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नक्‍सलवाद के सफाये की मुहिम, इस साल 113 नक्सलवादी हुए ढेर, नक्सलबाड़ी से सुलगी थी माओवाद की चिंगारी

25 मई 1967 को पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग ज़िले के नक्सलबाड़ी गांव की एक घटना से नक्सलवाद की चिंगारी भड़की थी. नक्सलवादी आंदोलन के बढ़ने के पीछे एक बड़ी वजह देश के एक बड़े इलाके में किसानों, भूमिहीन मज़दूरों औऱ आदिवासियों की ये तकलीफ़ रही कि उनके संसाधनों पर दबंगों का कब्ज़ा रहा है.

नक्सलवाद के खिलाफ केंद्र सरकार का अभियान पिछले साल से काफी तेज हो चुका है

नई दिल्‍ली:

आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसे कई हिंसक आंदोलन रहे जो हर सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर खड़े होते रहे. लेकिन इनमें माओवादी आंदोलन जिसे नक्सलवादी आंदोलन भी कहा जाता है, उसके तहत हुई हिंसा अब तक की सबसे लंबी और सबसे घातक हिंसा साबित हुई है. गुरिल्ला युद्ध में माहिर हथियारबंद माओवादियों से निपटना हर सरकार के लिए बड़ी चुनौती बना रहा, क्योंकि माओवादी किसी एक राज्य नहीं, बल्कि अपने चरम दौर में आंध्रप्रदेश के तिरुपति से लेकर नेपाल के पशुपति तक कम से कम सात राज्यों के क़रीब 200 ज़िलों में पूरी तरह सक्रिय रहे. लेकिन इस चुनौती से निपटने की सरकार की तमाम कोशिशें अब रंग ला रही हैं. सरकार का दावा है कि अब ये 38 ज़िलों तक ही सिमट गया है. नक्सलवादियों से निपटने की मुहिम के तहत गुरुवार को दो बड़ी मुठभेड़ों को अंजाम दिया गया.

30 माओवादी मारे गए

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ ऑपरेशन के तहत बीजापुर और कांकेर में हुईं इन दो अलग-अलग मुठभेड़ों में कम से कम 30 माओवादी मारे गए. पहली मुठभेड़ दक्षिण छत्तीसगढ़ की बस्तर डिविजन के जंगलों में बीजापुर और दंतेवाड़ा ज़िलों की सीमा पर हुईं, जहां सुरक्षाबलों की संयुक्त टीम ने नक्सलवादियों के खिलाफ एक बड़ा अभियान छेड़ा हुआ है. बस्तर पुलिस के मुताबिक, ख़ास ख़ुफ़िया जानकारी के आधार पर सुरक्षाबलों ने ये ऑपरेशन शुरू किया. इसके तहत गुरुवार सुबह सात बजे बीजापुर और दंतेवाड़ा ज़िलों की सीमा पर सुरक्षाबलों ने कम से कम 26 नक्सलवादियों को ढेर कर दिया. मुठभेड़ के दौरान बीजापुर से ताल्लुक रखने वाले एक डिस्ट्रिक रिजर्व गार्ड यानी DRG के जवान ने भी अपनी जान गंवाई. इस ऑपरेशन के दौरान भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक भी बरामद किए गए.
इसी दौरान छत्तीसगढ़ की उत्तर बस्तर डिविजन में कांकेर ज़िले में एक दूसरी मुठभेड़ हुई, जिसमें बीएसएफ़ और डीआरजी की संयुक्त टीम ने नारायणपुर के अबूझमाड़ के जंगलों में एक गांव के पास चार नक्सलवादियों को मार गिराया. इन मुठभेड़ों के दौरान एके 47 राइफ़लों समेत कई ऑटोमैटिक और सेमी ऑटोमैटिक हथियार बरामद किए गए हैं.

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‘नक्सलमुक्त भारत अभियान'

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलवादियों के खिलाफ जारी इस ऑपरेशन पर प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हुए लिखा-‘नक्सलमुक्त भारत अभियान' की दिशा में आज हमारे जवानों ने एक और बड़ी सफलता हासिल की है. छत्तीसगढ़ के बीजापुर और कांकेर में हमारे सुरक्षाबलों के 2 अलग-अलग ऑपरेशन्स में 22 नक्सली मारे गए. जब गृह मंत्री ने ये पोस्ट की, तब तक 22 नक्सलियों के ही मारे जाने की पुष्टि हुई थी. इसी पोस्ट में गृह मंत्री अमित शाह ने आगे लिखा कि मोदी सरकार नक्सलियों के विरुद्ध काफी सख़्ती के साथ आगे बढ़ रही है और समर्पण से लेकर समावेशन की तमाम सुविधाओं के बावजूद जो नक्सली आत्मसमर्पण नहीं कर रहे, उनके खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रही है. अगले साल 31 मार्च से पहले देश नक्सलमुक्त होने वाला है.

नक्सलवाद एक ऐसी समस्या है जिसे लेकर पार्टी लाइन से ऊपर लगातार सख़्ती बरती जाती रही है. छत्तीसगढ़ की पिछली कांग्रेस सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे टीएस सिंह देव ने भी कहा कि जो नक्सली हथियार छोड़ने को तैयार नहीं हैं, वो राज्य में हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं.

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 इस साल की दूसरी सबसे बड़ी मुठभेड़

नक्सलवादियों के खिलाफ इस साल अब तक हुई मुठभेड़ों में 113 नक्सलवादी मारे गए हैं. इनमें से 97 को अकेले बस्तर डिविजन में मार गिराया गया. बस्तर डिविजन में बीजापुर और कांकेर समेत सात ज़िले आते हैं. गुरुवार को हुई मुठभेड़ इस साल की दूसरी सबसे बड़ी मुठभेड़ हैं. करीब डेढ़ महीने पहले 9 फरवरी को भी ऐसे ही एक बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया गया था, जिसमें बीजापुर के इंद्रावती नेशनल पार्क के घने जंगलों में 31 नक्सलवादियों को मार गिराया गया था. उस मुठभेड़ में सुरक्षाबलों के दो जवान शहीद हो गए थे. इंद्रावती नेशनल पार्क में नक्सलवादियों के खिलाफ इस साल ये दूसरी मुठभेड़ थी. करीब 2800 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैला इंद्रावती नेशनल पार्क एक टाइगर रिज़र्व है, जिसके कुछ इलाकों में नक्सलवादियों ने अपनी पैठ बनाई हुई है.

इसी साल 16 जनवरी को भी छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षाबलों के एक साझा ऑपरेशन में कई नक्सली कमांडरों समेत 18 नक्सली मारे गए थे. बीजापुर के पामेड़-बासागुड़ा-उसूर एक्सिस के घने जंगलों में हुई इस मुठभेड में मरने वालों में दामोदर नाम का एक बड़ा नक्सली नेता भी मारा गया था, जो सीपीआई- माओवादी के तेलंगाना काडर का सेक्रेटरी था. नक्सलवादी दामोदर की मौत नक्सलियों के लिए के बड़ा झटका थी और वो हथियारबंद हमलों में काफ़ी माहिर था. उसके सिर पर 25 लाख रुपये का इनाम था और महाराष्ट्र, तेलंगाना, मध्यप्रदेश और ओडिशा की सरकारों को अलग-अलग मामलों में उसकी तलाश थी. उसी के एक गुट ने 6 जनवरी को बीजापुर में सुरक्षाबलों के एक काफिले पर घात लगाकर हमला किया था, जिसमें सुरक्षाबलों के आठ जवान और एक आम नागरिक ने जान गंवाई थी.

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साल-दर-साल कितने नक्‍सली ढेर  

नक्सलवाद के खिलाफ केंद्र और राज्य सरकार का अभियान पिछले साल से काफी तेज हो चुका है. इसीका नतीजा है कि 2009 के बाद सबसे ज़्यादा 219 नक्सलवादियों को पिछले साल 2024 में मार गिराया गया था. उससे पहले के सालों ये तादाद इतनी नहीं थी. 2023 में 22 नक्सलवादी और 2022 में 30 नक्सली सुरक्षा बलों के ऑपरेशनों में मारे गए थे. उससे पहले 2016 और 2018 में सौ से ज़्यादा नक्सलवादी मारे गए थे. 2016 में 134 नक्सली मारे गए थे. अगर नक्सलियों के हमलों को देखें, तो वो साल दर साल लगभग बराबर बने रहे. थोड़े कम तो थोड़े ज़्यादा. जिस साल नक्सली हमले बढ़े उस साल उनके मारे जाने की तादाद भी बढ़ी. बीते साल नक्सलियों के हमलों के मुक़ाबले सुरक्षाबलों द्वारा उनके खिलाफ ऑपरेशन में काफी ज़्यादा तेजी आई, जिसका नतीजा 200 से ज़्यादा नक्सलवादियों के मारे जाने की शक्ल में सामने आया.

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मार्च 2026 तक नक्सलवाद का ख़ात्मा

नक्सलवादियों के खिलाफ केंद्र सरकार ने अपने अभियान में जो लक्ष्य तय किया है, उसके तहत मार्च 2026 तक नक्सलवाद का पूरी तरह ख़ात्मा करने का लक्ष्य है. इस ऑपरेशन के तहत अब तक एक हज़ार से ज़्यादा नक्सलियों को गिरफ़्तार किया जा चुका है और क़रीब 950 नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं. नक्सलियों के ख़िलाफ ऑपरेशन में सीआरपीएफ, आईटीबीपी, बीएसएफ, कोबरा यानी 'सख्‍त कार्रवाई के लिए कमांडो बटालियन' (Commando Battalion for Resolute Action), स्थानीय पुलिस बल और डीआरजी के जवानों का साझा ऑपरेशन चल रहा है.

पिछले साल 4 दिसंबर को गृह मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, 2018 से 2024 के बीच दस राज्यों के 60 ज़िलों को माओवादी अतिवाद से मुक्त करा लिया गया है. और अब सिर्फ़ 38 ज़िलों में ही माओवादी सीमित रह गए हैं. यानी नक्सलवादियों की पैठ वाले इलाके काफ़ी सिकुड़ गए हैं और सरकार की कोशिश है कि 31 मार्च 2026 तक देश को पूरी तरह नक्सल मुक्त करा लिया जाए.

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इसके लिए कई मोर्चों पर एक साथ काम चल रहा है. सुरक्षा के लिहाज़ से नक्सल हिंसा ग्रस्त इलाकों में केंद्रीय पुलिस बलों और राज्यों की पुलिस को आधुनिक हथियार, ट्रेनिंग और फंड मुहैया कराए गए हैं. इसके अलावा नक्सलग्रस्त इलाकों में सड़कों का विस्तार करने और टेलीकॉम कनेक्टिविटी बढ़ाने पर विशेष तौर पर ज़ोर दिया गया है. साथ ही इन इलाकों के लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए उन्हें वित्तीय मदद देने और हुनरमंद बनाने से जुड़ी योजनाओं पर काम चल रहा है. 
इन तमाम योजनाओं के लिए 2019-20 से लेकर 2023-24 तक 4350 करोड़ रुपए मुहैया कराए गए हैं.

  • माओवादी हिंसा प्रभावित इलाकों में 14,529 किलोमीटर सड़कें बनाई गई हैं.
  • टेलीकॉम कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए 6,524 टावर बनाए गए हैं.
  • 5731 पोस्ट ऑफ़िस खोले गए हैं. 
  • 30 सबसे प्रभावित ज़िलों में बैंकों की 1007 शाखाएं और 937 एटीएम खोले गए हैं. 
  • नक्सल हिंसा से प्रभावित इलाकों में युवाओं का हुनर सुधारने के लिए 46 आईटीआई, 49 कौशल विकास केंद्र खोले गए हैं.
  • शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए इन ज़िलों में 178 एकलव्य मॉडल रेज़िडेंशियल स्कूल खोले गए हैं.

गृह मंत्रालय द्वारा 4 दिसंबर को दी गई इस जानकारी के मुताबिक, 2010 के मुक़ाबले 2023 में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 73% की कमी आई है, जबकि नक्सली हिंसा में जान गंवाने वाले सुरक्षा बलों और आम नागरिकों की संख्या में 86% की कमी आई है. 2010 में जहां 1005 सुरक्षा बल और आम नागरिक नक्सली हिंसा में मारे गए थे वहीं 2023 में ये संख्या घटकर 138 रह गई.

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नक्सलबाड़ी गांव से सुलगी थी नक्‍सलवाद की चिंगारी 

सरकार की कोशिश है कि आम नागरिकों के लिए शुरू किए गए सिविक एक्‍शन प्‍लान (Civic Action Programmes) के तहत नक्सल ग्रस्त इलाकों में स्थानीय लोगों की दशा को सुधारा जाए और युवाओं को नक्सलवादियों के प्रभाव से मुक्त कराया जाए. दरअसल, नक्सलवादी आंदोलन के बढ़ने के पीछे एक बड़ी वजह देश के एक बड़े इलाके में किसानों, भूमिहीन मज़दूरों औऱ आदिवासियों की ये तकलीफ़ रही कि उनके संसाधनों पर दबंगों का कब्ज़ा रहा है. संक्षेप में बात करें तो नक्सलवादी या माओवादी आंदोलन ने भारत में वामपंथी आंदोलन में उभरे तमाम मतभेदों के बीच जन्म लिया. वैसे तो इसकी जड़ें 1946 से 1951 तक चले तेलंगाना किसान विद्रोह तक जाती हैं, लेकिन इसने सही मायनों में जड़ पकड़ी 1967 में. 25 मई 1967 को पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग ज़िले के नक्सलबाड़ी गांव की एक घटना से नक्सलवाद की चिंगारी भड़क गई. सदियों से सताए जा रहे किसान, मज़ूदर पहले ही महाजनों और ज़मींदारों के अत्याचार से परेशान थे. ऐसे में एक भूमि मालिक ने जब एक किसान को बुरी तरह पीटा और उसका सारा सामान छीन लिया, तो किसानों का गुस्सा भड़क गया. लाठियों से लैस किसानों, भूमिहीन मज़दूरों ने उस ज़मींदार और कई अन्य लोगों पर हमला कर दिया. इसके साथ ही किसानों, भूमिहीनों और आदिवासियों के हक़ों की मांग को लेकर इस आंदोलन ने तेज़ी पकड़ ली.

...और नक्‍सलवाद की चिंगारी बन गई ज्‍वाला

नक्सलबाड़ी गांव से इस आंदोलन को नक्सलवाद नाम मिल गया, जिसे बाद में माओवाद के नाम से भी जाना गया. नक्सलवादी आंदोलन के अगुवा थे, चारु मजूमदार और उनके क़रीबी साथी कनु सान्याल और जंगल संथाल. हालांकि, नक्सलबाड़ी के विद्रोह को पश्चिम बंगाल की तत्कालीन यूनाइटेड फ्रंट सरकार ने कुचल दिया, जिसे वामपंथी पार्टी सीपीएम का समर्थन भी हासिल था. इसके बावजूद इस अंदोलन ने जल्द ही एक बड़े इलाके में काफ़ी समर्थन जुटा लिया. यही नहीं बड़ी चिंता की बात ये भी रही कि पड़ोसी देश चीन का भी इस विद्रोह को समर्थन मिल गया. तब चीन के मुख पत्र पीपुल्‍स डेली (People's Daily) ने इस विद्रोह को Spring Thunder बताया था और अपना पूरा एक एडिटोरियल पेज नक्सलबाड़ी की घटना की अहमियत बताने में लगा दिया था. इसके बाद चारू मजूमदार और कनु सान्याल ने कम्युनिस्ट चीन के संस्थापक माओ त्से तुंग से प्रेरणा लेकर राजनीतिक शक्ति हासिल करने के लिए उनकी रणनीति को अपनाने पर काम किया. लेकिन ये आंदोलन हिंसक होता चला गया. 16 जुलाई 1972 को चारू मजूमदार की गिरफ़्तारी और बाद में पुलिस हिरासत में मौत के बाद कई जानकारों ने नक्सली आंदोलन के ख़त्म होने की भविष्यवाणी भी की. लेकिन वो सही नहीं थे. एक दशक के भीतर नक्सली आंदोलन देश के दूसरे इलाकों में अपनी पैठ बनाने लगा. इसके लिए भूमिहीन मज़दूरों, किसानों और आदिवासियों के बीच सरकारों और ज़मींदारों को लेकर नाराज़गी का इस्तेमाल किया गया. 

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कैसे फैलता गया नक्‍सलवाद 

अस्सी के दशक की शुरुआत में हथियारबंद विद्रोह तब फिर तेज़ हुआ, जब आंध्रप्रदेश के कोंडापल्ली सीतारमैया ने पीपुल्‍स वार ग्रुप (People's War Group) बनाया, जिसका मक़सद किसानों और भूमिहीन मज़दूरों की ख़ातिर हथियारबंद लड़ाई लड़ना था. पीडब्‍ल्‍यूजी के हथियारबंद लड़ाकों ने इसके बाद बड़े ज़मीन मालिकों पर कई हमले किए, हत्याएं और बमबारी की. निशाना बनने वालों में आंध्रप्रदेश के कई नेता भी शामिल रहे. नब्बे के दशक में आंध्रप्रदेश की पुलिस ने PWG के ख़िलाफ़ निर्णायक लड़ाई में उसका लगभग ख़ात्मा कर दिया. तब फिर कई लोगों को लगा कि नक्सली आंदोलन ख़त्म हो चुका है. लेकिन ऐसा नहीं था. सन 2000 के शुरुआती सालों में नक्सलवाद मध्य और पूर्वी भारत के कई राज्यों में अपनी पैठ बना चुका था. ख़ासतौर पर पहाड़ी इलाके दंडकारण्य, मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र के जंगलों में मौजूद दूर दराज़ गांवों में नक्सलवाद ने अपनी पैठ बना ली. नक्सलवादियों ने इन गांवों के मुख्य धारा से कटे होने का फ़ायदा उठाया. 2004 में सीपीआई (माओवादी-लेनिवादी), माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ़ इंडिया यानी (MCCI) और 40 अन्य हथियारबंद संगठनों का सीपीआई (माओवादी) में विलय हुआ. इससे नक्सलवादियों को नई ताक़त मिल गई. इसके बाद ये आंदोलन देश के एक बड़े इलाके में फैल गया. अपने चरम के दौरान ये 200 से ज़्यादा ज़िलों में फैल चुका था. अप्रैल 2006 में इसीलिए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवादी आंदोलन को देश के सामने आंतरिक सुरक्षा के लिए खड़ी हुई अब तक की सबसे बड़ी चुनौती बताया था. हालात ये हो चुके थे कि सीपीआई माओवादी की हथियारबंद शाखा People's Liberation Guerrilla Army (PGLA) के पास एक समय 20 हज़ार से ज़्यादा सदस्य थे, जिनमें से 10 हज़ार से ज़्यादा हार्डकोर लड़ाके थे. उन्हें हथियारों का प्रशिक्षण दिया गया था. भोले भाले ग्रामीणओं और आदिवासियों को डरा धमका कर, बहला फुसला कर कई इलाकों में उन्होंने अपना स्थानीय प्रशासन तक बना लिया था.

यही वजह है कि इस चुनौती से निपटने के लिए हर सरकार को सख़्ती अपनानी पड़ी. मोदी सरकार ने भी इसे देश के सामने खड़ी एक बड़ी चुनौती के तौर पर लिया और इसीका नतीजा है कि नक्सलवाद आज सिर्फ़ 38 ज़िलों तक सीमित रह गया है.

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