- दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की जीवनी पर आधारित है.
- सेंसर बोर्ड ने फिल्म में पंजाब शब्द हटाने, पुलिस नाम बदलने और 120 से अधिक कट्स की मांग की थी.
- दिलजीत दोसांझ ने राजनीति से दूरी बनाए रखने की बात कही है लेकिन उनकी सामाजिक सक्रियता से चर्चाएं जारी हैं.
Diljit Dosanjh Film Sutlej: पंजाब में फिल्म और राजनीति का रिश्ता हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है. पंजाब की ऐतिहासिक घटनाओं, सामाजिक समस्याओं और धार्मिक भावनाओं से जुड़ी फिल्मों पर अक्सर बड़े राजनीतिक विवाद खड़े होते रहे हैं. अब दिलजीत दोसांझ की हालिया रिलीज फिल्म सतलुज को लेकर राजनीति तेज हो गई है. पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की जीवनी पर बनी यह फिल्म 1990 के दशक की पंजाब की घटनाओं को बताती है. पंजाब में उग्रवाद दमन के नाम पर पुलिस एक्शन में कई लोगों की जान गई, फिल्म इन लावारिस मौतों की तफ्तीश को बताती है.
दिलजीत की फिल्म का चुनाव पर पड़ेगा असर?
राज्य में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होना है. क्या इस फिल्म का चुनाव पर भी कोई असर पड़ेगा, इस पर लोगों की राय बंटी है. कई लोगों का कहना है कि इसका कुछ असर नहीं पड़ेगा, लेकिन कुछ लोग कह रहे हैं कि फिल्म का असर चुनाव पर पड़ सकता है. पंजाब के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता पर बनी इस फिल्म का चुनाव पर क्या असर पड़ेगा यह तो आने वाला वक्त बताएगा?

पंजाब पर बनी फिल्म और उस पर हुए राजनीतिक विवाद
1. सतलुज (पंजाब '95') विवाद की वजह:
दिलजीत दोसांझ अभिनीत यह फिल्म पंजाब के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है. खालरा ने 1980 और 90 के दशक में पंजाब में पुलिस द्वारा किए गए कथित गैर-कानूनी अंतिम संस्कारों और मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर किया था.
सेंसर बोर्ड (CBFC) ने फिल्म के नाम से 'पंजाब' शब्द हटाने, पंजाब पुलिस का नाम बदलने और करीब 120 से अधिक कट्स लगाने की मांग की थी, जिससे कलात्मक स्वतंत्रता पर राजनीतिक दबाव के आरोप लगे. लंबे विवाद के बाद इसे 'सतलुज' नाम से बिना किसी बड़े बदलाव के ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अचानक रिलीज किया गया.
2. सरदार जी और दिलजीत दोसांझ का बहिष्कार
इस पंजाबी फिल्म में पाकिस्तानी अभिनेत्री हानिया आमिर को कास्ट किए जाने के बाद भारत में तीखा राजनीतिक और सामाजिक विरोध शुरू हो गया. फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लाइज (FWICE) ने इसे 'देश के साथ विश्वासघात' बताते हुए प्रधानमंत्री से दिलजीत दोसांझ का पासपोर्ट रद्द करने की मांग तक कर डाली थी. इस बड़े राजनीतिक तनाव और बॉयकॉट के ट्रेंड के कारण मेकर्स ने फिल्म को भारत में रिलीज न करके केवल विदेशों में रिलीज करने का फैसला लिया.

3. 'इमरजेंसी' (कंगना रनौत) विवाद की वजह:
अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत की यह फिल्म 1975 के आपातकाल और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित है. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और पंजाब के कई सिख संगठनों ने इस फिल्म का कड़ा विरोध किया. उनका आरोप है कि फिल्म में सिखों की छवि को गलत और हिंसक तरीके से पेश कर सिख विरोधी एजेंडा चलाया गया है. पंजाब के कई हिस्सों में इस फिल्म के खिलाफ थियेटरों के बाहर हिंसक प्रदर्शन हुए और सुरक्षा कारणों से इसकी रिलीज बाधित हुई.
4. 'उड़ता पंजाब' (2016)विवाद की वजह:
यह फिल्म पंजाब में युवाओं के बीच फैल रहे नशीले पदार्थों के गंभीर संकट और ड्रग्स माफिया के नेटवर्क पर आधारित थी. तत्कालीन अकाली दल-भाजपा सरकार ने आरोप लगाया कि यह फिल्म आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों को प्रभावित करने और राज्य की छवि खराब करने की राजनीतिक साजिश है. सेंसर बोर्ड ने फिल्म से 'पंजाब' शब्द और राजनीतिक संदर्भों को हटाने के लिए 89 कट्स लगाने का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ निर्माता बॉम्बे हाई कोर्ट गए और केवल एक कट के साथ फिल्म रिलीज हो सकी.
क्या दिलजीत दोसांझ राजनीति में आएंगे?
“मुझे इन सब से दूर रखिए... भाई, मैं एक कलाकार हूं. मैं कोई राजनेता नहीं हूं, मुझे नहीं पता आप मुझे क्या समझते हैं.” यह बयान दिलजीत दोसांझ का है. उन्होंने बीते दिनों राजनीति और कॉकरोज जनता पार्टी के प्रदर्शन से जुड़े सवाल पर यह कहा था. लेकिन कई लोगों का लगता है कि दिलजीत पंजाब के अगले थलापति हो सकते हैं. उनकी सामाजिक संदेश वाली फिल्में, पंजाब की हिंसा पर बनी फिल्में, पंजाब के मुद्दों पर राय रखना इस ओर इशारा करता है.
साल 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान दिलजीत ने खुलकर किसानों का समर्थन किया था. हालांकि, उस समय भी उन्होंने साफ किया था कि वह किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में नहीं हैं. पिछले वर्ष उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान (Bhagwant Mann) से मुलाकात की थी, जिसे राजनीतिक रूप से संतुलित रुख के तौर पर देखा गया.

हाल के दिनों में कनाडा में अपने कार्यक्रम के दौरान खालिस्तानी झंडे लहराए जाने पर आपत्ति जताकर दिलजीत ने खुद को अलगाववादी राजनीति से भी अलग दिखाने की कोशिश की. उन्होंने कनाडा में पंजाबी प्रवासियों की यात्रा कोमागाटा मारू घटना से लेकर आज वहां प्रभावशाली समुदाय बनने तक को गर्व के साथ प्रस्तुत किया.
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दिलजीत दोसांझ कभी राजनीति में कदम रखेंगे? और अगर ऐसा होता है, तो क्या पंजाब की जनता उन्हें एक राजनीतिक नेता के रूप में स्वीकार करेगी? इसका जवाब आने वाला समय ही देगा.
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