दिल्ली के सियासी गलियारों से लेकर लखनऊ की जमीनी राजनीति तक इन दिनों विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' के भीतर एक दिलचस्प तस्वीर उभर रही है. उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों से ठीक पहले, गठबंधन के दो सबसे बड़े साथियों — कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच कार्यक्रमों की प्लानिंग और समय पर सूचना देने को लेकर तालमेल की जो कमी है, वह अब इशारों-इशारों में सतह पर आने लगी है. आज दिल्ली में विपक्षी दलों की बैठक में शामिल होने जा रहे समाजवादी पार्टी के सांसद राजीव राय का एक बयान इस तालमेल की कहानी खुद बयां कर रहा है. बैठक में जाने से पहले राजीव राय ने चुटकी लेते हुए कहा कि 'आज समय पर मैसेज मिल गया, इसलिए आज बैठक में जा रहे हैं.' यह बयान अनायास नहीं है, बल्कि इसके पीछे पिछले तीन दिनों की वह कड़ियां हैं जो बहुत कुछ साफ कर देती हैं.
पहला दिन: सड़कों पर तो दिखा साथ, लेकिन अंदरूनी खींचतान शुरू
इस कम्यूनिकेशन गैप की सुगबुगाहट पहले दिन से ही महसूस होने लगी थी. चुनाव आयोग और ईवीएम के मुद्दे पर जब राहुल गांधी की अगुवाई में विपक्षी सांसदों ने संसद से मार्च निकाला, तो समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर सड़कों पर उतरे. बैरिकेडिंग लांघने से लेकर हिरासत में जाने तक दोनों दलों के कार्यकर्ता और नेता साथ दिखे. लेकिन इस बाहरी एकजुटता के पीछे कार्यक्रमों की पहले से कोई तय और संयुक्त रूपरेखा न होना अंदरूनी तौर पर खटकने लगा था.कई हलकों से ये खबरें आईं कि कांग्रेस के इस प्रदर्शन की सूचना बिल्कुल अंतिम मौके पर समाजवादी पार्टी को दी गई थी.
दूसरा दिन: लंच बैठक से पूरी तरह गायब रही सपा
तालमेल की यह खटास दूसरे दिन और साफ नजर आई. विपक्षी दलों के नेताओं के लिए आयोजित की गई लंच बैठक और महत्वपूर्ण रणनीतिक चर्चा से समाजवादी पार्टी के सांसद और बड़े नेता पूरी तरह गायब रहे. दिल्ली में चल रहे इस बड़े जमावड़े के बीच सपा की इस गैरहाजिरी ने राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए. हालांकि, पार्टी की तरफ से दलील दी गई कि उत्तर प्रदेश में चुनाव नजदीक होने के कारण उनके सांसद और नेता अपने-अपने क्षेत्रों में व्यस्त हैं और कुछ निजी व्यस्तताएं भी थीं. लेकिन लंच से यह दूरी बिना कहे बहुत कुछ कह गई.
तीसरा दिन: राजीव राय ने कहा- हमें अपना'किला' बचाना है
आज तीसरे दिन राजीव राय का यह कहना कि 'आज मैसेज समय पर मिला है', गठबंधन के भीतर की अंदरूनी हकीकत को सामने रखता है. जब उनसे पूछा गया कि क्या अखिलेश यादव भी इन प्रदर्शनों में लगातार बने रहेंगे, तो उन्होंने सपा की प्राथमिकताओं को बहुत ही व्यावहारिक तरीके से सामने रख दिया. उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी के राज्य पश्चिम बंगाल में चुनाव हो चुके हैं, लेकिन हमारे यहां उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं और यह बहुत बड़ी लड़ाई है. उन्होंने साफ किया कि सपा के लिए उत्तर प्रदेश के इस किले को बचाना पहली प्राथमिकता है. उनका इशारा साफ था कि दिल्ली के प्रदर्शनों में जरूरत से ज्यादा उलझकर वे अपने राज्य की सियासी जमीन पर ध्यान भटकाना नहीं चाहते. सपा सांसद का यह रुख दिखाता है कि लोकसभा चुनाव की साझा जीत के बाद अब जब बात यूपी की अपनी जमीन की आई है, तो दोनों दल अपनी-अपनी प्राथमिकताओं को लेकर बेहद सजग हैं. बिना किसी सीधे टकराव के, बयानों और फैसलों का यह सिलसिला यह बताने के लिए काफी है कि चुनाव से ठीक पहले गठबंधन के इन दो बड़े चेहरों के बीच तालमेल और संवाद का रास्ता अभी पूरी तरह सुगम नहीं हो पाया है.
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