मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने राज्यभर के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे दीपावली पर अपने-अपने इलाके के दलित, महादलित और अति पिछड़ा समाज की बस्तियों में जाएं और वहां के लोगों के साथ त्योहार मनाएं.
मुख्यमंत्री ने खासतौर पर महादलित टोलों में जाकर लोगों के बीच दीपावली की खुशियां बांटने को कहा है. उन्होंने राज्य के जनप्रतिनिधियों से भी अपने-अपने क्षेत्र की महादलित बस्तियों में जाकर लोगों के साथ त्योहार मनाने की अपील की है.
क्या हैं इसके मायने?
मुख्यमंत्री की इस पहल को केवल सामाजिक मेलजोल तक सीमित नहीं माना जा रहा है. इसके राजनीतिक मायने भी हैं.
बिहार की राजनीति में दलित, महादलित और अति पिछड़ा वर्ग हमेशा से अहम भूमिका निभाता रहा है. चुनावों में इन वर्गों का समर्थन सत्ता की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण माना जाता है. ऐसे में दीपावली के मौके पर अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को इन बस्तियों तक पहुंचने का निर्देश राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है.
नीतीश कुमार के लंबे शासनकाल में महादलित और अति पिछड़े वर्ग को लेकर कई योजनाएं और राजनीतिक पहल देखने को मिली थीं.
अब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी इन वर्गों के बीच सरकार की मौजूदगी और पहुंच बढ़ाने की कोशिश करते दिख रहे हैं. भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के लिए भी इन सामाजिक वर्गों के साथ सीधा जुड़ाव राजनीतिक रूप से अहम है.
अधिकारियों के साथ जनप्रतिनिधि भी
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों के साथ जनप्रतिनिधियों को भी इस पहल में शामिल होने को कहा है. इसका संदेश साफ है कि दीपावली की खुशियां समाज के हर वर्ग तक पहुंचनी चाहिए.
मुख्यमंत्री के इस निर्देश का जमीन पर कितना असर दिखता है, अधिकारी और जनप्रतिनिधि कितनी सक्रियता से महादलित बस्तियों तक पहुंचते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा.
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