रूप से सीमित है. यदि हम भाजपा की 116 सीटों को छोड़ दें, तो केवल 127 गैर-भाजपा सदस्य बचते हैं.
CEC को हटाने का प्रस्ताव लाने का रणनीतिक उद्देश्य
- संसदीय अंकगणित की इस दुर्गम बाधा को देखते हुए, विपक्ष द्वारा हटाने का प्रस्ताव लाना सफल हटाने की उम्मीद से अधिक रणनीतिक और राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित है.
- सरकार और आम जनता को स्पष्ट संदेश देना कि CEC की कार्यप्रणाली और संस्थागत आचरण त्रुटिपूर्ण तथा राजनीतिक रूप से पक्षपाती है.
- CEC पर निरंतर राजनीतिक और संस्थागत दबाव बनाना ताकि वे अधिक सतर्कता, कठोर निष्पक्षता और चुनावी नियमों का कड़ाई से पालन करें.
- नोटिस को स्वीकार करवाना, जिससे एक स्वतंत्र जांच समिति का गठन हो और प्रक्रियाओं पर सार्वजनिक जांच संभव हो.
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