- डी के शिवकुमार को मंत्रिमंडल गठन में समर्थकों, सिद्धारमैया और कांग्रेस आलाकमान के नामों को शामिल करना होगा.
- सिद्धारमैया राज्यसभा नहीं जाएंगे और प्रदेश की राजनीति करेंगे, जिससे डी के शिवकुमार पर उनकी पैनी नजर रहेगी.
- डी के शिवकुमार के लिए पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक को एकजुट रखना बड़ी चुनौती होगी.
शिवकुमार के लिए सबसे पहली प्राथमिकता है कि वो अपने मंत्रिमंडल का गठन करें, मगर यहां पर दिक्कत ये है कि उनको यहां पर भी खुली छूट नहीं मिलेगी. उनको अपने सर्मथकों के अलावा सिद्धारमैया के लोगों को भी मंत्रिमंडल में जगह देनी पड़ेगी. यही नहीं कांग्रेस आलाकमान के भी खासकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के भी कुछ नाम होंगे जिन्हें मंत्रिमंडल में जगह देनी होगी.
1 अनार 100 बीमार
दिक्कत ये नहीं है कि डीके शिवकुमार को इन सब को मंत्रिमंडल में जगह देनी होगी, उससे भी बड़ी दिक्कत है कि इन सभी को अच्छा मंत्रालय भी देना पड़ सकता है, जो डी के अपने सर्मथक विधायकों के देना चाहेंगे. यही नहीं सिद्धारमैया ने कहा है कि वो राज्यसभा में नहीं जाएंगे और प्रदेश की ही राजनीति करेंगे. इसका मतलब ये हुआ कि कई मौकों पर वो डी के शिवकुमार को गाइड भी कर सकते हैं. मगर ये भी हो सकता है कि वो कुछ मौकों पर उनकी आलोचना भी कर सकते हैं. यानी डी के शिवकुमार के कामकाज पर सिद्धारमैया की पैनी नजर रहेगी. इसके अलावा एक नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति होनी है, जिसके लिए सतीश जरकीहोली के नाम की चर्चा है. लेकिन वो अध्यक्ष पद के साथ मंत्री पद भी चाहते हैं.
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अहिंदा वोट बैंक को साधना बड़ी चुनौती
डी के शिवकुमार के लिए दूसरी बड़ी चुनौती है, अहिंदा वोट बैंक को एकजुट रखना. अहिंदा का मतलब होता है पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का गठजोड़. ये वही गठजोड़ है जिसकी बात आजकल अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के लिए कर रहे हैं. चूंकि सिद्धारमैया खुद पिछड़ी जाति से आते हैं, इसलिए उनके लिए इनका नेता बनना आसान था. डी के वोकाल्लिगा जाति से आते हैं और उन्हें अन्य पिछड़ी जातियों का विश्वास जीतना पड़ेगा. यही नहीं सिद्धारमैया ने जाते-जाते जातीय सर्वेक्षण को कैबिनेट की मंजूरी दे दी है. अब इसे लागू करने का काम डीके को करना होगा और उसी अनुसार योजनाएं बनानी होंगी, क्योंकि यह राहुल गांधी का सबसे पसंदीदा प्रोजेक्ट है.

शिवकुमार को चुना गया कर्नाटक का सीएम.
Photo Credit: PTI
विपक्ष की रणनीति का भी करना होगा सामना
डीके शिवकुमार को बीजेपी और जेडीएस के चुनाव पूर्व गठबंधन का सामना करना पड़ेगा. बीजेपी और जेडीएस कांग्रेस को कड़ी टक्कर देंगे क्योंकि देवेगौड़ा और डीके दोनों एक ही जाति से आते हैं. ऐसे में लिंगायत समुदाय को भी अपने पाले में लाना डी के के लिए बड़ी चुनौती होगी. बीजेपी ने बी एस येदियुरप्पा के बेटे विजयेंद्र को कर्नाटक का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है जो लिंगायत समुदाय से आते हैं.
बेंगलुरु पर जवाबदेही
डी के शिवकुमार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी बेंगलुरु का विकास. DK के पास बेंगलुरु विकास का भी मंत्रालय पिछले तीन सालों से है और लोग अभी भी इस पर डी के से सवाल पूछ रहे हैं कि पिछले तीन सालों में उन्होंने बेंगलुरु के लिए क्या किया है. अभी भी वहां जलभराव, ट्रैफिक की समस्या बनी हुई है. बेंगलुरु देश का सबसे बड़ा आईटी का केंद्र है और वहां हर घटना अंतरराष्ट्रीय खबर बन जाती है. ऐसे में डी के शिवकुमार के हर कदम पर बेंगलुरुवासी की निगाहें होंगी.
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भ्रष्टाचार का मुद्दा
डी के शिवकुमार के लिए भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना भी सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी क्योंकि कनार्टक में यह आने वाले चुनाव में बड़ा मुद्दा बनने वाला है. इसके अलावा कांग्रेस की गारंटी स्कीम को चलाए रखने की भी जरूरत है, क्योंकि इन योजनाओं में सरकार का करीब पचास हजार करोड़ रुपए सालाना खर्च हो रहा है.
दो साल में है अगला चुनाव
कनार्टक पिछले चार दशकों से हर बार सरकार बदल देता है. डी के शिवकुमार के पास केवल दो साल हैं इन सब चुनौतियों से निपटने के लिए. डी के शिवकुमार को एक बेहतरीन संकटमोचक कहा जाता है, लेकिन इससे काम नहीं चलेगा, उन्हें एक अच्छा प्रशासक बन कर अपने आप को साबित करना पड़ेगा.
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