- दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन के हिंदी नाम को ‘सर्वोच्च न्यायालय’ करने की मांग हाई कोर्ट में उठाई गई
- याचिकाकर्ता उमेश शर्मा ने जनहित याचिका में हिंदी नाम को सही रूप में लिखने की मांग की है
- दिल्ली हाई कोर्ट ने DMRC से पूछा कि अन्य स्टेशनों के हिंदी नाम बदलने पर यह बदलाव क्यों नहीं किया जा सकता
दिल्ली की पहचान बन चुके मेट्रो स्टेशनों के नाम अब भाषा की बहस में घिर गए हैं. राजधानी के सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन का हिंदी नाम बदलकर ‘सर्वोच्च न्यायालय' करने की मांग हाई कोर्ट पहुंची, तो मामला सिर्फ नाम तक सीमित नहीं रहा. दिल्ली मेट्रो ने कोर्ट को बताया कि यह बदलाव 45 लाख रुपये तक का खर्च खड़ा कर देगा और साथ ही ऐसी कई और याचिकाओं की बाढ़ ला सकता है.
क्या है मामला?
उमेश शर्मा नाम के एक याचिकाकर्ता ने इसे लेकर जनहित याचिका दायर की है. उनका कहना है कि जब हिंदी में नाम लिखना है, तो 'सुप्रीम कोर्ट' की जगह 'सर्वोच्च न्यायालय' ही होना चाहिए।
दिल्ली हाई कोर्ट ने DMRC से मांगा जवाब
इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई हुई. चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करियाह की बेंच ने 11 फरवरी को सुनवाई के दौरान दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) से सवाल पूछा. कोर्ट ने कहा, 'जब दिल्ली विश्वविद्यालय का स्टेशन ‘विश्वविद्यालय' और सेंट्रल सेक्रेटेरिएट का ‘केन्द्रीय सचिवालय' लिखा जा सकता है, तो सुप्रीम कोर्ट का हिंदी नाम ‘सर्वोच्च न्यायालय' क्यों नहीं लिखा जा सकता?'
DMRC बोला- आर्थिक बोझ बढ़ेगा
इसके जवाब में DMRC ने कहा कि स्टेशन के नाम बदलना एक नीतिगत निर्णय होता है और ऐसा एक बदलाव आगे और कई मांगों का सिलसिला खड़ा कर देगा, जिससे न सिर्फ प्रशासनिक दिक्कतें बढ़ेंगी बल्कि आर्थिक बोझ भी पड़ेगा.
लेकिन कोर्ट इस तर्क से खास संतुष्ट नहीं दिखी. बेंच ने कहा कि आधिकारिक भाषा अधिनियम की अनदेखी ऐसी दलीलों से सही नहीं ठहराई जा सकती. कोर्ट ने कहा, 'हमें कानून का सम्मान करना है। इस तरह के बचाव आपके पास उपलब्ध नहीं हैं.'
कोर्ट ने DMRC को इस मुद्दे पर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई के लिए मामला 24 अप्रैल की तारीख पर सूचीबद्ध कर दिया.
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