विज्ञापन

BRICS 2026 के बाद, भारत के लिए असली चुनौती पश्चिम के साथ संतुलन बनाना

भारत को पश्चिमी देशों की पूंजी और तकनीक की उतनी ही जरूरत है जितनी पश्चिमी देशों को भारत की एक मैन्युफैक्चरिंग बेस और रणनीतिक साझेदार के तौर पर. यह आपसी निर्भरता है, न कि भारत का जूनियर पार्टनर बनना.

BRICS 2026 के बाद, भारत के लिए असली चुनौती पश्चिम के साथ संतुलन बनाना
भारत के लिए ब्रिक्स के साथ पश्चिमी देशों को भी साधे रखना जरूरी है.
  • भारत के लिए ब्रिक्स के साथ पश्चिमी देशों के साथ तालमेल बनाए रखना बहुत जरूरी है
  • अमेरिका और पश्चिमी देशों की तकनीक और मार्केट की भारत को बहुत जरूरत है
  • अमेरिका और पश्चिमी देशों को भारत की जरूरत इसलिए है क्योंकि भारत ही दुनिया की फैक्टरी बनने का माद्दा रखता है

भारत की BRICS अध्यक्षता ने नई दिल्ली को एक सफल समिट से भी कुछ बेहतर दिया है. इसने नई दिल्ली को आगे बढ़ने की गुंजाइश दी है. साथ ही एक सवाल भी. सवाल यह कि नई दिल्ली अब उस सद्भावना का क्या करती है जो उसने ब्रिक्स में अभी-अभी बनाई है. उसे यह साबित करना होगा कि BRICS में मजबूत स्थिति हासिल करने का मतलब वॉशिंगटन और ब्रसेल्स के साथ रिश्तों की कीमत चुकाना नहीं है.

भारत ने असल में क्या हासिल किया?

भारत ने बहुत अलग-अलग हितों वाले 11 देशों को एक ही दस्तावेज पर साइन करने के लिए राजी कर लिया. नई दिल्ली ने ब्रिक्स (BRICS) के अंदरूनी झगड़ों को सुलझाया नहीं, बल्कि बस उन्हें शिखर सम्मेलन को नाकाम करने से रोके रखा. इसके बाद UN वाला पहलू आता है. घोषणा-पत्र में सुरक्षा परिषद में सुधार और विकासशील देशों की बड़ी भूमिका का समर्थन किया गया, और रूस व चीन दोनों ने भारत को स्थायी सीट दिलाने के लिए अपना समर्थन फिर से दोहराया. 

समिट में 'ब्रिक्स इकोनॉमिक पार्टनरशिप स्ट्रैटेजी 2030' को मंजूरी दी गई और इसे आगे बढ़ाने के लिए भारत की अध्यक्षता की खास तौर पर तारीफ की गई. यह सदस्यों के बीच व्यापार और निवेश के लिए एक मास्टर प्लान है, जिसके तहत आगे और भी खास रोडमैप तैयार किए जाएंगे. घोषणापत्र में मज़बूत और विविध सप्लाई चेन बनाने और हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की बड़ी भूमिका पर भी ज़ोर दिया गया, जो भारत के 'मेक इन इंडिया' के लक्ष्यों से पूरी तरह मेल खाता है.

पेमेंट्स की कहानी सच है

समिट का सबसे संवेदनशील और शायद सबसे ज्यादा गलत समझा गया हिस्सा फाइनेंस से जुड़ा था. घोषणापत्र में क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स पर 'ब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स' के काम का ज़िक्र किया गया और डॉलर के बजाय लोकल करेंसी में व्यापार करने में बढ़ती दिलचस्पी को भी नोट किया गया. इसमें यह भी साफ तौर पर माना गया कि यह सब कैसे होगा, इसके लिए कोई एक तय फ़ॉर्मूला नहीं है.

यह वह हिस्सा है जिसे पश्चिमी देश सबसे ध्यान से पढ़ेंगे. ब्रिक्स देशों ने पश्चिमी फाइनेंशियल सिस्टम और प्रतिबंधों पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश में कई साल बिताए हैं. इस समिट ने इस दिशा में एक और कदम बढ़ाया है. लेकिन किसी को भी इसे ब्रिक्स करेंसी की शुरुआत या डॉलर के लिए कोई गंभीर खतरा नहीं समझना चाहिए. ऐसा कुछ नहीं हुआ है. असल में जो हो रहा है, वह धीमी गति से और बिना किसी बड़े हंगामे के हो रहा है: देश यह देख रहे हैं कि क्या उनके पेमेंट सिस्टम एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं, और वे लोकल करेंसी में व्यापार करने के तरीके आजमा रहे हैं.

इस मामले में भारत के पास एक मज़बूत दांव है. 'फाइनेंशियल टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले डेढ़ साल में UPI और ब्राज़ील के Pix ने मिलकर 10 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का ट्रांज़ेक्शन किया है, और अब दोनों देश इन सिस्टम्स को आपस में जोड़ने पर बात कर रहे हैं. यह सिर्फ़ चर्चा की बात नहीं है. यह ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर है जिसे भारत असल में दूसरे देशों को दे सकता है, बजाय इसके कि वह सिर्फ़ डॉलर के बारे में शिकायत करता रहे. नई दिल्ली डॉलर सिस्टम को खत्म करने की कोशिश नहीं कर रही है. वह बस यह नहीं चाहती कि भारतीय व्यापार पर किसी प्रतिबंध (sanction) की वजह से रोक लग जाए. यह रिस्क मैनेजमेंट है, कोई क्रांति नहीं.

मिनरल्स और चीन की समस्या

एनर्जी सिक्योरिटी और जरूरी मिनरल्स पर भी गंभीरता से ध्यान दिया गया — जैसे स्थिर एनर्जी मार्केट, मज़बूत इंफ्रास्ट्रक्चर, और बैटरी व इलेक्ट्रॉनिक्स में इस्तेमाल होने वाले मटीरियल पर सहयोग. हो सकता है कि समिट से निकली बाकी सभी बातों से ज्यादा अहमियत इसी बात की हो. जैसे-जैसे दुनिया EV और रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ रही है, लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ मिनरल्स की होड़ और तेज होती जा रही है, और अभी इस सप्लाई चेन के एक बड़े हिस्से पर चीन का कब्जा है. BRICS भारत को चीन के दायरे से बाहर के ऐसे देशों के साथ संबंध बनाने का मौका देता है जिनके पास ये संसाधन भरपूर मात्रा में हैं.

और बात यह है कि इससे भारत और पश्चिमी देशों के बीच कोई टकराव नहीं होगा. अमेरिका, EU, जापान और ऑस्ट्रेलिया भी ठीक इसी तरह अपने सप्लाई सोर्स में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं. भारत BRICS के मिनरल उत्पादक देशों और उन पश्चिमी मैन्युफैक्चरर्स के बीच एक अहम कड़ी बन सकता है जिन्हें इन मटीरियल की जरूरत है. यह वाकई एक बहुत फायदेमंद स्थिति है.

टेक्नोलॉजी में सहयोग की सीमाएं

इस घोषणा में साइंस और टेक्नोलॉजी में सहयोग (जैसे क्वांटम कंप्यूटिंग) पर भी बात हुई और एक साझा BRICS रिसर्च रिपॉजिटरी बनाने का प्रस्ताव रखा गया. यह भारत की विदेश नीति की सामान्य दिशा के अनुरूप है. अगले दशक में किसके पास ताकत होगी, यह सिर्फ़ डिप्लोमेसी से नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी से तय होगा, और भारत हर खेमे में अपनी जगह बनाना चाहता है. लेकिन हमें इसकी सीमाओं के बारे में भी ईमानदार रहना होगा. भारत सिर्फ़ BRICS के ज़रिए कोई बड़ा AI या सेमीकंडक्टर उद्योग नहीं खड़ा कर सकता. इसके लिए जरूरी पूंजी, रिसर्च नेटवर्क और चिप बनाने की विशेषज्ञता—इनमें से ज़्यादातर चीज़ें अभी भी अमेरिका, यूरोप और जापान के पास हैं. BRICS से विकल्प तो मिलते हैं, लेकिन यह उन चीज़ों की जगह नहीं ले सकता जिनकी भारत को पश्चिम से जरूरत है.

छोटी-छोटी बातें भी मायने रखती हैं

इस समिट में सब कुछ बड़ी रणनीतियों के बारे में नहीं था. भारत ने रीजेनरेटिव और डिजिटल खेती में सहयोग को बढ़ावा दिया और सस्टेनेबल शहरों पर रिसर्च के लिए एक BRICS नेटवर्क बनाने में मदद की. ये बातें भले ही सुर्खियां न बटोरें, लेकिन एक खास वजह से ये मायने रखती हैं. 'ग्लोबल साउथ' में भारत की विश्वसनीयता वैश्विक संस्थाओं में सुधार के भाषणों से नहीं बनेगी. यह इस बात से बनेगी कि क्या भारत असल में खाद्य सुरक्षा और शहरी नियोजन जैसी चीजों में मदद कर सकता है. नई दिल्ली BRICS को ऐसे तरीकों से उपयोगी बनाने की कोशिश कर रही है जिन्हें लोग महसूस कर सकें, न कि सिर्फ़ उनके बारे में पढ़ सकें.

जो नहीं हुआ, वह भी मायने रखता है

शायद इस समिट की सबसे अहम बात वह है जो इसमें नहीं हुआ. कोई मिलिट्री अलायंस नहीं. कोई साझा करेंसी नहीं. पश्चिम के खिलाफ कोई औपचारिक गुट नहीं. रूस, चीन, ईरान या खाड़ी देशों को लेकर गहरे मतभेदों का कोई समाधान नहीं. यह भारत के लिए अच्छा है, बुरा नहीं. अगर BRICS बहुत मजबूती से जुड़ा हुआ और खुलकर पश्चिम-विरोधी होता, तो नई दिल्ली को किसी एक पक्ष को चुनना पड़ता, जो वह बिल्कुल नहीं चाहती. एक ढीला-ढाला BRICS भारत को आजादी से काम करने देता है. इस समिट ने साफ कर दिया कि यह ग्रुप क्या कर सकता है (बड़े आर्थिक सिद्धांतों पर सहमत होना) और क्या नहीं कर सकता (NATO या EU की तरह काम करना). भारत के लिए यही ढीलापन सबसे जरूरी बात है.

अब मुश्किल हिस्से की बात

असली परीक्षा यह नहीं है कि भारत BRICS की तरफ झुकेगा या पश्चिम की तरफ. असली परीक्षा यह है कि क्या भारत दोनों रिश्तों को एक साथ निभा सकता है, बिना किसी पक्ष को यह महसूस कराए कि उन्हें कमतर आंका गया है. उम्मीद है कि भारत हर रिश्ते को अपनी शर्तों पर आगे बढ़ाएगा: अमेरिका के साथ टेक्नोलॉजी और डिफेंस, यूरोप के साथ व्यापार और क्लीन एनर्जी, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सप्लाई चेन, रूस के साथ एनर्जी और डिफेंस का सिलसिला, खाड़ी देशों के साथ निवेश; और साथ ही BRICS का इस्तेमाल विकासशील देशों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए करेगा. इनमें से कोई भी बात एक-दूसरे के खिलाफ नहीं है. यह भारत का अपने दांव को अलग-अलग जगह लगाना है, ठीक वैसे ही जैसे कोई इन्वेस्टर अपना सारा पैसा एक ही स्टॉक में नहीं लगाता.

चीन अभी भी एक मुश्किल चुनौती है

सबसे बड़ी मुश्किल चीन है, जिसका BRICS में बहुत ज्यादा असर है और 2027 में वह इसकी अध्यक्षता संभालेगा. इससे बीजिंग को यह तय करने में काफ़ी असर मिलता है कि यह ग्रुप आगे किस दिशा में बढ़ेगा. भारत को यह पक्का करना होगा कि BRICS चुपचाप चीन की आर्थिक प्राथमिकताओं का विस्तार न बन जाए, और साथ ही बीजिंग के साथ इस ग्रुप को लड़ाई का मैदान भी न बनाए, क्योंकि इससे वह लचीलापन खत्म हो जाएगा जिसकी वजह से BRICS में शामिल होना फायदेमंद है. अपनाई जाने वाली संभावित रणनीति: जहां हित मिलते हों वहाँ चीन के साथ मिलकर काम करना, जहां हित न मिलते हों वहां विरोध करना, और अमेरिका, जापान, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया का साथ लेना ताकि चीन अकेले बाकी सभी पर हावी न हो सके.

सिर्फ घोषणाओं से फैक्टरी नहीं बनतीं

भारत को इस जाल से बचना चाहिए: कूटनीतिक सफलता को असल ताकत समझ लेना. 11 देशों से किसी चीज पर दस्तखत करवाना वाकई मुश्किल काम है. लेकिन सिर्फ घोषणा करने से सेमीकंडक्टर प्लांट या बंदरगाह नहीं बनता. इससे न तो रक्षा तकनीक बनती है और न ही एक टन लिथियम की गारंटी मिलती है. 2030 की आर्थिक रणनीति तभी मायने रखती है जब व्यापार के आँकड़े असल में बढ़ें. पेमेंट सिस्टम तभी काम का है जब बिज़नेस उसका इस्तेमाल शुरू करें. मिनरल सहयोग तभी मायने रखता है जब वह असल सप्लाई चेन में बदले. ग्लोबल भूमिका के लिए भारत की कोशिश तभी मायने रखती है जब समिट खत्म होने के बाद भी दूसरे देश उसका समर्थन करते रहें.

यहीं पर पश्चिमी देशों की भूमिका अहम हो जाती है. भारत को पश्चिमी देशों की पूंजी और तकनीक की उतनी ही जरूरत है जितनी पश्चिमी देशों को भारत की एक मैन्युफैक्चरिंग बेस और रणनीतिक साझेदार के तौर पर. यह आपसी निर्भरता है, न कि भारत का जूनियर पार्टनर बनना. नई दिल्ली ठीक इसी तरह का संतुलन बनाना चाहती है.

गुटनिरपेक्षता से आगे कुछ ठोस की ओर

इन सभी बातों को एक साथ देखें तो तर्क बिल्कुल साफ है. सिस्टम को खत्म करने के बजाय उसमें सुधार करें. डॉलर को छोड़ने के बजाय उसके विकल्प बनाएं. किसी अमेरिका-विरोधी गुट में शामिल हुए बिना अमेरिकी दबाव से थोड़ी राहत पाएं. रूस के साथ करीबी रिश्ते बनाए रखें, लेकिन उसे ही एकमात्र अहम रिश्ता न बनने दें. बिना झगड़ा मोल लिए चीन के दबदबे को रोकने के लिए काफी ताकत बनाएं. ब्रिक्स को किसी विचारधारा के बजाय भारत के हितों को साधने का एक जरिया बनाएं.

यह पुरानी गुटनिरपेक्षता से एक कदम आगे की सोच है, जो मुख्य रूप से गुटों से दूर रहने के बारे में थी. यह एक साथ कई मजबूत रिश्ते बनाए रखने और जान-बूझकर विकल्प तैयार करने के बारे में है, ताकि कोई भी एक देश भारत पर बहुत ज्यादा दबाव न डाल सके.

यह भी पढ़ें-

कम कपड़ों में खेलों वाला विज्ञापन, स्पोर्ट्स बेटिंग कंपनी के एड पर भड़के ओलंपिक एथलीट

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
BRICS, India, Europe, America
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com