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बीजेपी की प्रधानी... 'कभी नीम तो कभी शहद' जैसी है जेपी नड्डा के 6 साल के कार्यकाल की कहानी

जेपी नड्डा फिलहाल एक साथ तीन जिम्मेदारियों को संभाल रहे हैं. वे बीजेपी अध्यक्ष के साथ ही दो बड़े विभागों के कैबिनेट मंत्री और राज्य सभा में सदन के नेता भी हैं.

बीजेपी की प्रधानी... 'कभी नीम तो कभी शहद' जैसी है जेपी नड्डा के 6 साल के कार्यकाल की कहानी
  • जेपी नड्डा 20 जनवरी 2026 को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा देंगे और नितिन नबीन को कमान सौंपेंगे
  • नड्डा के छह साल के कार्यकाल में भाजपा ने कुल 33 विधानसभा चुनाव लड़े, जिनमें लगभग साठ प्रतिशत सफलता मिली
  • नड्डा ने प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के साथ मिलकर संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया
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नई दिल्ली:

20 जनवरी 2026 बीजेपी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के कार्यकाल का अंतिम दिन होगा. इस दिन वे औपचारिक रूप से पार्टी की कमान नितिन नबीन को सौंप देंगे. उनके 6 साल के कार्यकाल में बीजेपी ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. वैसे तो उनका कार्यकाल 3 साल के लिए ही था, लेकिन पहले कोविड और फिर लोकसभा चुनाव के कारण इसे बढ़ाया गया, और अब वे पूरे छह साल का कार्यकाल समाप्त कर रहे हैं. इस दौरान एक लोकसभा और तीस से भी अधिक विधानसभा चुनावों में पार्टी उनकी अगुवाई में मैदान में उतरी.

  1. वैसे तो जेपी नड्डा 2014 में ही बीजेपी के अध्यक्ष बन जाते, लेकिन तब उत्तर प्रदेश में शानदार सफलता दिलाने वाले अमित शाह को यह जिम्मेदारी दी गई. नड्डा तब अमित शाह की टीम में बतौर राष्ट्रीय महासचिव शामिल हुए. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया, जहां पार्टी ने एक बार फिर शानदार सफलता हासिल की.
  2. इसके बाद शाह 2019 में बतौर गृह मंत्री मोदी सरकार में चले गए. हालांकि वे अध्यक्ष बने रहे और उनकी सहायता के लिए नड्डा को जून 2019 में कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया. नड्डा 20 जनवरी 2020 को औपचारिक रूप से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए.
  3. जेपी नड्डा के नेतृत्व में भाजपा ने 2020 से अब तक कुल 33 विधानसभा चुनाव लड़े. इनमें जीत हार का मिश्रित रिकॉर्ड रहा है. 19 में पार्टी ने जीत हासिल की है. इस तरह उनकी अगुवाई में पार्टी की सफलता दर लगभग 60 प्रतिशत रही.
  4. बतौर कार्यकारी अध्यक्ष वे बीजेपी को कई विधानसभा चुनावों में ले गए. महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में बीजेपी का मिश्रित रिकॉर्ड रहा. जहां झारखंड में बीजेपी हार गई, वहीं हरियाणा में उसकी संख्या कम हुई और उसे सहयोगियों के साथ सरकार बनानी पड़ी. महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री बना, लेकिन गठबंधन के मतभेदों के कारण सरकार गिर गई.
  5. अगले साल जनवरी 2020 में अध्यक्ष बनते ही नड्डा का पहला चुनावी इम्तिहान दिल्ली विधानसभा चुनाव था, लेकिन इसमें भाजपा हार गई. नड्डा के नेतृत्व में बीजेपी ने पहला बड़ा चुनाव 2020 के अंत में बिहार में जीता. उसके अगले साल यानी 2021 में भाजपा को असम और पुडुचेरी में जीत मिली, जबकि पश्चिम बंगाल में सीटों की संख्या तो बढ़ी लेकिन वो सत्ता से दूर रही.
  6. साल 2022 नड्डा की अगुवाई में भाजपा के लिए काफी प्रभावशाली रहा. पार्टी ने उत्तर प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव जीते. नड्डा को व्यक्तिगत तौर पर तब झटका लगा, जब उनके गृह राज्य हिमाचल प्रदेश में भाजपा हार गई. इसका दोष अंदरूनी मतभेद पर मढ़ दिया गया. पड़ोसी राज्य पंजाब में भी बीजेपी कोई अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी.
  7. 2023 में भाजपा ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे हिंदी पट्टी के राज्यों में शानदार जीत दर्ज की. हालांकि कर्नाटक में कांग्रेस से हार पार्टी के लिए बड़ा झटका रही.
  8. 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सीटों में उल्लेखनीय कमी आई और वह संसद में बहुमत हासिल नहीं कर सकी. हालांकि, इसी दौरान भाजपा ने ओडिशा में बीजद से सत्ता छीनकर राज्य में अपनी पहली जीत दर्ज की, लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों के कारण यह जीत कुछ हद तक फीकी रही.
  9. अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में हुए पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने वोट शेयर को 2014 के 22 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत से अधिक कर लिया और सीटों की संख्या 25 से बढ़कर 29 हो गई. पार्टी ने जम्मू क्षेत्र में दबदबा कायम रखा, लेकिन सत्ता में वापसी नहीं कर सकी.
  10. इसके बाद हुए चुनावों में जीत के साथ नड्डा के नेतृत्व में भाजपा ने यह साबित किया कि आम चुनाव में आया झटका केवल एक अपवाद था. 2024 के दूसरे हिस्से में भाजपा ने महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे अहम राज्यों में जीत दर्ज कर पुनर्जीवित INDIA गठबंधन को बड़ा झटका दिया.
  11. 2025 में दिल्ली और बिहार दोनों विधानसभा चुनावों में जीत के साथ भाजपा एक बार फिर कमजोर और बिखरे विपक्ष के मुकाबले एक मजबूत चुनावी मशीन के रूप में उभरकर सामने आई.

सरकार और संगठन में बेहतर तालमेल बनाने में नड्डा की सराहनीय भूमिका

नड्डा अपने पूरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के बेहद विश्वासपात्र बने रहे. सरकार और संगठन में बेहतर तालमेल बनाने में उनकी सराहनीय भूमिका रही. मोदी सरकार की लोककल्याणकारी नीतियों को संगठन के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने में उनके नेतृत्व में बीजेपी ने बड़ी भूमिका निभाई. लाभार्थियों की पहचान और उनसे संपर्क साधकर बीजेपी ने अपना बड़ा वोट बैंक तैयार किया. संगठन अभियान में भी बीजेपी ने सदस्यों की संख्या बढ़ा कर विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा बरकरार रखा. कोविड के समय नड्डा ने पार्टी संगठन का प्रभावी उपयोग गरीबों तक राशन तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं को पहुंचाने में किया.

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जेपी नड्डा राजनीतिक रूप से भी प्रखर फ़ैसले लेते रहे. 2024 के लोकसभा चुनाव के झटके से उबर कर एनडीए की मजबूती पर ध्यान दिया और सहयोगियों के साथ तालमेल बेहतर किया. वैसे यह भी है कि इससे पहले जेडीयू, अकाली दल और शिवसेना ने बीजेपी से रिश्ता भी तोड़ा. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले आरएसएस की भूमिका को लेकर दिए गए उनके एक बयान से विवाद हुआ, लेकिन उन्होंने स्थिति स्पष्ट कर मामले को तूल नहीं पकड़ने नहीं दिया. उनके कार्यकाल के दौरान आरएसएस के संगठनों के साथ भी बीजेपी का बेहतर तालमेल रहा.

नड्डा एक साथ तीन ज़िम्मेदारियों को संभाल रहे हैं. वे बीजेपी अध्यक्ष के साथ ही दो बड़े विभागों के कैबिनेट मंत्री और राज्य सभा में सदन के नेता भी हैं. यह पीएम मोदी का उन पर विश्वास बताता है.

संगठन को विस्तार देने में भी पिछले छह सालों में काफी काम हुआ. केरल और तमिलनाडु में बीजेपी संगठन को मज़बूत किया गया. बूथ स्तर पर पूरे देश में पार्टी मज़बूत की गई. 'मेरा बूथ, सबसे मज़बूत' अभियान चलाया गया. इनका परिणाम चुनाव में देखने को मिला.

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नड्डा ने अपनी टीम में नए लोगों को मौका देकर भविष्य के लिए नेतृत्व तैयार किया. वर्तमान कार्यकारी और भावी अध्यक्ष नितिन नबीन को उन्हीं के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ की ज़िम्मेदारी दी गई थी. हालांकि संसदीय बोर्ड से वरिष्ठ नेताओं को हटाने और अपेक्षाकृत अनजान चेहरों को जगह देने पर सवाल उठाए गए थे.

नड्डा ब्राह्मण समाज से आते हैं और राजनीतिक तौर पर उनकी जरूरत बीजेपी को आगे भी रहेगी. पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का उन पर अटूट विश्वास आने वाले समय में भी पार्टी के लिए उनकी उपयोगिता को बनाए रखेगा. हालांकि उनके सामने एक बड़ी चुनौती अपने गृह राज्य हिमाचल प्रदेश में पार्टी को मज़बूत करना होगी. 

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