विज्ञापन
This Article is From Jul 18, 2025

पक्ष रखने का अवसर नहीं... जस्टिस वर्मा ने इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट में दी जांच पैनल रिपोर्ट को चुनौती

जस्टिस वर्मा ने अपनी दलील में कहा है कि उन्हें व्यक्तिगत सुनवाई का मौका दिए बिना ही दोषी ठहराया गया है. उन्होंने तीन सदस्यीय जांच पैनल पर आरोप लगाया कि उसने उन्हें पूरी और निष्पक्ष सुनवाई का मौका दिए बिना ही प्रतिकूल निष्कर्ष निकाले.

पक्ष रखने का अवसर नहीं... जस्टिस वर्मा ने इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट में दी जांच पैनल रिपोर्ट को चुनौती
जस्टिस यशवंत वर्मा ने किया सुप्रीम कोर्ट का रुख.
  • जस्टिस यशवंत वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की आंतरिक जांच कमेटी की रिपोर्ट को अमान्य करने की याचिका दायर की है.
  • उन्होंने कहा कि जांच प्रक्रिया संवैधानिक नहीं है और अनुच्छेद 124 तथा 218 के तहत विधायी सुरक्षा उपायों का उल्लंघन करती है.
  • जांच बिना किसी औपचारिक शिकायत के शुरू हुई और आरोपों का सार्वजनिक खुलासा मीडिया में किया गया, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा.
नई दिल्ली:

आवास से जले नोट मिलने के मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा (Justice Yashwant Verma) ने सुप्रीम कोर्ट में अंतरिम जांच पैनल रिपोर्ट को चुनौती दी है. उन्होंने मांग की है कि तीन जजों की आंतरिक जांच कमेटी की रिपोर्ट को अमान्य करार दिया जाए. दरअसल उन्होंने इसके लिए अपनी याचिका में कई आधार दिए हैं. सबकुछ डिटेल में जानें.

ये भी पढ़ें- राष्ट्रपति को भेजी गई सिफारिश रद्द की जाए... जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की याचिका, पढ़ें और क्या कुछ कहा

विधायी सुरक्षा उपायों को दरकिनार किया

 जिस तरह CJI खन्ना ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मुझे पद से हटाने की सिफारिश की है वह गलत है. यह संवैधानिक प्रक्रिया और अनुच्छेद 124 और 218 के तहत विधायी सुरक्षा उपायों को दरकिनार करता है. 

यह प्रक्रिया संविधान पर आधारित नहीं 

आंतरिक प्रक्रिया को कानूनी स्वीकृति नहीं है. यह प्रक्रिया प्रशासनिक प्रकृति की है और कानून या संविधान पर आधारित नहीं है. इसका उपयोग संवैधानिक पद से हटाने की सिफारिश करने के लिए नहीं किया जा सकता.

 जज  के खिलाफ कोई औपचारिक शिकायत नहीं

 जांच बिना किसी औपचारिक शिकायत के केवल अनुमानों और अपुष्ट सूचनाओं पर आधारित होकर शुरू हुई. यह आंतरिक प्रक्रिया के मूल स्वरूप और उद्देश्य के विपरीत है.

सुप्रीम कोर्ट की प्रेस रिलीज से हुआ मीडिया ट्रायल

22.03.2025 को जारी सुप्रीम कोर्ट  की प्रेस विज्ञप्ति में सार्वजनिक रूप से आरोपों का खुलासा किया गया. इससे मीडिया में तीखी अटकलें लगाई गईं, जिससे जज की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची और उनके गरिमा के अधिकार का हनन हुआ. 

निष्पक्ष सुनवाई और उचित प्रक्रिया से इनकार

कमेटी ने उन्हें सबूतों तक पहुंच से वंचित कर दिया, सीसीटीवी फुटेज रोक ली और आरोपों का खंडन करने का कोई मौका नहीं दिया. उनकी अनुपस्थिति में प्रमुख गवाहों से पूछताछ की गई, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ. 

कमेटी ने सीमित अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया

जांच में मुख्य सवालों की अनदेखी की गई, जैसे कि नकदी किसने रखी, क्या वह असली थी या आग किस कारण लगी. ये सवाल दोष या निर्दोषता स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण थे.

अंतिम रिपोर्ट अनुमानों पर आधारित, न कि सबूतों  पर

कमेटी ने ठोस सबूतों के बिना व्यापक निष्कर्ष निकाले. यह अनुमानों पर निर्भर थी और गंभीर कदाचार साबित करने का भार वहन करने में विफल रही.

मुख्य न्यायाधीश ने व्यक्तिगत सुनवाई के बिना लिया फैसला 

अंतिम रिपोर्ट प्राप्त होने के कुछ ही घंटों के भीतर, मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें इस्तीफा देने या पद से हटाए जाने का सामना करने के लिए तैयार रहने को कहा. कोई व्यक्तिगत बातचीत या अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया. 

पिछले उदाहरणों के साथ प्रक्रियात्मक खामियां 

इसी तरह की परिस्थितियों में पहले के जजों को किसी भी कार्रवाई से पहले व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया गया था.
इस मामले में सुनवाई का अवसर न देना मनमाना है और स्थापित परंपराओं का उल्लंघन है. 

मीडिया लीक के कारण अपूरणीय क्षति

गोपनीय अंतिम रिपोर्ट की सामग्री लीक हो गई और प्रेस में गलत तरीके से प्रस्तुत की गई, इससे प्रतिष्ठा को और भी अधिक क्षति पहुंची और प्रक्रिया की पवित्रता को ठेस पहुंची.
 

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Justice Yashwant Verma Case, Justice Yashwant Verma News, Supreme Court, Burnt Cash Case, Justice Yashwant Varma Cash Case
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com