Maharashtra politics: महाराष्ट्र की राजनीति में 'मराठा क्षत्रप' शरद पवार एक ऐसा नाम हैं, जिन्हें समझना बड़े-बड़े धुरंधरों के लिए भी पहेली रहा है. एक बार फिर चर्चाओं का बाजार गर्म है कि पवार की एनसीपी (शरद पवार गुट) एनडीए में शामिल हो सकती है. इन अटकलों को बल तब और मिला जब आगामी मानसून सत्र में परिसीमन बिल के समर्थन की संभावना जताई गई. भले ही सुप्रिया सुले ने इन खबरों को सिरे से खारिज किया हो, लेकिन महाराष्ट्र की सियासत के जानकार इसे महज अफवाह मानने को तैयार नहीं हैं.
पवार की सियासी विचारधारा
शरद पवार की राजनीति का मूल मंत्र सत्ता में बने रहना रहा है. उनके राजनीतिक करियर पर नजर डालें तो विचारधारा और नैतिकता हमेशा सत्ता के लक्ष्य के पीछे गौण रही है. 1999 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल का विरोध कर कांग्रेस से अलग होने वाले पवार ने उसी साल चुनाव बाद कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया. 2004 में यूपीए सरकार में मंत्री बनकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि राजनीतिक विरोध से ज्यादा महत्वपूर्ण सत्ता का सुख है.
2014 और 2019 में हैरान करने वाले दांव
पवार का इतिहास बताता है कि वे वक्त आने पर पाला बदलने में माहिर हैं. 2014 में बीजेपी सरकार को बिना शर्त समर्थन देकर उन्होंने सबको चौंकाया था. तब उन्होंने विधानसभा में वॉकआउट कर बीजेपी को बहुमत दिलाने में मदद की थी. इसके बाद पीएम मोदी द्वारा उन्हें 'राजनीतिक गुरु' बताया जाना और पद्मविभूषण मिलना उनकी बढ़ती नजदीकियों का संकेत था. वहीं 2019 में जनादेश के विपरीत जाकर कट्टर विरोधी शिवसेना के साथ महाविकास अघाड़ी बनाना उनके लचीले रुख का एक और बड़ा प्रमाण था.
पार्टी बचाने की चुनौती और भविष्य की राह
मौजूदा हालात में शरद पवार के सामने अस्तित्व की लड़ाई है. भतीजे अजित पवार की बगावत के बाद पार्टी कमजोर हुई है. चुनाव परिणामों में मिली निराशा और शिवसेना (यूबीटी) जैसे सहयोगियों के साथ बदलते समीकरणों के बीच, पवार के लिए अपनी पार्टी के बचे-कुचे सांसदों और विधायकों को बचाना बड़ी चुनौती है. सत्ता के साथ जाने का विकल्प उनके लिए न केवल सुरक्षा कवच हो सकता है, बल्कि पार्टी के भविष्य को सुरक्षित करने का जरिया भी.
अतीत के फैसलों को देखें तो शरद पवार का एनडीए में जाना कोई बड़ी हैरानी की बात नहीं होगी. उनकी सियासत हमेशा 'अनिश्चितता' के साये में रही है, जहाँ कब क्या हो जाए, यह खुद पवार के अलावा कोई नहीं जानता. फिलहाल, महाराष्ट्र का सियासी पारा चढ़ा हुआ है और सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पवार का अगला कदम फिर से पूरे देश को चौंका देगा?
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