- धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सीजेपी की मांग और सरकार के बीच तीसरे दौर की बातचीत से ठीक पहले आया था
- सीजेपी ने प्रधान के इस्तीफे का 72 घंटे का अल्टीमेटम दिया था और आंदोलन को तेज करने की धमकी दी थी
- सरकार ने एनटीए अधिकारियों की छुट्टियां देकर और पेपर लीक रोकने के लिए कानून कड़ा कर प्रतिक्रिया दी थी
शुक्रवार तक धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की कोई बात नहीं थी फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि 24 घंटों के भीतर ही धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा. यह इस्तीफा सरकार और सीजेपी के बीच तीसरे दौर की बातचीत से ठीक पहले दिया गया. इस्तीफे के बाद बातचीत हुई और सीजेपी ने अपना आंदोलन समाप्त करने का फैसला किया. सूत्रों के अनुसार शुक्रवार को सरकार और सीजेपी के नेताओं के बीच हुई दूसरे दौर की बातचीत तल्खी पर खत्म हुई थी. जे पी नड्डा और जितेंद्र सिंह के सामने तन कर बैठे सीजेपी नेताओं की भाव-भंगिमा यह बताने को काफी थी कि उनके तेवर काफी कड़े हैं. सूत्रों के मुताबिक यह बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी थी. सीजेपी प्रधान के इस्तीफे की मांग से पीछे हटने को कतई तैयार नहीं थी.
सूत्रों के अनुसार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटाने के लिए सीजेपी 72 घंटों का अल्टीमेटम भी दे दिया था. उन्होंने कहा था कि हमारी एक ही मांग है- प्रधान का इस्तीफा हो. सूत्रों के अनुसार सीजेपी की ओर से सरकार को कह दिया गया था कि अगर 72 घंटों में इस्तीफा नहीं होता है तो आंदोलनकारी 20 जुलाई की ही तरह फिर से संसद की ओर मार्च किया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा था कि वे बाहर जाकर इसकी घोषणा कर देंगे. इस पर दोनों मंत्रियों ने कहा कि हम आपको बात करके बताते हैं.
धर्मेंद्र प्रधान ने पीएम मोदी को भेजा इस्तीफा
इसी बीच प्रधान ने अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री को भेज दिया. प्रधान के इस्तीफे की खबर फैलने के बाद ही नड्डा और जितेंद्र सिंह सीजेपी नेताओं से मिले. साझा प्रेस कांफ्रेंस में सीजेपी ने अपना आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की और आंदोलनकारियों से घर वापस जाने को कहा. दोनों मंत्रियों ने यह भी दोहराया कि आंदोलनकारियों पर एफआईआर नहीं होगी और NEET पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारवालों को सरकारी नियमों के तहत अधिकतम मुआवजा दिया जाएगा. सूत्रों के अनुसार सरकार इस बात से चिंतित थी कि यह आंदोलन देश के कई हिस्सों में फैलता जा रहा है. सरकार इसे अन्य आंदोलनों से अलग मान कर चल रही थी. सूत्रों के अनुसार सरकार को लगता था कि यह आंदोलन सीएए या कृषि कानूनों के खिलाफ हुए आंदोलनों से अलग हट कर था क्योंकि इससे देश के युवा जुड़ रहे थे.
परीक्षा व्यवस्था में कई अहम सुधारों की बात
सरकार उनकी नाराजगी का जोखिम मोल नहीं लेना चाहती थी. पड़ोसी देशों में छात्रों के उग्र प्रदर्शनों की तस्वीरें अभी तक जहन में ताजा हैं. वैसे सरकार ने आंदोलन को समाप्त करने के लिए भरपूर कोशिश की. परीक्षा व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण सुधारों के साथ ही शिक्षा सचिव का तबादला और फास्ट ट्रैक कोर्ट आदि के गठन का ऐलान भी किया. सोनम वांगचुक को आमरण अनशन समाप्त करने के लिए मनाया. लेकिन विपक्ष और छात्रों के दो मोर्चों पर उसकी लड़ाई धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी थी. सरकार की प्राथमिकता संसद को सुचारुपूर्ण ढंग से चलाना भी है जिसमें वह परिसीमन को लेकर संविधान संशोधन विधेयक पारित कराना चाहती है. अब प्रधान के इस्तीफे से विपक्ष के पास संसद में बाधा डालने का मुद्दा हाथ से निकल जाएगा.
अब वह हर किसी मुद्दे पर मंत्री या प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगेगा. वे यह भी कहते हैं कि अगर प्रधान से इस्तीफा लेना ही था तो पेपर लीक के तुरंत बाद ले लिया जाना चाहिए था ताकि आंदोलन और सरकार के खिलाफ छात्रों के असंतोष की नौबत ही नहीं आती. अब सरकार को इस झटके से उबरने के लिए कोई बड़ा मुद्दा आगे करना होगा. सरकार को संसद के वर्तमान मॉनसून सत्र में इसके लिए मौका भी मिल सकता है ताकि वह अपने खोई हुई हनक को दोबारा पा सके.
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि प बंगाल की शानदार जीत को श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी और नीट पेपर लीक पर छात्र आंदोलन ने फीका कर दिया है. अगले साल की शुरुआत में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले सरकार को अब कोई बड़ी राजनीतिक सफलता हासिल करनी होगी ताकि वह विपक्ष पर बढ़त बना सके. क्या संसद में परिसीमन पर संविधान संशोधन पारित कर अपना दो तिहाई बहुमत साबित करना वह राजनीतिक सफलता हो सकती है? इसके लिए इस सत्र के अंतिम सप्ताह तक प्रतीक्षा करनी होगी.
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