- बॉम्बे HC ने सिंगल मदर द्वारा परवरिश किए बच्चे को पिता का नाम या जाति जबरदस्ती नहीं थोपने का अधिकार दिया
- अदालत ने कहा कि बच्चे की पहचान को केवल पिता से जोड़ना पुरानी पितृसत्तात्मक सोच और संविधान के खिलाफ है
- कोर्ट ने सिंगल मदर को पूर्ण अभिभावक मानते हुए बच्चे के स्कूल रिकॉर्ड में नाम और जाति बदलने का आदेश दिया
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला देते हुए साफ कहा है कि अगर किसी बच्चे की परवरिश सिर्फ उसकी मां ने की है, तो उसे जबरदस्ती पिता का नाम, सरनेम या जाति ढोने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि पुराने फॉर्म या परंपराओं के आधार पर बच्चे की पहचान थोपना संविधान की भावना के खिलाफ है. ऑरंगाबाद बेंच की जस्टिस विभा कंकनवाडी और जस्टिस हितेन वेनेगांवकर ने 2 फरवरी को दिए अपने फैसले में कहा कि सिंगल मदर को “पूरा अभिभावक” मानना किसी तरह की सहानुभूति नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है.
अदालत ने क्या-क्या कहा?
फैसले की कॉपी बुधवार को सामने आई. अदालत ने कहा, “यह फैसला पितृसत्तात्मक दबाव से संवैधानिक विकल्प की ओर बढ़ने का संकेत है. वंशानुक्रम को नियति मानने की सोच खत्म होकर अब गरिमा को अधिकार माना जा रहा है.” जजों ने यह भी कहा कि एक विकसित हो रहे समाज में यह नहीं माना जा सकता कि बच्चे की पहचान उसके उस पिता से जुड़ी हो, जो उसकी जिंदगी में मौजूद ही नहीं है, जबकि बच्चे की परवरिश का पूरा भार मां उठाती है.
यह आदेश 12 साल की एक बच्ची की याचिका पर आया, जिसमें उसने स्कूल रिकॉर्ड में अपना नाम और जाति बदलने की मांग की थी. बच्ची चाहती थी कि उसके स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज “मराठा” जाति को बदलकर “अनुसूचित जाति महार” किया जाए.
याचिका में क्या मांग की गयी थी?
याचिका के अनुसार, बच्ची की मां सिंगल मदर हैं और वही उसकी प्राकृतिक अभिभावक हैं. मां ने पिता पर यौन शोषण का आरोप लगाया था, हालांकि बाद में दोनों पक्षों में समझौता हुआ. समझौते में तय हुआ कि बच्ची की स्थायी कस्टडी मां के पास ही रहेगी. स्कूल ने बच्ची का नाम और जाति बदलने की मांग को पिछले साल खारिज कर दिया था, जिसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा.
अदालत की सख्त टिप्पणी
अदालत ने कहा कि जब महाराष्ट्र सरकार की नीति ही यह मानती है कि पहचान दस्तावेजों में मां का नाम प्राथमिक हो सकता है, तो किसी भी सरकारी कर्मचारी या अधीनस्थ संस्था को इस अनुरोध को ठुकराने का हक नहीं है. हाई कोर्ट ने कहा, “संविधान गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है. इसमें वह पहचान भी शामिल है जो किसी अनुपस्थित पिता से जबरदस्ती नहीं जोड़ी गई हो, खासकर तब जब उसका कोई कल्याणकारी उद्देश्य नहीं है और इससे सामाजिक नुकसान बढ़ सकता है.”
समाज की पूर्वाग्रही सोच से बाहर आने की जरूरत: अदालत
अदालत ने स्कूल रिकॉर्ड को सिर्फ कागजी दस्तावेज नहीं, बल्कि ऐसा सार्वजनिक रिकॉर्ड बताया जो बच्चे के साथ सालों तक चलता है और कई संस्थानों में उसकी पहचान तय करता है. अदालत ने पितृसत्तात्मक सोच पर भी सख्ती दिखाते हुए कहा कि यह मान लेना कि पहचान पिता से ही आएगी, कोई “प्रशासनिक नियम” नहीं, बल्कि समाज की पूर्वाग्रही सोच है, जिसे अब बदला जाना चाहिए. अंत में कोर्ट ने आदेश दिया कि बच्ची का नाम और जाति दोनों उसके अनुरोध के अनुसार स्कूल रिकॉर्ड में बदली जाएं.
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