- डीके शिवकुमार को कांग्रेस ने कर्नाटक का सीएम तो बना दिया है लेकिन उनके लिए कई चुनौतियां भी हैं
- पूर्व सीएम सिद्धारमैया ने भी राज्य में रहने का विकल्प चुना है
- वहीं, शिवकुमार के विरोधी माने जाने वाले हरिप्रसाद को कांग्रेस ने कर्नाटक अध्यक्ष बनाया है
तीन साल के इंतजार के बाद डीके शिवकुमार को कर्नाटक के मुख्यमंत्री की कुर्सी तो मिल गई लेकिन प्रदेश से जुड़े अन्य अहम फैसलों से ऐसा लगता है कि कांग्रेस आलाकमान ने भले ही डीके को "पतंग" दे दी हो लेकिन डोर अपने हाथों में ही रखी है. सीएम पद से हटने के बाद भी सिद्धारमैया का असर कांग्रेस के तमाम फैसलों में साफ नजर आ रहा है. हालांकि कहा यही जा रहा है कि सारे फ़ैसले आम सहमति से लिए जा रहे हैं.
डीके की राह नहीं आसान!
इसकी पहली झलक तब मिली जब डीके शिवकुमार के शपथ ग्रहण के कुछ समय बाद ही कांग्रेस ने कर्नाटक विधान परिषद के चार उम्मीदवारों और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का एलान किया. एमएलसी के चार उम्मीदवारों में से टी. कमकनूर कांग्रेस अध्यक्ष खरगे की पसंद, पीवी मोहन संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल की पसंद और शिवन्ना मालवल्ली पूर्व सीएम सिद्धारमैया की पसंद बताए जाते हैं. बीके हरिप्रसाद को एक बार फिर विधान परिषद का उम्मीदवार बनाया गया क्योंकि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जानी थी.
डीके-बीके की जोड़ी जमेगी?
हरिप्रसाद को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाना महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि उन्हें डीके शिवकुमार का विरोधी माना जाता है. ओबीसी समाज से आने वाले 71 साल के बीके हरिप्रसाद चार दशकों से कांग्रेस में दिल्ली दरबार की राजनीति करते आए हैं और कांग्रेस आलाकमान के करीबी हैं. सूत्रों के मुताबिक उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने में सिद्धारमैया और प्रभारी रणदीप सुरजेवाला की अहम भूमिका रही. इससे पहले बतौर हरियाणा कांग्रेस प्रभारी बीके हरिप्रसाद ने रणदीप सुरजेवाला के मन मुताबिक प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त करने में मदद की थी.

सिद्धारमैया ने जी परमेश्वर को उप मुख्यमंत्री बनवाया
डीके शिवकुमार के मंत्रिमंडल में दलित नेता जी परमेश्वर को उप मुख्यमंत्री बनाने में पीछे भी मुख्य भूमिका सिद्धारमैया ने निभाई. सूत्रों के मुताबिक सिद्धारमैया एक से अधिक उप मुख्यमंत्री बनाने की पैरवी कर रहे थे जबकि डीके शिवकुमार अपनी सरकार में कोई उप मुख्यमंत्री नहीं चाहते थे. आखिरकार वरिष्ठता और दलित वोटबैंक के मद्देनजर जी परमेश्वर को उप मुख्यमंत्री बनाया गया.
सिद्धारमैया का एक प्रस्ताव को कांग्रेस नेतृत्व ने किया खारिज
हालांकि, सूत्र बताते हैं कि सिद्धारमैया की प्रदेश सरकार और संगठन में समन्वय के लिए एक विशेष कमेटी बनाने की मांग को कांग्रेस नेतृत्व ने खारिज कर दिया. इससे डीके शिवकुमार को जरूर राहत मिलेगी. वरना समन्वय के नाम पर उनपर सिद्धारमैया की तलवार लटकी रहती. बहरहाल कांग्रेस ने सिद्धारमैया को कांग्रेस वर्किंग कमिटी में जगह दी. उनके पास राज्यसभा जाने का भी प्रस्ताव था लेकिन सिद्धारमैया ने राज्य की राजनीति में बने रहने का फैसला किया. उनके बेटे यतींद्र को डीके सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया है.
क्यों बैकफुट पर शिवकुमार?
कर्नाटक सरकार में नेतृत्व परिवर्तन के दौरान कांग्रेस आलाकमान ने इस बात का ध्यान रखा कि सिद्धारमैया और उनके समर्थकों के बीच कोई गलत संदेश ना जाए. उन्हें हर फैसले में शामिल किया गया. डीके शिवकुमार ने भी सिद्धारमैया को सार्वजनिक रूप से मान-सम्मान के देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कर्नाटक के एक कांग्रेस नेता ने कहा, “पार्टी ने डीके शिवकुमार को सीएम बना दिया लेकिन उनकी छवि सुपर सीएम की नहीं बनाना चाहती. खुद डीके शिवकुमार का अगला लक्ष्य दोबारा चुनाव जीतना है. इसके लिए उन्होंने जान बूझकर लचीला रुख अपनाया है. वो अभी बैकफुट पर खेल रहे हैं लेकिन अंतिम के ओवरों में खुल कर बल्लेबाजी करेंगे.”
तालमेल बिगड़ा तो कांग्रेस की चुनौती बढ़ेगी
डीके शिवकुमार की वोक्कलिगा जाति को प्रभावशाली जाति माना जाता है. उनके साथ दलित उप मुख्यमंत्री और ओबीसी प्रदेश अध्यक्ष बना कर कांग्रेस ने सभी वर्गों को साधने की कोशिश की है. सिद्धारमैया राज्य की राजनीति में सक्रिय रहेंगे. कांग्रेस नेतृत्व उम्मीद कर रहा है इन नेताओं के बीच नेतृत्व परिवर्तन जैसा ही तालमेल कायम रहेगा. लेकिन यदि पार्टी में ज्यादा पावर सेंटर बने तो दो साल बाद होने वाले अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की चुनौती बढ़ सकती हैं.
बयानबाजी की शुरुआत नए सीएम और नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति के अगले ही दिन हो चुकी है. बीके हरिप्रसाद ने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को सार्वजनिक रूप से संदेश दिया है कि सत्ता चाहिए तो डीके शिवकुमार के पास जाओ और कांग्रेस को मजबूत करना है तो मेरे पास आओ! साफ है कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को बड़े सब्र के साथ पूरा ध्यान सरकार के कामकाज पर लगाना होगा.
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