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दिल्ली के गड्डों से लेकर फिजी तक: कैसे एक 16 साल के लड़के ने सड़कें ठीक करने के लिए बनाया AI प्लेटफॉर्म

'सड़क' का अगला कदम सिर्फ लोगों की व्यक्तिगत शिकायतों से कहीं आगे का हो सकता है. पार्थ का मानना है कि आम जनता की तरफ से आने वाली हजारों रिपोर्ट मिलकर यह साफ दिखा सकती हैं कि सड़कों की हालत कहां सबसे ज्यादा खराब है.

दिल्ली के गड्डों से लेकर फिजी तक: कैसे एक 16 साल के लड़के ने सड़कें ठीक करने के लिए बनाया AI प्लेटफॉर्म
फाइल फोटो
India

दिल्ली के रहने वाले 16 साल के पार्थ आनंद के बनाए 'प्रोजेक्ट सड़क' पर अब तक 1,900 से ज्यादा गड्डों की शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं और इनमें से 30 गड्डों की मरम्मत की पुष्टि भी हो चुकी है. अब वह अपने इस AI प्लेटफॉर्म को भारत और विदेशों की सरकारों व संस्थाओं के साथ जोड़ने की तैयारी में हैं. ये कहानी तब शुरू हुई जब एक हादसे में पार्थ के माता-पिता गड्ढे की वजह से चोटिल हो गए. इसी एक हादसे ने दिल्ली के इस 16 साल के लड़के को सड़कों की इस दुर्दशा से लड़कर एक ऐसा AI सिस्टम बनाने पर मजबूर कर दिया, जिसे आज वह विदेशों की अथॉरिटीज के सामने पेश कर रहा है.

फिजी से आई पेशकश

NDTV से साझा किए गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक, उनके इस प्लेटफॉर्म 'प्रोजेक्ट सड़क' पर 1,900 से ज्यादा गड्डों की रिपोर्ट आ चुकी है और 30 गड्डों के बिल्कुल ठीक होने का पक्का सबूत भी मिल चुका है. अब इस दिल्ली के नौजवान का कहना है कि वह दिल्ली नगर निगम (MCD) के साथ एक कामकाजी रिश्ते की बात चला रहे हैं, फिजी रोड्स अथॉरिटी को 90 दिनों के एक पायलट प्रोजेक्ट की पेशकश भेजी है और लाइबेरिया के नेशनल रोड फंड से भी शुरुआती बातचीत चल रही है.

भारत की बात करें तो, पार्थ 'कार्स24' के सह-संस्थापक और 'क्रैशफ्री इंडिया' के बानी गजेंद्र जांगिड़ के साथ मिलकर डेटा साझा करने के एक समझौते पर भी काम कर रहे हैं. लेकिन 'सड़क' के पीछे इतना सारा AI होने के बावजूद, पार्थ ने यह अच्छी तरह समझ लिया है कि कभी-कभी गड्ढा भरने के लिए बहुत बड़ी टेक्नोलॉजी की नहीं, बल्कि सही दरवाजे पर दस्तक देने की जरूरत होती है.

दिल्ली का ही एक वाकया है, जहां वह अपने प्लेटफॉर्म से निकली रिपोर्ट लेकर सीधा अपने वार्ड के पार्षद के दफ्तर पहुंच गए और कार्रवाई की गुजारिश की. पार्थ ने NDTV को बताया, "और महज कुछ ही दिनों के अंदर वे गड्ढे भर दिए गए."

एक हादसा, एक सवाल

'सड़क' बनाने का खयाल पार्थ के जहन में तब आया जब उनके माता-पिता की मोटरसाइकिल एक गड्ढे में गिर गई और वे जख्मी हो गए. जब पार्थ ने यह पता लगाने की कोशिश की कि ऐसी शिकायतों का क्या जरिया है, तो उन्हें अहसास हुआ कि असल मसला शिकायत दर्ज कराने का नहीं है. असल दिक्कत तो यह है कि शिकायत दर्ज होने के बाद उसका होता क्या है.

उन्होंने कहा, "मेरे पिता और मां मोटरसाइकिल पर थे जब वे गड्ढे में गिरे और उन्हें चोट आई. जब मैंने शिकायत का तरीका ढूंढा, तो समझ आया कि मसला सिर्फ एक खराब सड़क का नहीं है."

पार्थ कहते हैं, "शिकायतें एक ऐसे सिस्टम में खो जाती हैं जहां किसी को खबर ही नहीं होती कि आगे क्या हुआ, और वही गड्ढे महीनों तक वैसे ही रहते हैं. ऐसे में एक और शिकायत दर्ज कराना बेकार सा लगता था."

15 साल की उम्र में 'सड़क' प्लेमफॉर्म बनाया

जब पार्थ ने 'सड़क' पर काम शुरू किया था, तब वह 15 साल के थे. अब वह 16 के हो चुके हैं. उन्होंने बताया, "मैं एक ऐसा सिस्टम बनाना चाहता था जो हर गड्ढे को उजागर करे, उस पर नजर रखे और जब तक वह सच में ठीक न हो जाए, तब तक जिम्मेदारों पर दबाव बनाए रखे."

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में पूरे भारत में गड्डों की वजह से 5,432 सड़क हादसे दर्ज हुए, जिनमें 2,385 लोगों की जान चली गई और 4,643 लोग जख्मी हुए. अकेले दिल्ली में ही ऐसे 84 हादसे हुए और 16 लोगों की मौत हो गई.

सड़कों की मरम्मत की शिकायत के लिए पहले से भी कुछ सरकारी जरिए मौजूद हैं. जैसे दिल्ली में MCD का '311' प्लेटफॉर्म गड्डों और नागरिक समस्याओं की शिकायतें दर्ज करता है.

लेकिन एक और बड़ी उलझन यह है कि अलग-अलग सड़कें अलग-अलग सरकारी महकमों के तहत आती हैं.

पार्थ का मानना है कि 'सड़क' इसी उलझन को सुलझाता है. NDTV से बात करते हुए उन्होंने कहा, "आपको यह जानने की बिल्कुल जरूरत नहीं है कि सड़क MCD की है, PWD की है या किसी और विभाग की है. यह पता लगाना हमारा काम है."

फोटो खींचिए, AI खुद ढूंढ निकालेगा सही विभाग

'सड़क' की शुरुआत एक तस्वीर से होती है. यह प्लेटफॉर्म उस जगह की लोकेशन दर्ज करता है और पार्थ के मुताबिक, उस फोटो को परखकर यह तय करता है कि क्या यह सचमुच एक गड्ढा ही है, नुकसान कितना गहरा है और क्या पहले भी किसी ने इस गड्ढे की रिपोर्ट दर्ज कराई है.

इसके बाद AI एजेंट्स यह पहचानते हैं कि उस सड़क की जिम्मेदारी किस अथॉरिटी की है और सीधा उसी के पास शिकायत दर्ज करा देते हैं.

पार्थ ने बताया, "एक आम शिकायत ऐप तो सिर्फ वही आगे भेज देता है जो आप भेजते हैं. लेकिन हमारा सिस्टम उस तस्वीर की खुद जांच करता है कि क्या यह वाकई गड्ढा है, यह कितना खतरनाक है, क्या यह वही गड्ढा तो नहीं जिसकी रिपोर्ट कोई पहले ही कर चुका है? इसके अलावा यह सही महकमे की पहचान करके शिकायत को सीधे वहीं दाखिल कर देता है."

इस विचार का मकसद अधिकारियों को एक ही गड्ढे की बार-बार मिलने वाली शिकायतों और धुंधली तस्वीरों के झंझट से बचाना है. उन्होंने कहा, "इसका मतलब यह है कि अफसरों को सैकड़ों फालतू और धुंधली तस्वीरों के बजाय एक साफ-सुथरी लिस्ट मिल जाती है." 

लेकिन शिकायत भेज देने भर से 'सड़क' की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती. रिपोर्ट किए गए गड्ढे एक सार्वजनिक नक्शे (पब्लिक मैप) पर दिखाई देते हैं, जिससे आम लोग भी देख सकते हैं कि कोई गड्ढा कितने वक्त से बिना भरा पड़ा है.

सड़कें ठीक होने के बाद भी कुछ काम बाकी रह जाता है?

और जब किसी गड्ढे के ठीक होने की खबर आती है, तो पार्थ के मुताबिक यह प्लेटफॉर्म 'पहले और बाद' की तस्वीरों का मिलान करके असलियत की जांच करता है. उन्होंने कहा, "यह हमें यह परखने का मौका देता है कि क्या गड्ढा सच में भर गया है या फिर उसे सिर्फ कागजों पर 'सुलझा हुआ' दिखा दिया गया है."

पार्थ ने बताया, "हमें 1,900 से ज्यादा रिपोर्ट मिली हैं और 30 गड्डों के ठीक होने की तस्दीक हो चुकी है. तस्दीक का मतलब है कि हमने यह पक्का किया कि गड्ढा 'सड़क' के जरिए ही रिपोर्ट हुआ था और बाद में उसे ठीक कर दिया गया."

पार्थ के मुताबिक, 'सड़क' अब दिल्ली, बेंगलुरु और देश के दूसरे हिस्सों में भी काम कर रहा है.

जब AI भी काफी नहीं होता

सरकारी महकमों का रवैया हर जगह एक जैसा नहीं रहा है. पार्थ कहते हैं, "मिला-जुला असर है. कुछ महकमे अब हमारी शुरुआत के मुकाबले बहुत तेजी से जवाब देते हैं, जबकि कुछ जगह अब भी बार-बार याद दिलाना पड़ता है."

दिल्ली में ऐसा ही एक मामला उन्हें अपने स्थानीय पार्षद के दफ्तर तक ले गया. दूसरी तरफ बेंगलुरु में, पार्थ ने बताया कि 'सड़क' की ओर से BBMP को शिकायत दर्ज कराने के महज दो दिनों के भीतर गड्ढा भर दिया गया. इन तजुर्बों ने टेक्नोलॉजी की सीमाओं को भी सामने रखा है.

एआई की भी अपनी सीमाएं तो हैं ही

AI गड्ढे की पहचान कर सकता है, उसकी जगह बता सकता है, दोहराव पकड़ सकता है और यह भी तय कर सकता है कि शिकायत किस दफ्तर जानी चाहिए. लेकिन वह इस बात की गारंटी नहीं दे सकता कि दूसरी तरफ बैठा इंसान उस पर कदम भी उठाएगा.

कभी-कभी टेक्नोलॉजी सिर्फ रास्ता दिखा सकती है, लेकिन उस रास्ते पर चलकर काम पूरा कराने के लिए किसी न किसी को पैरवी करनी ही पड़ती है.

MCD से बातचीत और फिजी में पायलट प्रोजेक्ट की पेशकश

पार्थ अब 'सड़क' को सिर्फ एक-एक शिकायत तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि सड़कों की जिम्मेदारी संभालने वाली बड़ी संस्थाओं के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं. दिल्ली में उन्होंने बताया कि MCD के साथ बातचीत चल रही है.

उन्होंने कहा, "हमारा ध्यान MCD के सहमति पत्र (लेटर ऑफ इंटेंट) को एक मजबूत साझेदारी में बदलने पर है."

हालांकि, नगर निगम की तरफ से अभी तक किसी आधिकारिक साझेदारी का ऐलान नहीं किया गया है. देश के बाहर, पार्थ ने फिजी रोड्स अथॉरिटी को 90 दिनों के एक पायलट प्रोजेक्ट की पेशकश भेजी है, जिसके तहत उनके शिकायत निवारण सिस्टम में इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जा सकता है.

फिलहाल इस प्रस्ताव को हरी झंडी मिलने का इंतजार है. उन्होंने NDTV को बताया, "जैसे ही वहां से जवाब आएगा, फिजी का पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो जाएगा."

फिजी रोड्स अथॉरिटी के पास लोगों की शिकायतें सुनने का जरिया पहले से मौजूद है. 'सड़क' का मकसद उनके इस ढर्रे में अपना AI सिस्टम जोड़ना है, जो शिकायतों को सही जगह बांटेगा, उन पर नजर रखेगा और काम पूरा होने की तस्दीक करेगा.

अगर इसे मंजूरी मिल जाती है, तो यह किसी विदेशी सड़क प्राधिकरण के साथ इस प्लेटफॉर्म का पहला बड़ा इम्तिहान होगा. पार्थ ने यह भी बताया कि लाइबेरिया के नेशनल रोड फंड से भी सड़क-रिपोर्टिंग सिस्टम को लेकर शुरुआती दौर की बातचीत चल रही है. हालांकि, वे चर्चाएं अभी बिल्कुल शुरुआती स्तर पर हैं.

शिकायतों से सड़क सुरक्षा के डेटा तक

'सड़क' का अगला कदम सिर्फ लोगों की व्यक्तिगत शिकायतों से कहीं आगे का हो सकता है. पार्थ का मानना है कि आम जनता की तरफ से आने वाली हजारों रिपोर्ट मिलकर यह साफ दिखा सकती हैं कि सड़कों की हालत कहां सबसे ज्यादा खराब है, कौन से गड्ढे बेहद खतरनाक हैं और कौन सी शिकायतें सबसे ज्यादा वक्त से पेंडिंग हैं.

इसी सोच के साथ उन्होंने अपने देश में भी एक साझीदारी का हाथ बढ़ाया है. पार्थ ने बताया कि वह 'कार्स24' के सह-संस्थापक और 'क्रैशफ्री इंडिया' के बानी गजेंद्र जांगिड़ के साथ डेटा साझा करने के एक समझौते पर काम कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, "सोच यह है कि 'सड़क' पर आने वाली पब्लिक रिपोर्ट यह साफ दिखाएं कि सबसे खतरनाक गड्ढे कहां हैं और वे कब से खुले पड़े हैं. फिर इसी डेटा की मदद से 'क्रैशफ्री इंडिया' अपने 'जीरो पॉटहोल इंडिया' अभियान के तहत सही जगह ध्यान दे सके और तेजी से मरम्मत करा सके."

एक गड्ढे की रिपोर्ट सिर्फ एक खराब सड़क की पहचान कराती है. लेकिन 1,900 से ज्यादा रिपोर्ट एक पूरे पैटर्न को सामने ला देती है.

'हमारे पास बस साधन ज्यादा हैं'

पार्थ ऐसा नहीं मानते कि आज की पीढ़ी में नागरिक समस्याओं को सुलझाने का जज्बा पुरानी पीढ़ियों से ज्यादा है.
उनका मानना है कि बस आज के दौर में ऐसे औजार मौजूद हैं जो काम को आसान बना देते हैं.

NDTV से बातचीत में उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि हमारे पास बस साधन ज्यादा हैं."

लेकिन कोई प्लेटफॉर्म बना लेना ही पूरी पहेली का हल नहीं है, यह बात पार्थ भी समझ चुके हैं. लोगों के दिल में यह भरोसा जगाना कि उनकी शिकायत से वाकई कोई बदलाव आएगा, यह ज्यादा बड़ा चैलेंज है. पार्थ कहते हैं, "ज्यादातर लोग काम करने से पीछे नहीं हटते, बस वे यह मान बैठते हैं कि कुछ बदलने वाला नहीं है. अगर आप 30 गड्ढे भी ठीक करके दिखा देते हैं, तो लोगों को लगने लगता है कि कोशिश करने में कोई बुराई नहीं है."

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