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पहले ना, फिर हां, क्यों हुआ धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा? जान लीजिए पीछे की पूरी कहानी

छात्रों के प्रदर्शन को देखते हुए सरकार ने बीते 48 घंटों में कई बड़े फैसले भी लिए हैं. इनमें पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानून लाने से लेकर शिक्षा सचिव को हटाने और NTA के 47 अधिकारियों पर कार्रवाई तक शामिल हैं.

पहले ना, फिर हां, क्यों हुआ धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा? जान लीजिए पीछे की पूरी कहानी
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से दिया इस्तीफा
NDTV
नई दिल्ली:

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आज इस्तीफा क्यों दिया? अगर इस्तीफा देना ही था तो पहले दे देते थे. ऐसा करते तो उनके इस्तीफे की मांग को लेकर चलाया जा रहा आंदोलन इतना व्यापक रूप नहीं लेता. आखिर उनके इस्तीफे में इतना समय क्यों लगा? यह सारे प्रश्न आज हवा में तैर रहे हैं. सरकार को उम्मीद थी कि सोनम वांगचुक के आमरण अनशन समाप्त करने के बाद जंतर मंतर पर चल रहा सीजेपी का आंदोलन ठंडा पड़ जाएगा. वांगचुक ने अपने बयान में प्रधान के इस्तीफे पर कुछ नहीं कहा था. लेकिन एक तरफ राहुल गांधी और दूसरी ओर अभिजीत दिपके वांगचुक के अनशन समाप्त करने के बाद भी प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहे. यहां तक कि कांग्रेस नेताओं ने वांगचुक पर हमला भी बोल दिया और पूछा कि उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा के हाथों से जूस पीकर अनशन क्यों समाप्त किया. वहीं दिपके की भाषा नर्म थी लेकिन तेवर गर्म. उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि प्रधान के इस्तीफे से कम पर कुछ भी मंजूर नहीं. शुक्रवार को सरकार के साथ बातचीत में भी सीजेपी के नेताओं ने दो टूक कह दिया था कि अगर प्रधान इस्तीफा नहीं देते तो बातचीत का कोई मतलब नहीं.
 

जबकि सरकार आनन-फानन में परीक्षा सुधार को लेकर कई फैसले कर चुकी थी. पिछले 48 घंटों में सरकार ने छह बडे फैसले किए थे. इनमें पेपर लीक के खिलाफ कठोर कानून से लेकर शिक्षा सचिव को हटाना और एनटीए से 47 अधिकारियों को हटाने से लेकर फास्ट्र ट्रैक कोर्ट बनाना तक शामिल है. इसके बावजूद प्रदर्शनकारी संतुष्ट नहीं थे. वे प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहे.

 
जिस तरह से प्रधान ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए त्याग पत्र इसलिए देने की बात लिखी है कि राष्ट्र विरोधी ताकतें मौजूदा परिस्थितियों का किसी प्रकार से लाभ न उठाएं, उससे यह स्पष्ट है कि सरकार को कुछ और अनिष्ट होने की आशंका थी. इससे पहले सोमवार 20 जुलाई को प्रदर्शनकारी संसद भवन के बेहद नजदीक पहुंच चुके थे. संभवत सरकार के पास सूचना हो कि आंदोलनकारियों का इरादा इस आंदोलन को लंबा खींचने का हो क्योंकि सरकार के तमाम कदमों के बावजूद वे प्रधान के इस्तीफे पर ही अड़े हुए थे.

पीएम मोदी ने दो बार किया था छात्रों को संबोधित

सरकार शुरू से यह कहती आ रही थी कि यह एक राजनीतिक मांग थी. पंद्रह अगस्त केवल बीस दिन दूर है. शायद यह योजना रही हो कि तब तक आंदोलन को देशव्यापी उग्र रूप दे दिया जाए. बिहार और महाराष्ट्र से आ रही तस्वीरें भी सरकार का सिरदर्द बन रही थीं जहां छात्रों का प्रदर्शन उग्र रूप लेता जा रहा था. जंतर मंतर से कुछ छात्रों के वे वीडियो भी सरकार के लिए परेशानी का सबब बन रहे थे जिनमें अपशब्दों का प्रयोग किया जा रहा था. जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को छात्रों को संबोधित करने के लिए दो बार सोशल मीडिया पर आना पड़ा, वह भी यह बताता है कि सरकार को युवाओं के आक्रोश को लेकर किस तरह चिंता है. दो वरिष्ठ मंत्रियों को आंदोलनकारियों से बातचीत के लिए नियुक्त करना. न्यूट्रल जगह पर बातचीत की उनकी मांग को मानना और एक के बाद एक फैसलों के झड़ी लगाना यह बताता है कि सरकार इस आंदोलन को एक बड़ी चुनौती के रूप में ले चुकी थी.

विपक्ष ने ठुकराया था चर्चा का प्रस्ताव

सरकार के सामने दूसरी बड़ी राजनीतिक चुनौती भी थी. मॉनसून सत्र का पहला हफ्ता धुल चुका है. NEET पेपर लीक पर सरकार की चर्चा की पेशकश को विपक्ष ठुकरा चुका था. राहुल गांधी ने स्पष्ट कहा था कि बिना प्रधान के इस्तीफे के, कोई चर्चा नहीं होगी. सरकार पहले हफ्ते में कोई बिल पारित नहीं कर सकी थी. केवल वंदे मातरम को जन गण मन की भांति कानूनी सुरक्षा देने का बिल ही पेश किया जा सका. अगर प्रधान का इस्तीफा नहीं होता तो शायद दूसरे हफ्ते भी कोई काम नहीं हो पाता. सरकार के लिए संसद का यह गतिरोध सुलझाना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वह इस सत्र में परिसीमन का महत्वाकांक्षी संविधान संशोधन विधेयक पारित कराना चाहती है.

अप्रैल में विशेष सत्र में दो तिहाई बहुमत न होने के कारण ऐसा नहीं हो सका था लेकिन उसके बाद से सरकार ने दो तिहाई बहुमत की व्यवस्था करने की दिशा में बड़े कदम उठाए हैं. अब उसकी उम्मीदें एनसीपी शरद पवार के आठ और डीएमके के 22 सांसदों पर टिकी हैं. लेकिन छात्रों के आंदोलन के कारण इन दोनों दलों के सामने सरकार के साथ न दिखने की चुनौती थी. जहां डीएमके नीट परीक्षा को ही रद्द करने की अपनी पुरानी मांग दोहरा रही थी वहीं शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले राहुल गांधी के धरने से लेकर जंतर मंतर के प्रदर्शन तक दिख रहे थे. अब अगर प्रदर्शन समाप्त होता है तो शायद वे सरकार के साथ आने के लिए कोई रास्ता तलाश सकते हैं.

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा का हो सकता है गहरा असर

शिक्षा मंत्री धमेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े का लंबे समय में गहरा असर हो‌ सकता है.  राजनीतिक रूप से भाजपा सरकार के लिए यह दोतरफ़ा तलवार साबित हो सकता है. विपक्ष इसे अपनी जीत बताकर दबाव बढ़ाएगा, जबकि युवा वर्ग में इससे जवाबदेही का संदेश जाएगा. मौजूदा संसद सत्र में सरकार की रणनीति सतर्क लेकिन आक्रामक रहेगी. सरकार सोमवार को कड़ी सज़ा और जुर्माने के प्रावधान वाला विधेयक पारित कराकर यह दिखाने की कोशिश करेगी कि उसने छात्रों की बात सुनी है. वहीं विपक्ष इस पूरे मसले पर आयोजित चर्चा में सरकार को घेरने की कोशिश करेगा. इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि पिछले 12 साल में यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार से पहला इस्तीफ़ा है, लेकिन यह इस्तीफ़ा विपक्ष के कारण नहीं हुआ बल्कि छात्रों के गहरे क्षोभ का परिणाम है. फिर भी प्रधान के त्यागपत्र का श्रेय कौन लेगा इसे लेकर विपक्ष की खींचतान और बढ़ेगी.

कांग्रेस भले ही आंदोलन में देर से कूदी हो, लेकिन प्रधान के इस्तीफ़े का श्रेय लेने को लेकर उसका मुकाबला अब आम आदमी पार्टी से होगा. प्रधानमंत्री के घर के बाहर राहुल गांधी के धरने से यह दरार और स्पष्ट हो गई थी. विपक्षी दलों की यह आपसी फूट सरकार के लिए कम से कम निकट भविष्य में फ़ायदेमंद साबित हो सकती है. खींचतान के कारण विपक्ष एकजुट नहीं रह पाएगा, जिससे सरकार को परिसीमन जैसे महत्त्वपूर्ण विधेयक पास कराने में आसानी हो सकती है.बीते कुछ दिनों में ख़ुद प्रधानमंत्री ने कड़े सुधारों के संकेत दिए हैं.

हालांकि सरकार इसके बाद शिक्षा क्षेत्र में एक बड़े रीसेट की ओर बढ़ सकती है. नेताओं और उद्योगपतियों के स्वामित्व वाले निजी कोचिंग और शिक्षा संस्थान कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं. बीते तीन दशक में इन्होंने सरकारी संस्थानों को जानबूझकर कमज़ोर किया. अब सख़्त नियमन, फ़ीस पर नियंत्रण, और पारदर्शी ढंग से प्रतियोगी परीक्षाएँ करवाने का समय है. सरकार अगर बड़े सुधारों की ओर बढ़ती है तो जनता इस कार्रवाई का पूरा समर्थन भी करेगी. इससे उसे न सिर्फ़ राजनीतिक लाभ होगा बल्कि युवाओं का शिक्षा व्यवस्था पर विश्वास भी लौटेगा. संकट को अवसर में बदलने का यह सही समय है.

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