कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के जेल में बंद नेता, सौरव दास और आशुतोष रांका ने मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था. अब दिल्ली हाई कोर्ट बुधवार, 21 अक्टूबर को उनकी याचिका पर सुनवाई के लिए राजी हो गया है. दोनों CJP नेताओं ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उनकी न्यायिक हिरासत को दो और दिनों के लिए बढ़ा दिया गया था. दोनों की ओर से दायर याचिका में मंगलवार की रात ही सुनवाई की अपील की गई थी. खास बात है कि हाई कोर्ट दशहरा की छुट्टियों के कारण इस हफ्ते बंद है, लेकिन अर्जेंट मामलों की सुनवाई होती है.
इसके अलावा दिल्ली हाई कोर्ट ने नेहा बोरा की उस याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमति दे दी है, जिसमें उन्होंने दिल्ली पुलिस के उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उनसे जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए एक जमानतदार के साथ 10,000 रुपये का बॉन्ड भरने को कहा गया था. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा भी CJI के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आंदोलन को लीड कर रही हैं.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला सौरव दास और आशुतोष रांका की तरफ से पहले भरे गए पीस बॉन्ड के कथित उल्लंघन से जुड़ा है. आरोप है कि उन्होंने प्रतिबंधात्मक आदेशों का उल्लंघन करते हुए दोनों ने जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने की कोशिश की थी. इससे पहले, 14 अक्टूबर को एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट महेश कुमार मीणा ने इन दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था. इस मामले में आगे की कार्यवाही के लिए 19 अक्टूबर की तारीख तय की गई थी, जिस दिन याचिकाकर्ताओं की न्यायिक हिरासत को दो दिन और बढ़ा दिया गया.
दोनों की याचिका में क्या है?
सौरव और आशुतोष, दोनों ने अपनी न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने के खिलाफ तत्काल सुनवाई की मांग की. दोनों ने हाई कोर्ट में रात के समय सुनवाई की अपील की थी. लेकिन रात में तो सुनवाई नहीं हुई. अपनी याचिका में उन्होंने विशेष मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी है, जिसके तहत उन्हें दो दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था. उन्होंने कहा कि यह आदेश कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके 'स्वतंत्रता के अधिकार' के खिलाफ है. याचिका में तर्क दिया गया है कि यह आदेश गैर-कानूनी और मनमाना है, जिसे रद्द किया जाना चाहिए. इसमें कहा गया है कि कई बार जरूरी जमानतदार पेश करने के बावजूद, दोनों पिछले छह दिनों से हिरासत में हैं.
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि सार्वजनिक व्यवस्था के हित में किसी की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए, उस व्यक्ति के कार्यों और सार्वजनिक व्यवस्था में गड़बड़ी के बीच एक "सीधा और वास्तविक संबंध" होना चाहिए, न कि केवल कोई दूर की संभावना. इसमें यह भी दलील दी गई है कि किसी 'डीनोटिफाइड' जगह पर विरोध-प्रदर्शन का मामला, ज्यादा से ज्यादा, केवल नियमों के पालन या विनियमन से जुड़ा हो सकता है; इसे सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा नहीं माना जा सकता.
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