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फर्जी शिकायत पर सजा का प्रावधान शिक्षा समिति ने नहीं हटाया था..दिग्विजय सिंह ने यूजीसी के नए नियमों पर दी सफाई

UGC के नए इक्विटी रेगुलेशंस को लेकर जारी विवाद पर संसदीय शिक्षा समिति के चेयरमैन दिग्विजय सिंह ने कहा कि समिति ने कभी भी फर्जी शिकायत पर सजा हटाने की सिफारिश नहीं की थी. उन्होंने दावा किया कि कई महत्वपूर्ण सुझावों को UGC ने नहीं माना.

फर्जी शिकायत पर सजा का प्रावधान शिक्षा समिति ने नहीं हटाया था..दिग्विजय सिंह ने यूजीसी के नए नियमों पर दी सफाई
  • संसदीय स्थायी समिति के चेयरमैन दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट किया कि UGC ने फर्जी शिकायत पर सजा हटाई
  • समिति की सिफारिशों में SC, ST और OBC की इक्विटी कमेटियों में आधे से अधिक भागीदारी की विस्तृत परिभाषा शामिल थी
  • UGC ने संसदीय समिति की दोनों प्रमुख सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया
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नई दिल्ली:

UGC के नए इक्विटी रेगुलेशंस 2026 को लेकर देशभर के विश्वविद्यालयों में मचा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. छात्रों, शिक्षकों और कई संगठनों के विरोध के बीच अब संसदीय स्थायी समिति के चेयरमैन और कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह ने इस मुद्दे पर चुप्पी तोड़ी है. उन्होंने फेसबुक पर लिखकर स्पष्ट किया कि समिति ने न तो ‘फर्जी शिकायत पर सजा' वाले प्रावधान को हटाने की कोई सिफारिश की थी, न ही सामान्य वर्ग के छात्रों को नियमों से बाहर रखने की. उनका कहना है कि दोनों फैसले UGC ने अपनी मर्ज़ी से लिए हैं.

दिग्विजय सिंह ने खुलासा किया कि समिति के दो बड़े सुझाव UGC ने स्वीकार ही नहीं किए. पहला इक्विटी कमेटियों में SC, ST और OBC की 50% से अधिक भागीदारी का प्रस्ताव. दूसरा भेदभाव के ठोस, विस्तृत उदाहरण नियमों में शामिल करने की सिफारिश. दोनों को UGC ने अनदेखा कर दिया. इससे छात्रों में भ्रम और विरोध की स्थिति बनी.

विवाद का बड़ा कारण यह भी है कि नए नियमों से फर्जी शिकायत पर दंड का प्रावधान हटा दिया गया है, जिसे लेकर विरोध और तीखा हो गया है. कई छात्र संगठनों का कहना है कि स्पष्ट परिभाषा के अभाव में गलत आरोपों का खतरा बढ़ जाता है. उपलब्ध रिपोर्ट्स के मुताबिक, UGC ने अंतिम रेगुलेशन में यह दंड प्रावधान हटा दिया, जबकि यह समिति की सिफारिशों में शामिल नहीं था.

दिग्विजय सिंह के अनुसार, अगर UGC ने भेदभाव की परिभाषा स्पष्ट कर दी होती और विस्तृत सूची शामिल कर ली होती, तो आज ‘फर्जी केस' का डर ही पैदा नहीं होता. उन्होंने कहा कि छात्रों के गुस्से का कारण संसदीय समिति नहीं, बल्कि UGC है. अब जिम्मेदारी शिक्षा मंत्रालय की है कि वह स्थिति स्पष्ट करे और छात्रों में फैल रहे भ्रम को दूर करे.

बताते चलें कि UGC ने फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और रोहित वेमुला व पायल तड़वी के परिवारों की मांगों के बाद इक्विटी रेगुलेशन का ड्राफ्ट जारी किया था. जिसका उद्देश्य था उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को रोकना. दिसंबर 2025 में संसदीय समिति ने ड्राफ्ट की समीक्षा कर सर्वसम्मति से रिपोर्ट दी, जिसमें OBC, दिव्यांगता और भेदभाव की विस्तृत परिभाषा को शामिल करने की स्पष्ट सिफारिशें थीं.

लेकिन जनवरी 2026 में जारी अंतिम नियमों ने ही विवाद को जन्म दिया. देशभर में छात्रों का कहना है कि नए प्रावधान भ्रमित करने वाले हैं और कुछ हिस्से “दमनकारी” भी लगते हैं. कई कैंपसों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट में नियमों के खिलाफ याचिका भी दायर की जा चुकी है. मौजूदा स्थिति में गेंद UGC और शिक्षा मंत्रालय के पाले में है, जिससे छात्रों को स्पष्टता और सुरक्षा की उम्मीद है.

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