ANALYSIS: पंजाब का दोआबा, जहां हर दूसरे दलित परिवार का एक सदस्य विदेश में; राजनीति में किंगमेकर, आखिर कैसे?

आजादी की लड़ाई लड़ने वाले क्रांतिकारी भगत सिंह का पैतृक गांव नवांशहर के खटकर कलां में है. 1914 की कोमागाता मारू यात्रा करने वाले बाबा गुरदित सिंह का परिवार कभी दोआबा में रहता था.

ANALYSIS: पंजाब का दोआबा, जहां हर दूसरे दलित परिवार का एक सदस्य विदेश में; राजनीति में किंगमेकर, आखिर कैसे?
ये दोआबा की ताकत ही है कि बॉलीवुड हस्तियों को भी अपने यहां आने पर मजबूर कर देता है. ये तस्वीर एक्टर फरहान अख्तर की 13 अप्रैल 2026 की है, जब वो जालंधर की एक यूनिवर्सिटी में ‘यूथ वाइब’ के दौरान परफॉर्म कर रहे थे.

पंजाब के दोआबा इलाके में विधानसभा की 23 सीटें हैं. मालवा और माझा के मुकाबले यह इलाका छोटा है, क्योंकि मालवा में 69 और माझा में 25 सीटें हैं. 2017 तक दोआबा कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी का गढ़ हुआ करता था. 2012 में इस इलाके में SAD-BJP गठबंधन का दबदबा था; उन्हें कुल 16 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस को छह सीटें ही मिल पाईं. 2017 तक कांग्रेस ने बढ़त बनाते हुए 15 सीटें हासिल कीं, जबकि SAD की सीटें घटकर पांच रह गईं और आम आदमी पार्टी (AAP) ने दो सीटों के साथ चुनावी मैदान में एंट्री की. मगर, 2022 तक राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल गई. AAP ने 10 सीटें जीतीं, कांग्रेस नौ सीटों के साथ मुकाबले में बनी रही, लेकिन SAD की सीटें और घटकर दो रह गईं और BJP सिर्फ एक सीट पर सिमट गई.

कड़े मुकाबले वाली सीटें, बड़ी दलित आबादी और कई पार्टियों के बीच होने वाली टक्कर दोआबा इलाके के चुनाव को बहुत अहम बना देती है. इसलिए, दलित और NRI राजनीति के मेल के कारण कोई भी पार्टी दोआबा इलाके को नजरअंदाज नहीं कर सकती. यही वजह है कि दोआबा सिर्फ एक इलाका नहीं, बल्कि 'किंगमेकर' है.

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'किंगमेकर' वाली भूमिका

भले ही सीटों की संख्या कम हो, लेकिन दोआबा अक्सर यह तय करता है कि पंजाब में सरकार बनाने के लिए जरूरी 59 सीटों का जादुई आंकड़ा किसे मिलेगा. साथ ही, यह इलाका राजनीतिक रूप से भी अहम है, क्योंकि यह दलित और NRI राजनीति का केंद्र है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस साल फरवरी में इस इलाके का दौरा किया था और डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख संत निरंजन से मुलाकात की थी. पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी भी यहां अक्सर आते रहते हैं और वे जालंधर लोकसभा क्षेत्र से सांसद भी हैं. पंजाब बीजेपी प्रमुख केवल सिंह ढिल्लों ने भी इस डेरे का दौरा किया था.

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चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर गुरमीत सिंह कहते हैं, "बीजेपी दलित और NRI वोटरों को साधने के लिए दोआबा इलाके पर गंभीरता से ध्यान दे रही है. प्रधानमंत्री मोदी का डेरा सचखंड बल्लां का दौरा और बाद में संत निरंजन दास को पद्म श्री से सम्मानित करना राजनीतिक रूप से अहम है."

दोआबा इलाके में जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और शहीद भगत सिंह नगर (नवां शहर) शामिल हैं. जालंधर स्पोर्ट्स के सामान के उत्पादन के लिए जाना जाता है, होशियारपुर में राज्य की साक्षरता दर सबसे ज्यादा है, कपूरथला अपनी रेल कोच फैक्ट्री के लिए मशहूर है, और शहीद भगत सिंह नगर का खटकड़ कलां गांव शहीद भगत सिंह का जन्मस्थान है.

बड़ी दलित आबादी

पंजाब का दोआबा इलाका, जो बहुत उपजाऊ और समृद्ध है, वहां दलित आबादी 35 से 42 प्रतिशत के बीच है. यह इलाका इस समुदाय की जबरदस्त तरक्की के लिए भी जाना जाता है. यहां मुख्य रूप से 'आद धर्मी' और 'रविदासिया' या 'रामदासिया' समुदायों के लोग रहते हैं.

पंजाब के दोआबा इलाके के दलितों ने आर्थिक आजादी हासिल करके, सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाकर और मजबूत राजनीतिक जागरूकता पैदा करके बड़ा बदलाव लाया. उन्होंने उद्यमिता, शिक्षा और विदेशों में जाकर बसने के जरिए अपनी स्थिति बदली.

पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ में 'इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' के डायरेक्टर प्रोफेसर वरिंदर शर्मा कहते हैं कि दलित समुदाय के जिन लोगों ने कभी जालंधर की बूटां मंडी से चमड़े का व्यापार संभाला था, उन्होंने व्यवस्थित तरीके से अपनी किस्मत खुद लिखी.

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प्रोफेसर वरिंदर शर्मा कहते हैं, "व्यापार, उच्च साक्षरता और विदेशों से आने वाली कमाई के जरिए ग्रामीण जमींदारों पर निर्भरता से आजाद होकर, उन्होंने आर्थिक आजादी को पूरे गर्व के साथ सामाजिक सम्मान में बदल दिया. उनकी आबादी की मौजूदगी बेमिसाल है और उनकी पहचान गर्व से भरी है. दोआबा इस बात का जीता-जागता सबूत है कि जब आर्थिक तरक्की और राजनीतिक जागरूकता का मेल होता है, तो पूरा समुदाय 'किंगमेकर' (सत्ता तय करने वाला) बन जाता है."

इसके अलावा, लुधियाना के सिधवान खुर्द में GHG इंस्टीट्यूट ऑफफ लॉ फॉर विमेन के सोशियोलॉजी डिपार्टमेंट में अमनप्रीत कौर की रिसर्च - जिसका टाइटल 'पंजाब के दोआबा क्षेत्र में दलितों की बदलती सामाजिक स्थिति' है - से पता चलता है कि पंजाब में दलितों की स्थिति और खुद के बारे में उनकी सोच में बड़े अंतर का एक अहम कारण दलितों, खासकर दोआबा क्षेत्र के 'आद-धर्मियों' का बड़े पैमाने पर विदेशों में बसना है. रिपोर्ट के अनुसार, दोआबा क्षेत्र में हर दूसरे दलित परिवार का कम से कम एक सदस्य विदेश में रहता है; इस ट्रेंड का असर ऊंची जाति के लोगों पर भी पड़ा है.

लोकप्रिय हस्तियों का गढ़

दोआबा क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक, शैक्षिक और राजनीतिक अहमियत के लिए भी जाना जाता है. हंस राज हंस, गिन्नी माही, रूप लाल धीर, कंठ कलेर और कुलवंत काजला इस क्षेत्र के मशहूर गायक हैं, जो दलित समुदायों से आते हैं. दिलजीत दोसांझ, सतिंदर सरताज, जैजी बी और मलकीत सिंह जैसे अन्य लोकप्रिय गायकों का जन्म भी इसी क्षेत्र के अलग-अलग जिलों में हुआ था.

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दो पूर्व प्रधानमंत्रियों का भी दोआबा से नाता रहा है. जहां स्वर्गीय डॉ. मनमोहन सिंह ने पंजाब यूनिवर्सिटी (जो उस समय होशियारपुर में थी) से पढ़ाई की थी, वहीं स्वर्गीय आईके गुजराल का परिवार जालंधर से जुड़ा है. दो स्पोर्ट्स पर्सनैलिटी - हरभजन सिंह और परगट सिंह - भी जालंधर से ही हैं.

आजादी की लड़ाई लड़ने वाले क्रांतिकारी भगत सिंह का पैतृक गांव नवांशहर के खटकर कलां में है. 1914 की कोमागाता मारू यात्रा करने वाले बाबा गुरदित सिंह का परिवार कभी दोआबा में रहता था. आजादी की लड़ाई लड़ने वाले करनैल सिंह इसरू का जन्म भी दोआबा इलाके में ही हुआ था.