- बंगाल चुनाव में बीजेपी ने अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करते हुए प्रेसिडेंसी डिवीजन पर खास फोसस किया है
- बीजेपी के लिए यहां पैठ सिर्फ सीटें बढ़ाने के लिए नहीं, TMC के गढ़ में मजबूत विकल्प बनने के लिए भी जरूरी है
- बीजेपी ने प्रेसीडेंसी डिवीजन के कुछ खास क्लस्टर्स की पहचान की है, जहां उसे संभावनाएं दिख रही हैं
पश्चिम बंगाल बुधवार को दूसरे चरण की हाई वोल्टेज चुनावी जंग के लिए तैयार है. इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए प्रेसीडेंसी डिवीजन पर पूरा फोकस किया है. राजनीतिक रूप से अहम माने जाने वाले इस क्षेत्र में कोलकाता, उत्तरी व दक्षिणी 24 परगना के कुछ हिस्से, हावड़ा, हुगली और पूर्व बर्द्धमान के इलाके शामिल हैं. यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से ही नहीं बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और आबादी के लिहाज से भी काफी अहम है. ये इलाका अक्सर बंगाल के अंतिम चुनावी नतीजों को तय करने में निर्णायक भूमिका निभाता है. ममता बनर्जी के इस गढ़ में सेंध लगाने के लिए बीजेपी ने इस बार अलग रणनीति अपनाई है.
प्रेसीडेंसी डिवीजन क्यों इतना खास?
- इसी प्रेसिडेंसी डिवीजन में कोलकाता की कई विधानसभा सीटें हैं, जो पूरे बंगाल में राजनीतिक विमर्श को दिशा देती हैं.
- उत्तरी 24 परगना, दक्षिणी 24 परगना, हावड़ा, हुगली और पूर्व बर्धमान जैसे घने इलाके इससे सटे हुए हैं.
- इन जिलों में औद्योगिक विकास, पलायन और शहरी प्रशासन जैसे मुद्दे मतदाताओं को काफी प्रभावित करते रहे हैं.
- बीजेपी के लिए यहां पैठ सिर्फ सीटें बढ़ाने के लिए नहीं, TMC के गढ़ में मजबूत विकल्प बनने के लिए भी जरूरी है.
माइक्रो टारगेट से जीत का लक्ष्य
प्रेसिडेंसी डिवीजन को लेकर बीजेपी की इस नई रणनीति का सबसे मजबूत स्तंभ है- डेटा ड्रिवन टारगेटिंग. पार्टी उन विधानसभा क्षेत्रों पर खास ध्यान दे रही है जहां-
- 2019 के लोकसभा चुनाव में वह आगे रही थी.
- 2024 के आम चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा था.
पार्टी की नजर ऐसी सीटों पर है, जिन्हें थोड़ी मेहनत से जीत में बदला जा सकता है. उन सीटों पर भी खास ध्यान है, जहां पिछली बार हार का अंतर बहुत कम था. पार्टी का मानना है कि बेहतर बूथ मैनेजमेंट, उम्मीदवारों के चयन और वोटरों से संपर्क के जरिए आगामी चुनाव में उलटफेर किया जा सकता है.
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प्रमुख जिलों में सीटों का गणित
बीजेपी ने आंतरिक आकलन और सियासी गुणा-गणित के आधार पर प्रेसीडेंसी डिवीजन के कुछ खास क्लस्टर्स की पहचान की है, जहां उसे संभावनाएं दिख रही हैं-
- कोलकाता: यहां की करीब 6 विधानसभा सीटों पर पार्टी बहुत आक्रामक है. इन सीटों पर मध्यम वर्ग और प्रवासी वोटरों की संख्या अधिक है.
- हावड़ा: औद्योगिक इतिहास और बदलती राजनीतिक हवा वाले हावड़ा की लगभग 10 सीटों पर बीजेपी की नजर है.
- हुगली: पिछले संसदीय चुनावों के अच्छे प्रदर्शन के आधार पर बीजेपी यहां की 12 सीटों पर फोकस कर रही है.
- पूर्व बर्द्धमान: ग्रामीण और कृषि प्रधान क्षेत्रों की करीब 10 सीटों को पार्टी टारगेट करके चल रही है.
- उत्तर, दक्षिण 24 परगनाः यहां भी भाजपा की पैनी नजर है, खासकर उन सीटों पर जहां पिछली बार उसे फायदा हुआ था.
अल्पसंख्यक क्षेत्रों में खास रणनीति
बीजेपी की रणनीति का एक दिलचस्प पहलू अल्पसंख्यक बहुल सीटों के प्रति उसका दृष्टिकोण है. पार्टी उन क्षेत्रों में अपने संसाधन ज्यादा नहीं लगा रही है, जहां अल्पसंख्यक आबादी 40 फीसदी से अधिक है क्योंकि इन इलाकों में पार्टी का वोट शेयर कम ही रहा है.
इसके बजाय पार्टी उन सीटों पर जोर लगा रही है, जहां आबादी के समीकरण उसे अपने पक्ष में दिख रहे हैं. हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि उसने अल्पसंख्यक बहुल सीटों को बिल्कुल छोड़ दिया है. केंद्रीय योजनाओं, जनकल्याणकारी प्रयासों और स्थानीय प्रचार के दम पर पार्टी ने चुनिंदा इलाकों में पूरा जोर लगाया है.
शहरी बनाम ग्रामीण रणनीति
बीजेपी ने प्रेसिडेंसी डिवीजन के लिए दोहरी रणनीति अपनाई है-
- शहरी क्षेत्र (कोलकाता, हावड़ा): यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर, ट्रैफिक, जनसुविधाओं के अलावा भ्रष्टाचार घटाने और रोजगार बढ़ाने जैसे मुद्दों पर जोर दिया जा रहा है ताकि युवाओं और मध्यम वर्ग में सरकार से असंतुष्ट वोटरों को आकर्षित कर सके.
- अर्ध शहरी व ग्रामीण क्षेत्र (हुगली, बर्द्धमान, 24 परगना): यहां केंद्रीय योजनाओं, कृषि मुद्दों और स्थानीय स्तर पर विकास की कमी जैसे मुद्दों को उजागर करके पार्टी ने बूथ स्तर पर मजबूती बढ़ाने का प्रयास किया है.
कोर गेम प्लानः बूथ स्तर पर मजबूती
पिछले चुनावों से सबक लेते हुए बीजेपी ने बूथ लेवल मैनेजमेंट पर पूरी ताकत झोंक दी है. इसे आमतौर पर बंगाल की राजनीति की रीढ़ माना जाता है. इसके तहत पार्टी का फोकस इन चीजों पर है-
- स्थानीय समितियों को मजबूत बनाना
- बूथ वर्कर्स की ट्रेनिंग
- अपने इलाकों में मतदान प्रतिशत बढ़ाना
- साइलेंट वोटरों को पहचान कर बूथ तक लाना
इसके पीछे की रणनीति साफ है- कोर वोटरों को बुलंद करके सीटों में बदलना, खासकर ऐसी सीटों पर जहां संसदीय चुनावों में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद पिछले चुनाव में पार्टी को अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिली थी.
चुनौतियां और आगे की राह
इस सुव्यवस्थित रणनीति के बावजूद बीजेपी के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं-
- इन जिलों में टीएमसी का मजबूत जमीनी नेटवर्क
- क्षेत्रीय दलों के मुकाबले पार्टी के स्थानीय नेतृत्व की कमी
- प्रमुख इलाकों में अल्पसंख्यकों का बीजेपी के खिलाफ एकजुट होना
- कोलकाता जैसे क्षेत्रों में शहरी वोटरों के मिजाज का पता लगाने में मुश्किलें
प्रेसिडेंसी डिवीजन की खासियत रही है कि यहां के वोटर राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं और मुद्दों के आधार पर अपनी राय बनाते हैं. यही वजह है कि यहां कोई एक नेरेटिव हर जगह नहीं चलता.
आगे की राह
चुनौतियों के बावजूद बीजेपी इस बार अपनी रणनीति बदलकर सटीक राजनीति को सामने रखकर चुनावी मैदान में उतर रही है. खास सीटों को टारगेट करके, पुराने डेटा का एनालिसिस करके और जिताऊ सीटों पर फोकस करके पार्टी बंगाल के इस सबसे अहम क्षेत्र में अधिकतम चुनावी फायदा कमाने की कोशिश में जुटी है. यह रणनीति असल चुनावी जीत में कितनी तब्दील हो पाती है, ये तो 4 मई को पता चलेगा, लेकिन इतना साफ है कि बीजेपी इस बार कुछ भी किस्मत के भरोसे छोड़कर नहीं चल रही है.
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