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This Article is From Apr 24, 2023

समलैंगिक विवाह को मान्‍यता देने के विरोध में BCI, सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध - विधायिका पर छोड़ें फैसला

BCI के अनुसार, अधिकांश आबादी का मानना है कि याचिकाकर्ताओं के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का कोई भी फैसला देश की सामाजिक-धार्मिक और सांस्कृतिक संरचना के खिलाफ होगा. 

देश भर के बार काउंसिल भी समलैंगिक विवाह के विचार के विरोध में हैं. (फाइल)
नई दिल्‍ली:

समलैंगिक विवाह (Same Sex Marriage) मामले को मान्‍यता देने की याचिकाओं का बार काउंसिल ऑफ इंडिया (Bar Council of India) ने विरोध करने का प्रस्‍ताव पारित किया है. साथ ही बार काउंसिल ने अपना अनुरोध सुप्रीम कोर्ट को भेजा है. बार काउंसिल ने कहा कि यह 'अत्‍यधिक संवेदनशील' और 'सामाजिक, आर्थिक और सांस्‍कृतिक' असर वाला मुद्दा है. इसलिए इस पर व्‍यापक प्रसार-परामर्श की आवश्‍यकता है. इसलिए यह काम विधायिका पर छोड़ा जाना चाहिए. 

बार काउंसिल ने कहा कि मानव सभ्यता और संस्कृति की स्थापना के बाद से विवाह को आमतौर पर स्वीकार किया गया है और प्रजनन और मनोरंजन के दोहरे उद्देश्य के लिए जैविक पुरुष और महिला के मिलन के रूप में वर्गीकृत किया गया है. बार काउंसिल ने कहा कि यह "विनाशकारी" होगा और ऐसे संवेदनशील मुद्दों से निपटने के लिए सबसे उपयुक्त विधायिका ही है. 

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कहा है कि देश के 99.9% से अधिक लोग समलैंगिक विवाह के विचार का विरोध करते हैं. BCI के अनुसार, अधिकांश आबादी का मानना है कि याचिकाकर्ताओं के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का कोई भी फैसला देश की सामाजिक-धार्मिक और सांस्कृतिक संरचना के खिलाफ होगा. 

देश भर के बार काउंसिल भी समलैंगिक विवाह के विचार के विरोध में हैं. बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी भारतीय विधिज्ञ परिषद की ओर से सभी राज्यों की विधिज्ञ परिषद की संयुक्त बैठक में इस बाबत प्रस्ताव पारित कर सुप्रीम कोर्ट को भेजा गया है. इसमें समलैंगिक विवाह को लेकर विधिज्ञ परिषद की चिंताओं से कोर्ट को अवगत कराया गया है. 

इसके साथ ही वकीलों और उनके परिजनों को संकट की स्थिति में मुआवजा और संरक्षण के लिए कानून की जरूरत का प्रस्ताव पारित किया गया. बैठक में सभी राज्यों के बार काउंसिल के प्रतिनिधि मौजूद थे. 

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने सभी राज्य परिषदों के साथ पारित अपने प्रस्ताव में कहा है कि इस बैठक में सर्वसम्मत राय यह बनी है कि समलैंगिक विवाह के मुद्दे की संवेदनशीलता के मद्देनजर विविध सामाजिक-धार्मिक पृष्ठभूमि के हितधारकों के एक स्पेक्ट्रम को ध्यान में रखते हुए यह सलाह दी जाती है कि सक्षम विधायिका इन विभिन्न सामाजिक, धार्मिक समूहों के साथ विस्तृत परामर्श प्रक्रिया के बाद निर्णय ले. 

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि देश के सामाजिक-धार्मिक ढांचे को देखते हुए हमने सोचा कि यह समलैंगिक विवाह का विचार हमारी संस्कृति के खिलाफ है. इस तरह के फैसले अदालतों द्वारा नहीं लिए जाएं और इस तरह के कदम कानून की प्रक्रिया से आने चाहिए. 

भारतीय विधिज्ञ परिषद यानी बार काउंसिल ऑफ इंडिया अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 4 के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है. यह निकाय भारत में कानूनी अभ्यास यानी लॉ प्रैक्टिस और कानूनी शिक्षा लॉ एजुकेशन को नियंत्रित और नियमित करती है. देश भर के बार एसोसिएशन के वकील इसके सदस्यों का चुनाव करते हैं. सभी सदस्य फिर अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों का चुनाव करते हैं. इस तरह यह परिषद भारतीय बार का प्रतिनिधित्व करती हैं. 

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की अपील करते हुए LGBTQ+ समुदाय के मौलिक अधिकारों को लागू करने की मांग वाली याचिका पर मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली पांच जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है. पीठ ने गुरुवार को घोषणा की थी कि याचिका पर अयोध्या मामले की तरह ही हफ्ते में पांचों दिन यानी सोमवार से शुक्रवार तक सुनवाई कर इसे प्राथमिकता के आधार पर निपटाएंगे. इसके लिए नए मामलों की सुनवाई के लिए अदालत साढ़े दस बजे की बजाय साढ़े नौ बजे से ही कामकाज शुरू कर देगी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों जिनमें से एक इस संविधान पीठ के सदस्य भी हैं, उनके कोविड संक्रमित हो जाने की वजह से सर्वोच्च अदालत में इस याचिका पर सोमवार को सुनवाई नहीं हो पाएगी. 

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