फरक्का और मुर्शिदाबाद के बीच कहीं एक ऐसा पल आता है, जब न्यू जलपाईगुड़ी से आने वाली ट्रेन गंगा नदी को पार करती है. ऐसा होते ही बंगाल का पूरा स्वभाव बदल जाता है. हवा बदल जाती है. धान के खेत सपाट हो जाते हैं. नदियां धीमी हो जाती हैं. और राजनीति, जो उत्तर में खुली और बहस जैसी होती है, यहां आकर कुछ पुरानी, ज्यादा जटिल और पेचीदा बन जाती है. बिना किसी घोषणा के आप एक बंगाल से दूसरे बंगाल में पहुंच जाते हैं.
2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव ने इस अदृश्य सीमा को साफ़-साफ़ उजागर कर दिया है. 23 अप्रैल को पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान हुआ. इनमें से ज़्यादातर सीटें उत्तर बंगाल के इलाकों - कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, अलीपुरद्वार, डुआर्स और तीस्ता क्षेत्र, हिमालय की तलहटी के इलाके और चाय बागानों के कस्बों में हैं, जहां अलग तरह का इतिहास और आदिवासी व शरणार्थी पहचान की परतें हैं. इस चरण में रिकॉर्ड 93.19 फीसदी मतदान हुआ. यह आजादी के बाद राज्य के इतिहास में सबसे ज्यादा है. यह आंकड़ा दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों के लिए भी चौंकाने वाला है.
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29 अप्रैल को होने वाला दूसरे चरण का मतदान एक बिल्कुल अलग दुनिया में होगा कोलकाता और उसके आसपास के शहर, सुंदरबन का ज्वारीय इलाका, हावड़ा के भीड़भाड़ वाले औद्योगिक क्षेत्र और दोनों मेदिनीपुर का धान और राजनीति से भरा इलाका. यह समझने के लिए कि दूसरा चरण क्यों महत्वपूर्ण है और क्यों 142 सीटें, 152 से कम होने के बावजूद, ज़्यादा राजनीतिक असर रखती हैं. यहां यह समझना ज़रूरी है कि बंगाल के हर हिस्से के लोग अपने बारे में क्या सोचते हैं. उन्हें किस बात का डर है और वे क्या चाहते हैं.

उत्तर बंगाल में BJP की पहचान की राजनीति
उत्तर बंगाल अलग-अलग लोगों के आकर बसने वाली जगह है. गोरखा नेपाल से आए, राजबंशी लोग बहुत प्राचीन समय से यहां रहते हैं, बंटवारे के बाद और फिर 1971 के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से शरणार्थी आए. चाय बागानों में काम करने वाले ज़्यादातर आदिवासी मजदूरों को अंग्रेज एक सदी से भी पहले झारखंड और छत्तीसगढ़ से लाए थे और वे यहीं के होकर रह गए. इस वजह से यहां की पहचान कई परतों वाली है. यह पहचान बदलती भी रहती है. इसलिए यहां बीजेपी की यह बात कि पहचान महत्वपूर्ण है, नागरिकता मायने रखती है और यह सवाल कि असली हकदार कौन है, लोगों के बीच असर डालती है.
उत्तर बंगाल में एक नई भू-राजनीतिक चिंता भी बढ़ी है सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे 'चिकन नेक' भी कहा जाता है. यह सिर्फ़ सात किलोमीटर चौड़ा इलाका है. यह भारत के मुख्य हिस्से को उत्तर-पूर्व से जोड़ता है. बीजेपी ने इसे एक प्रतीक बना दिया है कमज़ोरी का, घुसपैठ का और इस बात का कि जब राज्य सरकार सीमाओं पर ध्यान नहीं देती, तो क्या हो सकता है. दक्षिण बंगाल में, खासकर कोलकाता और उसके आसपास, बीजेपी को अलग तरह की भाषा बोलनी पड़ती है. वह यह समझती भी है. यहां के लोग सीमा या सुरक्षा की चिंता से ज़्यादा संस्कृति, प्रशासन (गवर्नेंस) और बंगाली पहचान पर गर्व से प्रभावित होते हैं.
सुंदरबन के दक्षिण में तृणमूल की मज़बूत पकड़
पहले दक्षिण के सुंदरबन और साउथ 24 परगना को देखते हैं. ममता बनर्जी के पास सिर्फ़ सत्ता का फायदा (Incumbency) ही नहीं है, बल्कि 15 साल की बनाई हुई एक मजबूत कल्याणकारी व्यवस्था भी है.'लक्ष्मी भंडार', जैसी योजना, जिसमें महिलाओं के बैंक खातों में सीधे पैसे भेजे जाते हैं. इस योजना ने साउथ 24 परगना और सुंदरबन में एक मजबूत भरोसा और जुड़ाव बनाया है. इस जुड़ाव को केवल भाषणों से तोड़ पाना आसान नहीं है.
यह बीजेपी के लिए सबसे कठिन इलाका है. यहां जीत हासिल करना बहुत मुश्किल काम है. गहरे दक्षिण के इलाकों जैसे गोसाबा और बसंती में, जहां सड़कें भी कई जगह पानी के रास्तों में बदल जाती हैं और शहर बहुत दूर लगता है, वहां तृणमूल की योजनाएं ही लोगों के लिए सरकार जैसी हैं. बीजेपी के पास यहां वैसी कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है. उसके पास केवल तर्क हैं. लेकिन जहां लोग हर साल आने वाले तूफान की चिंता में जी रहे हों, वहां केवल तर्क से क्या होता है.

बीजेपी ने उत्तरी बंगाल में सीमा सुरक्षा और पहचान की राजनीति को मुद्दा बनाने की कोशिश की.
क्या दक्षिण कोलकाता का मध्य वर्ग बदल गया है
जी हां, दक्षिण कोलकाता के मिडिल क्लास घरों में, बालीगंज के कॉफी शॉप्स में और जादवपुर के शिक्षकों के बीच कुछ बदल गया है. आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुए मेडिकल स्टूडेंट से रेप का मामला खत्म नहीं हुआ. स्कूल भर्ती घोटाला, जिसमें हजारों योग्य शिक्षकों को नौकरी नहीं मिली, वह भी लोगों के दिमाग से नहीं गया है. ये मुद्दे सीमा सुरक्षा या संस्कृति की बहस में नहीं हैं. ये बहुत निजी और सीधे शासन (Governance) की नाकामी के उदाहरण हैं, एक डॉक्टर की उसके कार्यस्थल पर हत्या, एक शिक्षक जिसने परीक्षा पास की लेकिन नौकरी नहीं मिली. यहां इस बार बीजेपी को मुद्दे खोजने की जरूरत नहीं पड़ी, मुद्दे खुद उसके पास आ गए.
कोलकाता और शहरी बंगाल में बीजेपी की बदलती रणनीति
दक्षिण बंगाल में राजनीति अक्सर सीधे तर्कों के रूप में नहीं आती है. वह माहौल की तरह फैलती है, जैसे गर्मी धीरे-धीरे छतों पर चढ़ती है, जैसे भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर दबाव बढ़ता है और चाय की दुकानों या ट्राम स्टॉप पर बातचीत का लहजा बदल जाता है. इस चुनावी गर्मी में बीजेपी अब कोलकाता को वही कहानी नहीं सुना रही, जो पहले ग्रामीण इलाकों में सुनाती थी.
पहले पार्टी का फोकस 'घुसपैठ' जैसे मुद्दों पर था, जो ज़्यादातर सीमावर्ती और ग्रामीण इलाकों में असर करते हैं. लेकिन चुनाव जब कोलकाता और उसके आसपास की सीटों पर आया तो बीजेपी ने सिर्फ़ नारे ही नहीं बदले हैं, उसने यह भी बदल दिया है कि वह किस तरह के लोगों से और किन मुद्दों पर बात कर रही है. अब उसकी राजनीति शहरी समस्याओं, शासन-प्रशासन और रोज़मर्रा की परेशानियों पर ज्यादा केंद्रित हो गई है. यह शहरी लोगों के लिए ज्यादा मायने रखती है.ॉ

स्कूटर पर सवार को प्रचार के अंतिम दिन कोलकाता की सड़कों पर निकलीं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी.
कोलकाता में बदला बीजेपी का मुद्दा
कोलकाता में बीजेपी ने अपनी राजनीति का फोकस बदल दिया है. पहले वह सीमावर्ती इलाकों और पहचान (Identity) की बात करती थी. लेकिन अब उसने ध्यान शहर की सड़कों और रोज़मर्रा की समस्याओं पर लगा दिया है. यानि 'कौन यहां का है' से हटकर अब 'शहर कैसे चल रहा है' पर बात हो रही है. यह बदलाव बीजेपी के काम करने के तरीके में भी साफ दिखता है. उसकी सोशल मीडिया टीम अब दूर की साजिशों या घुसपैठ जैसी बातों पर ज़्यादा नहीं बोलती, बल्कि लोगों की रोज़मर्रा की परेशानियों पर ध्यान देती है.
अब मुद्दा है, लोगों का रोज़-रोज़ का सफर. बीजेपी अपने सोशल मीडिया पोस्ट में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को एक बड़े सवाल की तरह उठाती है, पुरानी और खस्ताहाल बसें, टूटी-फूटी सड़कों की समस्या. हाल में एक दावा किया गया कि कोलकाता की सड़कों और बसों को 21वीं सदी में लाना होगा. इसमें कहा गया कि चार मई के बाद हालात बेहतर होंगे, बसें सुधरेंगी, सड़कें सुधरेंगी और लोगों की ज़िंदगी भी बेहतर होगी. इसी के साथ बीजेपी यह भी प्रचार कर रही है कि कोलकाता भारत का सबसे ज़्यादा भीड़भाड़ वाला शहर है. यही उसकी नई चुनावी कहानी का केंद्र बन गया है.
समय का हिसाब भी मायने रखता है. शहर से सिर्फ़ यह नहीं कहा जा रहा है कि वह 'अच्छा महसूस करे', बल्कि उसे ऐसे राहत के लिए वोट देने को कहा जा रहा है जिसे मापा जा सके, जैसे कितने मिनट बचते हैं, कितने गड्ढों से बचा जा सकता है और रोज़ का सफर कितना आसान हो जाता है.बीजेपी कोलकाता को लापरवाही के एक उदाहरण के तौर पर पेश कर रही है. ट्रैफिक जाम को केवल समस्या नहीं, बल्कि एक प्रतीक बताया जा रहा है. यहां तक कहा जा रहा है कि कोलकाता भारत का सबसे ज्यादा भीड़भाड़ वाला शहर है, जहां ट्रैफिक की औसत स्पीड करीब 17.4 किमी प्रति घंटा है. इसे एक सबूत की तरह पेश किया जा रहा है. टीएमसी के शासनकाल को 'महा जंगलराज' और 'ठहराव का दौर' बताया जा रहा है.
क्या कोलकाता पिछड़ गया है
यहां बीजेपी का नैरेटिव पूरी तरह फिल्मी लगता है- पहले अग्रणी, अब पिछड़ा. कोलकाता को उसके पुराने गौरव की याद दिलाई जाती है- जैसे भारत की पहली मेट्रो, फिर उसकी आज की हालत से तुलना की जाती है. संदेश यह है, ''जो शहर कभी शहरी परिवहन में आगे था, वही आज जाम और पुराने ढांचे से जूझ रहा है.'' इसमें दोष वामपंथी विचारधारा का नहीं, बल्कि मौजूदा शासन को दिया जाता है. बीजेपी आरोप लगाती है कि टीएमसी ने पूरे ट्रांसपोर्ट सिस्टम को 'सिंडिकेट और माफिया' के हवाले कर दिया है. इस तरह, इंफ्रास्ट्रक्चर को केवल विकास नहीं, बल्कि सत्ता की लड़ाई का मैदान बताया जा रहा है, जहां या तो काम हुआ है या जानबूझकर रोका गया है.
बीजेपी का यह दांव काम करेगा या नहीं, यह तो वोटों की गिनती से तय होगा. लेकिन एक बात साफ है कि ग्रामीण इलाकों की सीमा और पहचान वाली राजनीति से हटकर, बीजेपी ने दक्षिण बंगाल में चुनाव का मतलब बदलने की कोशिश की. उसने इसे बड़े-बड़े मुद्दों से नहीं, बल्कि बस स्टॉप, सड़कों के गड्ढे और ट्रैफिक जाम जैसी छोटी-छोटी चीज़ों से जोड़ा.

बीजेपी ने दक्षिण कोलकाता में चुनाव प्रचार के दौरान बुनियादी सुविधाओं को मुद्दा बनाने की कोशिश की.
उत्तर और दक्षिण बंगाल, दो अलग सोच
पश्चिम बंगाल हमेशा से एक राज्य होते हुए भी दो अलग दुनिया जैसा रहा है. उत्तर बंगाल पहाड़ों और सीमाओं की तरफ देखता है, जहां की राजनीति ज़मीन और पहचान के इर्द-गिर्द घूमती है. वहीं दक्षिण बंगाल समुद्र (बंगाल की खाड़ी) और नदियों की तरफ देखता है, जहां की राजनीति संस्कृति, यादों और सरकारी योजनाओं पर आधारित है. अगर इसे सीधे शब्दों में कहें तो उत्तर बंगाल उस चीज़ के लिए वोट करता है, जिसे खोने का डर है. वहीं दक्षिण बंगाल उस चीज़ के लिए वोट करता है, जो उसके पास पहले से है.
चार मई की सुबह जब पश्चिम बंगाल की 294 सीटों के नतीजे आने शुरू होंगे, तो पहला संकेत उत्तर बंगाल से मिलेगा कि क्या भारी वोटिंग बीजेपी की लहर में बदली या सिर्फ़ उसके मजबूत आधार को दिखाती है. लेकिन असली फैसला कुछ घंटों बाद दक्षिण बंगाल से आएगा- भवानीपुर, बिधाननगर, सुंदरबन और हावड़ा जैसे इलाकों से. आखिर में उत्तर और दक्षिण बंगाल का फर्क सिर्फ़ भूगोल का नहीं है. यह इस बात का फर्क है कि राजनीति का मकसद क्या है. चार मई को यह तय होगा कि इन दो सोच में से कौन सही साबित होता है.
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