कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने का फैसला लगभग तय है, लेकिन असली चुनौती अब शुरू होती है. यह सिर्फ चेहरा बदलने का मामला नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन दोनों में बड़े फेरबदल की जरूरत है.
CM बदलेगा, पूरा सेटअप बदलेगा
अगर डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनते हैं, तो उन्हें उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दोनों पद छोड़ने होंगे. इसका मतलब साफ है कि एक साथ कई अहम पद खाली होंगे और नई नियुक्तियों का सिलसिला शुरू होगा.
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दो डिप्टी CM फॉर्मूला?
सूत्रों के मुताबिक, नए सत्ता संतुलन के लिए दो उपमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं. इसमें जातीय समीकरणों का खास ख्याल रखा जाएगा, ताकि सभी वर्गों को साधा जा सके.
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सबसे बड़ी चुनौती: नया प्रदेश अध्यक्ष
कांग्रेस के सामने सबसे अहम सवाल प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति का है. जानकारों का मानना है कि डीके शिवकुमार के पास दोहरी जिम्मेदारी होने के कारण संगठन पर असर पड़ा. अब पार्टी को एक फुल-टाइम और मजबूत प्रदेश अध्यक्ष की जरूरत होगी.
दिल्ली बनाम बेंगलुरु: सिद्धारमैया की भूमिका
सियासत की सबसे बड़ी पहेली यह है कि सिद्धारमैया आगे क्या करेंगे. क्या वह विधायक बने रहेंगे या दिल्ली की राजनीति में जाएंगे? अगर वह राज्य में ही रहते हैं, तो 2028 तक कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं. साथ ही, उनके बेटे यतीन्द्र सिद्धारमैया को मंत्री बनाने की मांग भी उठ सकती है, जो अभी विधान परिषद के सदस्य हैं.
खरगे फैक्टर भी अहम
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी कर्नाटक से आते हैं. ऐसे में उनके बेटे और मंत्री प्रियांक खरगे को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं कि उन्हें डिप्टी CM बनाया जा सकता है.
सत्ता संघर्ष की अंदरूनी कहानी
कांग्रेस के अंदर चल रही खींचतान को लेकर कई नेताओं में चर्चा है कि यह टकराव 'जेठानी‑देवरानी' जैसा है, जिसमें समय‑समय पर हाईकमान को हस्तक्षेप करना पड़ता है. इस बार मामला इतना बढ़ा कि 'बंटवारे' जैसा समाधान निकालना पड़ा.
2028 और 2029 पर नजर
यह बदलाव सिर्फ तत्काल राजनीति नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीति से भी जुड़ा है. 2028 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव और 2029 में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर यह बदलाव अहम है. 2024 लोकसभा में कांग्रेस को कर्नाटक में उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली थी. ऐसे में राहुल गांधी ने डीके शिवकुमार पर बड़ा दांव खेला है.
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एंटी‑इंकंबेंसी से निपटने की कोशिश
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि मुख्यमंत्री बदलकर एंटी‑इंकंबेंसी को कम किया जा सकता है. लेकिन यह फॉर्मूला हर बार सफल नहीं होता. पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की जगह चन्नी को लाने का प्रयोग इसका उदाहरण है.
दो साल का मौका, बड़ा इम्तिहान
अगर डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनते हैं, तो उनके पास करीब दो साल का वक्त होगा. इस दौरान उन्हें सरकार को स्थिर रखना, संगठन को मजबूत करना और चुनावी नतीजे देकर दिखाना होगा.
ऐसे में यह तो साफ है कि कर्नाटक में सीएम बदलना एक राजनीतिक घटना भर नहीं, बल्कि एक बड़े प्रयोग की शुरुआत है. सवाल यही है कि क्या यह बदलाव कांग्रेस को मजबूत करेगा या अंदरूनी खींचतान और बढ़ेगी?
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