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चंबल में अवैध उत्खनन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: 'जब नाक के नीचे माफिया राज है, तो राज्य सरकार है ही क्यों?'

चंबल अभ्यारण में अवैध रेत खनन और मध्य प्रदेश के मुरैना में फोरेस्ट गार्ड की मौत के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने राज्य सरकारों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए अवैध खनन को राज्य की नाक के नीचे होने वाला बताया और इसे बेहद दुखद स्थिति करार दिया.

चंबल में अवैध उत्खनन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: 'जब नाक के नीचे माफिया राज है, तो राज्य सरकार है ही क्यों?'
  • सुप्रीम कोर्ट ने चंबल अभ्यारण में अवैध रेत खनन से जुड़े मामले पर राज्य सरकारों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए
  • मुरैना में रेत माफिया के ट्रैक्टर की चपेट में आने से एक फोरेस्ट गार्ड की मौत हुई, जिस पर राज्य सरकार को फटकारा
  • सुप्रीम कोर्ट ने अवैध खनन में इस्तेमाल मशीनों को सेक्युलर बताते हुए कहा कि वे जाति देखकर नहीं मारतीं

चंबल अभ्यारण में अवैध रेत खनन से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में रेत खनन माफिया द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे ट्रैक्टर की चपेट में आने से एक फोरेस्ट गार्ड की मौत के मामले को लेकर कोर्ट ने राज्य अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है. कोर्ट ने इस पूरे हालात को बेहद चिंताजनक बताते हुए राज्य सरकारों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए.

“अगर राज्य रक्षा नहीं कर सकता, तो उसका होना ही क्या है?”

जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर राज्य की मशीनरी अपने अधिकारियों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने में नाकाम है, तो उसके अस्तित्व का मतलब ही क्या है. कोर्ट ने कहा कि यह सब राज्य की नाक के नीचे हो रहा है. बेंच ने हलफनामे का हवाला देते हुए कहा कि उसमें यह लिखा है कि अधिकारियों के पास हथियार नहीं हैं। इस पर सवाल करते हुए कोर्ट ने कहा, “आखिर राज्य सरकार है ही क्यों? यह बहुत अजीब बात है.”

“मशीनें सेक्युलर हैं, जाति देखकर नहीं मारतीं”

कोर्ट ने अवैध खनन में इस्तेमाल हो रही मशीनों को लेकर सख्त टिप्पणी की. बेंच ने कहा कि ये खुदाई करने वाली मशीनें और बुलडोजर, जिनका इस्तेमाल माइनिंग माफिया करता है, सेक्युलर हैं. कोर्ट ने कहा, “ये उस व्यक्ति की जाति नहीं देखतीं जिसे वे मार रही हैं.” बेंच ने कहा कि इस स्थिति में हमें यहीं रुक जाना चाहिए, यह बहुत दुखद स्थिति है. कोर्ट ने कहा कि या तो राज्य सरकारें पूरी तरह से नाकाम रही हैं, या फिर कहा जाए कि वे मिलीभगत कर रही हैं.

हथियार नहीं होने की बात राज्य सरकार ने मानी

गौरतलब है कि पिछले हफ्ते मध्य प्रदेश सरकार ने कोर्ट के सामने स्वीकार किया था कि चंबल इलाके में काम कर रहे गैर-कानूनी रेत खनन माफियाओं का सामना करने के लिए उसके अधिकारियों के पास पर्याप्त हथियार नहीं हैं. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में गैर-कानूनी रेत खनन पर स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई कर रहा है.

अटेर–फतेहपुर पुल के पिलरों के नीचे अवैध खनन

कोर्ट को यह भी बताया गया कि अटेर–फतेहपुर पुल के 34 पिलरों में से 8 पिलरों के पास अवैध रेत खनन हो रहा है. इस पुल से रोज़ाना 5,000 से ज्यादा लोग गुजरते हैं. एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट निखिल गोयल ने बेंच को बताया कि पुल के पिलरों के नीचे से बड़ी मात्रा में रेत निकाली जा रही है, जिससे यात्रियों की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है. उन्होंने कहा कि पुल के 8 पिलर प्रभावित हैं और पिलरों के नीचे से 25 से 50 फीट तक रेत निकाली जा चुकी है.

“तस्वीरें देखी हैं, वे चौंकाने वाली हैं”

कोर्ट ने कहा कि उसने इस मामले से जुड़ी तस्वीरें देखी हैं, और वे बिल्कुल चौंकाने वाली हैं. पिछली सुनवाई में मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कोर्ट को बताया कि फोरेस्ट गार्ड की मौत की जांच चल रही है. उन्होंने यह भी जानकारी दी कि अटेर–फतेहपुर पुल के नीचे हो रही अवैध रेत खनन की जांच के लिए एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी गठित की गई है, जो जल्द ही अपनी रिपोर्ट सौंपेगी.

“रिपोर्ट पुल गिरने और लोगों की मौत के बाद आएगी?”

इस पर कोर्ट ने सख्त सवाल करते हुए पूछा कि क्या यह रिपोर्ट पुल गिरने और लोगों के मरने के बाद आएगी? राजू ने भरोसा दिलाया कि यह रिपोर्ट एक हफ्ते के भीतर दाखिल कर दी जाएगी. कोर्ट ने पूछा कि इतने बड़े पैमाने पर गैर-कानूनी खनन बिना किसी रोक-टोक के कैसे चलता रहा. बेंच ने सवाल किया, “आपने ऐसा क्यों होने दिया? क्या राज्य के अधिकारी अंधे हैं?”

गैर-कानूनी माइनिंग रोकने के लिए तकनीकी उपायों का सुझाव

लगातार चल रही अवैध माइनिंग गतिविधियों पर चिंता जताते हुए कोर्ट ने कहा कि रेत खनन में शामिल गाड़ियों की मूवमेंट पर नज़र रखने के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है. कोर्ट ने सुझाव दिया कि प्रभावित इलाकों में ऊंचे खंभों पर हाई-रिज़ॉल्यूशन कैमरे लगाए जाएं ताकि रेत ले जा रही गाड़ियों की तस्वीरें ली जा सकें. बेंच ने यह भी प्रस्ताव दिया कि पहचाने गए जिलों में चलने वाले सभी ट्रैक्टरों, अर्थमूवर्स और लोडर्स में GPS ट्रैकर्स लगाए जाएं, ताकि उनकी गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सके. कोर्ट ने कहा कि जो भी गाड़ी इस इलाके से गुज़रे, उसमें ट्रैकर होना चाहिए.

17 अप्रैल को होगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) और राज्य अधिकारियों से इन सभी उपायों को लागू करने के लिए व्यवहारिक समाधान खोजने को कहा है. मामले में अगली सुनवाई 17 अप्रैल को तय की गई है.

लेखक के बारे में
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आशीष भार्गव
Senior Editor – Legal News
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