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This Article is From Nov 26, 2025

चीन को मिलेगा जवाब, रेयर अर्थ मेटल्‍स के लिए भारत ने बनाया बड़ा प्लान; 7,280 करोड़ रुपये करेगा खर्च

चीन ने 4 अप्रैल को फरमान जारी कर कहा था कि कोई भी कंपनी सरकार की परमिशन के बिना किसी भी विदेशी ग्राहक को दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों की बिक्री नहीं करेगी. ड्रैगन के इस फैसले से दुनियाभर की ऑटो इंडस्ट्री सदमे में आ गई थीं. लेकिन भारत ने अब इसका तोड़ निकाल लिया है.

चीन को मिलेगा जवाब, रेयर अर्थ मेटल्‍स के लिए भारत ने बनाया बड़ा प्लान; 7,280 करोड़ रुपये करेगा खर्च
भारत में बढ़ेगा रेयर अर्थ मैग्नेट का उत्पादन.
  • केंद्र ने रेयर अर्थ मैग्नेट के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने हेतु 7,280 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है.
  • इस योजना के तहत प्रति वर्ष छह हजार टन की उत्पादन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है.
  • चीन द्वारा दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों के निर्यात पर रोक लगाए जाने के बाद भारत ने उत्पादन बढ़ाने की रणनीति अपनाई है.
नई दिल्ली:

रेयर अर्थ मेटल्‍स के निर्यात पर रोक लगाकर चीन को लगा था कि वह दुनिया को अपनी पावर के आगे झुकने को मजबूर कर देगा. उसको शायद ये नहीं पता था कि भारत उसे मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारी कर चुका है. भारत चीनी की दादागिरी का मुंहतोड़ जवाब रेयर अर्थ मेटल्स का उत्पादन बढ़ाकर देने जा रहा है. जब चीन ने रेयर अर्थ मेटल्‍स का निर्यात रोका था तो पूरी दुनिया की ऑटो इंडस्ट्री सकते में आ गई थी. इसका असर भारत की ऑटो इंडस्ट्री पर भी देखा गया. लेकिन अब इसका तोड़ मोदी सरकार ने निकाल लिया है. अब इन रेयर अर्थ मैग्नेट का उत्पादन सरकार बढ़ाने जा रही है. इसके लिए 7,280 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दे दी गई है. 

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क्या होते हैं रेयर अर्थ मेटल्‍स?

  • रेयर अर्थ मेटल्‍स वे 17 रासायनिक तत्व होते हैं, जो लैंथेनाइड्स समूह में आते हैं और बहुत ही दुर्लभ होते हैं.
  • दिखने में ये चांदी की तरह चमकदार और हल्के होते हैं.
  • इनमें समेरियम, नियोडाइमियम, यूरोपियम, लैंथेनम जैसे तत्व शामिल हैं.
  • इनकी खास भौतिक और चुंबकीय प्रॉपर्टीज की वजह से ये हाई-टेक तकनीकों में जरूरी हो गए हैं.
  • मोबाइल फोन, विंड टर्बाइन, MRI मशीन, लड़ाकू विमान, इलेक्ट्रिक गाड़ियां- इन सभी में इनका इस्तेमाल होता है.

भारत में बढ़ेगा रेयर अर्थ मैग्नेट का उत्पादन

केंद्र सरकार ने बुधवार को दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए 7,280 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी. पीएम मोदी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल बैठक में ‘ठोस दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुंबकों के विनिर्माण की प्रोत्साहन योजना' को स्वीकृति प्रदान की गई. सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि योजना का लक्ष्य 6,000 टन प्रति वर्ष की उत्पादन क्षमता तैयार करना है.

रेयर अर्थ मेटल्‍स पर क्यों है चीन का दबदबा?

  • यूएस जियोलॉजिकल सर्वे (जनवरी 2025) के मुताबिक, दुनिया में 9 करोड़ टन REEs हैं.
  • इनमें से 4.4 करोड़ टन चीन के पास हैं.
  • इसके बाद ब्राजील (2.1 करोड़ टन), भारत (69 लाख टन), ऑस्ट्रेलिया, रूस, वियतनाम और अमेरिका जैसे देश आते हैं.
  • चीन इनका सिर्फ खनन ही नहीं करता, बल्कि प्रोसेसिंग तकनीक में भी सबसे आगे है.
  • इसलिए रेयर अर्थ मेटल्‍स की वैश्विक सप्लाई चेन पर उसका दबदबा है.
  • वह इन मिनरल्स के जरिए राजनीतिक और आर्थिक दबाव बनाता है.

कहां होता है रेयर अर्थ मेटल्‍स का इस्तेमाल

दुर्लभ पृथ्वी चुंबक का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहन, अंतरिक्ष एवं वैमानिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा उपकरण और रक्षा उद्योग जैसे उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में किया जाता है. इस प्रोत्साहन योजना के तहत कुल उत्पादन क्षमता को वैश्विक प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से पांच लाभार्थियों को आवंटित किया जाएगा. प्रत्येक लाभार्थी को अधिकतम 1,200 टन प्रति वर्ष की क्षमता मिलेगी. इस योजना की अवधि सात वर्ष की होगी, इसमें दो साल का समय दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुंबक (आरईपीएम) के संयंत्र स्थापित करने और अगले पांच वर्ष बिक्री पर प्रोत्साहन देने के लिए निर्धारित किए गए हैं.

चीन ने लगाई थी रेयर अर्थ मैग्नेट के निर्यात पर रोक

बता दें कि चीन ने दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों का निर्यात रोक दिया था, जिसकी वजह से दुनियाभर की ऑटो इंडस्ट्री सदमे में थीं. इसका बड़ा असर भारत की ऑटो इंडस्ट्री और खासकर ईवी सेक्टर पर देखाई दे रहा था. ऐसे में मोदी ने सरकार इन दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों के देश में उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया था.

 रेयर अर्थ मेटल्‍स पर भारत की क्या स्थिति है और रणनीति?

भारत के पास रेयर अर्थ मेटल्‍स का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा भंडार है, लेकिन उत्पादन में हम बहुत पीछे हैं. 2024 में भारत ने सिर्फ 2900 टन ही रेयर अर्थ मेटल्‍स का उत्पादन किया था, जबकि चीन ने 2.7 लाख टन का उत्पादन किया था. इस अंतर को देखते हुए भारत सरकार ने 'नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन' शुरू किया. इसके तहत 2031 तक 1200 जगहों पर सर्वे कर 30 प्रमुख खनिज भंडारों की पहचान की जाएगी. इसके अलावा "सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन क्रिटिकल मिनरल्स" बनाने की योजना भी है. अब भारत इन मेटल्स का उत्पादन बढ़ाने जा रहा है.

चीन की पाबंदी का हुआ क्या असर?

चीन ने 4 अप्रैल को फरमान जारी कर कहा था कि कोई भी कंपनी सरकार की परमिशन के बिना किसी भी विदेशी ग्राहक को दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों की बिक्री नहीं करेगी. ड्रैगन के इस फैसले से दुनियाभर की ऑटो इंडस्ट्री सदमे में आ गई थीं. भारत में भी इलेक्ट्रिक व्हीकल और डिफेंस उपकरणों की सप्लाई चेन बाधित हुई है. इन मैग्नेट्स की वैश्विक सप्लाई का 90% हिस्सा चीन के हाथ में है, जिससे वह किसी भी देश की टेक्नोलॉजी ग्रोथ को प्रभावित कर सकता है.लेकिन भारत ने अब इसका तोड़ निकाल लिया है.

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