कांग्रेस आलाकमान ने कर्नाटक में तीन साल के बाद मुख्यमंत्री बदलने का फैसला किया है. सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद डीके शिवकुमार कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री होने जा रहे हैं. कांग्रेस ने यह बड़ा फैसला दो साल बाद होने वाले अगले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया है. ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस के लिए बीच सरकार में सीएम बदलना कितना फायदेमंद होगा?
इसकी कसौटी है अगला विधानसभा चुनाव. कर्नाटक में बीते चार दशकों से कोई भी सरकार दोबारा जीत कर नहीं आई है. 2013 से 2018 तक सरकार चलाने के बाद सिद्धारमैया भी चुनाव में कांग्रेस को बहुमत नहीं दिला पाए थे. क्या डीके शिवकुमार दो सालों में चार दशक का सियासी इतिहास बदल पाएंगे?
'फाइटर' नेता रहे हैं शिवकुमार
कर्नाटक कांग्रेस के एक अनुभवी नेता बताते हैं कि इस बदलाव को लेकर अभी कुछ भी अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी. डीके शिवकुमार की छवि मेहनत करने वाले 'फाइटर' नेता की है. वो कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI से शुरू कर यहां तक पहुंचे हैं. गांधी परिवार से उनकी नजदीकी है. ऐसे में वो बिना किसी दबाव के काम कर पाएंगे और उनमें एंटी इंकम्बेंसी को कम करने की क्षमता है.
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कैसे भरपाई करेगी कांग्रेस?
इस फेरबदल को लेकर बीजेपी ओबीसी कार्ड खेलने की कोशिश कर रही है. क्या ओबीसी समाज के कद्दावर नेता सिद्धारमैया को सीएम पद से हटाने से कांग्रेस को नुकसान हो सकता है? नाम जाहिर ना करने के आधार पर एक कांग्रेस नेता ने कहा कि सिद्धारमैया की जाति कुर्बा में इसका नकारात्मक असर जरूर पड़ सकता है, जो राज्य की आबादी का करीब 6-7% हिस्सा है. लेकिन पार्टी सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र को अहम जिम्मेदारी देकर इस नुकसान की भरपाई कर सकती है.
बैलेंस करने के लिए कांग्रेस ने बनाया प्लान
उन्होंने कहा कि बीजेपी के पास कोई कुर्बा चेहरा नहीं है. इसके अलावा दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय भी परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ बने रहेंगे. इसकी बड़ी वजह यही है कि कांग्रेस में इन समुदायों के कई बड़े नेता हैं. माना जा रहा है कि डीके सरकार में इन समुदायों को बड़ा प्रतिनिधित्व मिल सकता है. यानी कांग्रेस को भरोसा है कि उसके वोट बैंक में सेंध लगने की संभावना नहीं है. दूसरी तरफ डीके शिवकुमार के अपने वोक्कलिगा समुदाय का बड़ा वर्ग जेडीएस से कांग्रेस का रुख कर सकता है.
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डीके को धैर्य का मिला इनाम
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई का भी यही मानना है कि यह बदलाव सकारात्मक है. उन्होंने कहा कि 78 साल के सीएम सिद्धारमैया की तुलना में 64 साल के डीके शिवकुमार बेहतर विकल्प हैं. सिद्धारमैया के उलट डीके शिवकुमार की छवि धार्मिक व्यक्ति की है. सियासी तौर पर उनके व्यक्तित्व का असर बीजेपी-जेडीएस के वोटरों पर भी होगा. साथ ही डीके शिवकुमार के उदाहरण से देश भर के कांग्रेस नेताओं में संदेश जाएगा कि पार्टी के लिए धैर्य से काम करने का फल मिलता है. इससे उनका राहुल गांधी के प्रति भरोसा मजबूत होगा.
कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर इन सारे सकारात्मक आंकलनों की सबसे बड़ी वजह है सिद्धारमैया का बड़ी सहजता से सीएम कुर्सी छोड़ देना. यदि वो अड़ते तो कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती. हालांकि सिद्धारमैया ने राज्यसभा का ऑफर ठुकरा कर साफ किया है कि वो राज्य की राजनीति में बने रहेंगे. जाहिर है डीके शिवकुमार को उनके साथ तालमेल बना कर चलना होगा. वरना वह सीएम रहते हुए भी अलग-थलग पड़ सकते हैं. वैसे भी उनके सीएम बनने से कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं का सीएम बनने का सपना भी अधूरा रह गया है.
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