बिहार के भोजपुर के बिलौती गांव में भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर पर बवाल खड़ा हो गया है. इस एनकाउंटर को फर्जी बताया जा रहा है. आरोप है कि भरत तिवारी ने हथियार डाल दिए थे, सरेंडर कर दिया था, फिर भी पुलिस ने जानबूझकर गोली चलाई. वहीं, पुलिस का कहना है कि भरत लगातार गोली चला रहे थे, जिसके चलते जवाबी कार्रवाई में उनके पैर में गोली लगी और अस्पताल ले जाते समय उनकी मौत हो गई.
भरत तिवारी का एनकाउंटर 17 जून को हुआ था. लगभग एक हफ्ता बीत जाने के बाद भी मामला शांत होता नहीं दिख रहा है.
बिहार सरकार ने इस एनकाउंटर की न्यायिक जांच कराने का आदेश दिया है. हालांकि, विपक्ष सरकार पर हमलावर है. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इसे 'फर्जी एनकाउंटर' बताते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से माफी मांगने की मांग की है.
हाई कोर्ट में याचिका दायर
भरत तिवारी एनकाउंटर का मामला पटना हाई कोर्ट तक पहुंच गया है. इस मामले में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें एनकाउंटर की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है.
याचिका में कहा गया है कि एनकाउंटर से पहले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें भरत तिवारी अपने हाथ में पिस्तौल लिए दिखाई दे रहे हैं. याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि अगर वह वाकई हथियारबंद था तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया या हथियार जब्त क्यों नहीं किया.
भरत तिवारी के परिवार वालों ने भी इस एनकाउंटर को फर्जी बताया है. उनका दावा है कि भरत ने सरेंडर कर दिया था.
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...क्या पुलिस ऐसे एनकाउंटर कर सकती है?
अक्सर जब भी एनकाउंटर होता है, तब पुलिस की ओर से यही कहा जाता है कि सामने वाला अपराधी गोलीबारी कर रहा था, जिसके जवाब में उन्हें भी गोली चलानी पड़ी. इस मामले में भी पुलिस का यही कहना है कि भरत तिवारी ने 10 से 12 गोलियां चलाई थीं.
खैर, पुलिस को गोली चलाने का अधिकार सिर्फ दो हालात में ही मिला है. पहला- सेल्फ डिफेंस यानी आत्मरक्षा. और दूसरा- अगर कोई अपराधी गिरफ्तारी से बचने की कोशिश करता है.
23 मार्च 1997 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के तत्कालीन अध्यक्ष जस्टिस एमएन वेंकटचलैया ने एक नोट भेजा था, जिसमें लिखा था- 'कानून के तहत पुलिस को किसी दूसरे व्यक्ति की जान लेने का अधिकार नहीं दिया गया है. अगर पुलिसकर्मी किसी व्यक्ति की जान ले लेता है तो वह गैर-इरादतन हत्या का अपराध है.'
उन्होंने अपने नोट में लिखा था, 'अगर मौत सेल्फ डिफेंस में होती है तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा.' उन्होंने अपने नोट में क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 46 के प्रावधानों का जिक्र किया था. ये प्रावधान अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 43 में है. इस धारा के मुताबिक, पुलिस गिरफ्तारी के लिए बल का प्रयोग कर सकती है. हालांकि, पुलिस की ऐसी कार्रवाई में किसी ऐसी व्यक्ति की जान नहीं जानी चाहिए, जिसमें आजीवन कारावास या मौत की सजा के प्रावधान वाला अपराध न किया हो.
जस्टिस वेंकटचलैया ने अपने नोट में लिखा था- 'किसी मामले में एनकाउंटर में हुई मौत इन दो शर्तों में से किसी एक के तहत सही थी या नहीं, इसका पता सिर्फ सही जांच से लगाया जा सकता है और किसी और दूसरे तरीके से नहीं.'
इसके अलावा, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 38 किसी व्यक्ति को आत्मरक्षा में किसी व्यक्ति की जान लेने को अपराध नहीं मानती. हालांकि, इस धारा में 7 परिस्थितियां बताई गईं हैं, जिनके तहत किसी की जान लेना आत्मरक्षा के दायरे में आती है.
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एनकाउंटर पर क्या कहते हैं आंकड़े?
पुलिस एनकाउंटर में होने वाली मौतों का रिकॉर्ड राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के पास होता है. NHRC के पास 2023-24 तक का डेटा है. इसके मुताबिक, 2023-24 में देशभर में पुलिस एनकाउंटर में 105 लोगों की मौत हो गई थी. इससे पहले 2022-23 में 125 और 2021-22 में 159 लोगों की जान गई थी.
इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2023-24 में पुलिस एनकाउंटर में सबसे ज्यादा 30 मौतें छत्तीसगढ़ में हुई थीं. हालांकि, इसकी एक वजह नक्सलियों का एनकाउंटर भी था. इसके बाद उत्तर प्रदेश में 15 मौतें हुई थीं. वहीं, बिहार में 5 लोगों की मौत एनकाउंटर में हुई थी.

2025 में कॉमन कॉज की एक रिपोर्ट आई थी. इसमें बताया गया था कि देशभर के 22% पुलिस वाले 'खतरनाक अपराधी' के एनकाउंटर को जायज ठहराते हैं. उनका मानना है कि अच्छे समाज के लिए ट्रायल के बजाय एनकाउंटर कभी-कभी सही होता है.
हैरान करने वाली बात ये है कि बिहार इस मामले में पहले नंबर पर है, जिसके पुलिस वाले एनकाउंटर को सही ठहराते हैं. बिहार के 41% पुलिस वाले एनकाउंटर को सही मानते हैं. इसका मतलब हुआ कि बिहार में हर 10 में से 4 पुलिस वाले एनकाउंटर को जायज ठहराते हैं. वहीं, केरल के सिर्फ 5% और उत्तर प्रदेश के 6% पुलिस वाले ही एनकाउंटर को सही मानते हैं.
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