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बालासाहेब की विरासत- क्या ठाकरे परिवार का राजनीतिक अवसान 'हिंदू हृदय सम्राट' ने पहले ही देख लिया था?

100 साल पहले धरती पर आए इस शख्स ने मुंबई की राजनीति पर अपनी अमिट छाप छोड़ी. 'हिंदू हृदय सम्राट' कहलाए और शिवसेना को स्थापित कर हिंदुत्व की राजनीति की, पर छह दशक बाद बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत अपना अस्तित्व तलाशने की जद्दोजहद में जुटी है.

बालासाहेब की विरासत- क्या ठाकरे परिवार का राजनीतिक अवसान 'हिंदू हृदय सम्राट' ने पहले ही देख लिया था?
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  • बालासाहेब ठाकरे ने कभी कहा था, “मेरे बाद शिवसेना का क्या होगा, यह समय तय करेगा.”
  • बीते दशक के राजनीतिक बदलावों और गठबंधन राजनीति के बीच विभाजित हो चुकी पार्टी का प्रभुत्व कम हो चला है.
  • ठाकरे ब्रांड फीका पड़ रहा, अब 2029 के चुनाव बताएंगे कि बालासाहेब की विरासत को जनता कैसे देखना चाहती है.
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मुंबई की सड़कों से लेकर महाराष्ट्र की राजनीति तक, अगर किसी एक नाम ने सबसे गहरी छाप छोड़ी है, तो वो हैं बालासाहेब ठाकरे. बालासाहेब ठाकरे का जन्म 23 जनवरी 1926 को महाराष्ट्र के पुणे में और निधन 17 नवंबर 2012 को मुंबई में हुआ. वो एक पत्रकार, कार्टूनिस्ट और राजनीतिज्ञ थे. 19 जून 1966 को उन्होंने शिवसेना बनाई थी. एक ऐसी पार्टी जो मराठी मानुष के हक, सम्मान और पहचान की लड़ाई का प्रतीक बनी. बाद के वर्षों में शिवसेना ने हिंदुत्व की राजनीति को अपनाया और बालासाहेब ठाकरे 'हिंदू हृदय सम्राट' कहे जाने लगे और उनकी पार्टी महाराष्ट्र की राजनीति में एक प्रमुख शक्ति बन गई.

बालासाहेब ठाकरे ने 1950 के दशक की शुरुआत में मुंबई की एक पत्रिका के कार्टूनिस्ट के रूप में अपने पेशेवर करियर की शुरुआत की. उनके कार्टून जापान की 'आसाही शिंबुन' और न्यूयॉर्क टाइम्स के रविवार संस्करण जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुए. समय के साथ, उनकी गहरी राजनीतिक समझ ने उन्हें सक्रिय राजनीति की ओर आकर्षित किया.

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60 के दशक में, ठाकरे ने अपने भाई के साथ मिलकर मराठी भाषा में एक साप्ताहिक पत्रिका 'मार्मिक' शुरू की. इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने 'बाहरी लोगों' के बढ़ते प्रभाव की कड़ी आलोचना की, विशेष रूप से दक्षिण भारत और गुजरात से आए प्रवासियों की, जिनके बारे में उनका मानना ​​था कि वे स्थानीय मराठियों को रोजगार के अवसरों से वंचित कर रहे हैं. इसी भावना ने 1966 में शिवसेना के गठन की नींव रखी.

बॉम्बे को मुंबई बनाया

किसी भी संवैधानिक पद पर न रहने और चुनाव न लड़ने के बावजूद, ठाकरे को कई दशकों तक महाराष्ट्र के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में से एक माना जाता था. उन्हें अक्सर 'महाराष्ट्र का जनक' कहा जाता तो उनके समर्थक उन्हें हिंदू हृदयसम्राट के रूप में पूजते थे. ठाकरे की शक्ति इतनी अधिक थी कि जब 1995 में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन की सरकार सत्ता में आई, तो उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि बॉम्बे का नाम बदलकर मुंबई कर दिया जाए, जो देवी मुंबादेवी के नाम पर रखा गया है. इसके बाद से यह शहर मराठी भाषा में जाना जाता है. 

PM मोदी ने बालासाहेब ठाकरे के लिए क्या कहा?

बालासाहेब ठाकरे को याद करते हुए उनकी जन्म शताब्दी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि महाराष्ट्र की प्रगति में बालासाहेब ठाकरे का नजरिया पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा. उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, प्रभावशाली भाषण कला और अडिग विचारधारा के लिए जाने जाने वाले बालासाहेब ठाकरे का जनता के साथ एक अनूठा रिश्ता था. राजनीति के अलावा, उन्हें संस्कृति, साहित्य और पत्रकारिता में गहरी रुचि थी. कार्टूनिस्ट के रूप में उनका करियर समाज के प्रति उनके गहन अवलोकन और विभिन्न मुद्दों पर उनकी निडर टिप्पणी को दर्शाता है."

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मराठी अस्मिता से हिंदुत्व तक का सफर

शिवसेना की शुरुआत क्षेत्रीय अस्मिता से हुई थी. बालासाहेब का नारा साफ था- 'पहले मराठी मानुष.' उन्होंने उत्तर भारतीय प्रवासियों के खिलाफ आंदोलन किए, मुंबई में मराठी युवाओं के लिए नौकरियों की मांग उठाई और एक सांस्कृतिक आंदोलन को राजनीतिक ताकत में बदल दिया. 1990 के दशक में पार्टी ने खुलकर हिंदुत्व की राजनीति को अपनाया. बाबरी मस्जिद आंदोलन के दौर में शिवसेना बीजेपी की सबसे आक्रामक सहयोगियों में से एक बनकर उभरी. 1995 में पहली बार शिवसेना-बीजेपी सरकार बनी और मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने. यही वो दौर था जब शिवसेना सिर्फ मुंबई नहीं, पूरे महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी बन गई.

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विद्रोह हुए, मनमुटाव हुआ और शुरू हुआ ढलान

शिवसेना जैसे जैसे बढ़ती गई अंदरुणी खटपट भी उतने ही चलते रहे. खुद बालासाहेब ठाकरे के जीवित रहते उनके भतीजे राज ठाकरे उन्हें छोड़ कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन कर लिया. तो उनसे पहले छगन भुजबल और नारायण राणे जैसे पार्टी के मजबूत कंधे भी बगावत कर अलग हुए. बगावत तो कई हुए पर पार्टी की कमान ठाकरे परिवार के हाथ में ही रही. यहां तक कि बीजेपी के साथ गठबंधन में भी चुनावों के दौरान शिवसेना हमेशा बड़ी पार्टी के रूप में उभरती रही. जब 2012 में बालासाहेब के निधन के बाद पार्टी की बागडोर उनके बेटे उद्धव ठाकरे के हाथ आई तो शुरू में उन्हें हल्का नेता माना गया. 

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बड़े भाई से छोटे भाई बनने की राजनीति

इस बीच 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी. यह पहला मौका था जब महाराष्ट्र में भी बीजेपी ने शिवसेना से अधिक सीटें जीतीं. पर उसी साल हुए विधानसभा चुनाव में 160 सीटों पर अड़े रहे उद्धव ने बीजेपी की 130 सीटों की मांग को ठुकरा दिया और फिर दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ीं. यह पिछले दो दशकों में पहला मौका था जब शिवसेना और बीजेपी चुनाव में साथ नहीं थीं. नतीजे आए तो बीजेपी को 122 सीटें मिलीं, शिवसेना 63 सीटें ही पा सकी. बड़े भाई, छोटे भाई का फासला अब बहुत बढ़ गया था. पर चुनावी नतीजे में बीजेपी बहुमत से 22 सीटें पीछे रह गई तो शरद पवार की एनसीपी ने बाहर से समर्थन देकर सरकार का गठन करवाया. तब एकनाथ शिंदे विधानसभा में विपक्ष के नेता थे. दो महीने बाद ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया और उद्धव ने सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया.  पर बीजेपी और शिवसेना के बीच दरार पड़ चुकी थी. कुछ समय बाद ही उद्धव ने बीजेपी की आलोचना करना शुरू कर दिया था.

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बालासाहेब की विचारधारा से अलगाव

जैसे तैसे गठबंधन का कारवां 2019 के विधानसभा चुनाव तक आ पहुंचा. तब 288 सीटों में से 102 बीजेपी जीती, शिवसेना 56 तो एनसीपी ने 54 सीटें हासिल किए. वहीं कांग्रेस के पास 44 सीटें आईं. शिवसेना मुख्यमंत्री का पद चाहती थी लेकिन बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होने की वजह से यह पद अपने पास रखना चाहती थी. इसी बीच शिवसेना को एनसीपी की तरफ से एक न्योता मिला कि अगर वो चाहे तो एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना सकती है. फिर क्या था विपरीत विचारधारा होने के बावजूद उद्धव ठाकरे ने गठबंधन राजनीति की सभी मर्यादाओं को लांघते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और यह धारणा तोड़ने की कोशिश की कि उन्हें राजनीति नहीं आती है. पर यही निर्णय बाद के वर्षों में उनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई. यह कदम शिवसेना के इतिहास में सबसे बड़ा वैचारिक मोड़ था- हिंदुत्व की राजनीति करने वाली पार्टी सेक्युलर दलों के साथ सत्ता में थी. समर्थकों का एक वर्ग इसे व्यावहारिक राजनीति मानता है, तो दूसरा इसे बालासाहेब की विचारधारा से पूरी तरह से अलगाव वाला.

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एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे

एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे
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एकनाथ शिंदे भूचाल लेकर आए

2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के विधायकों के बड़े समूह के साथ बगावत कर दी. बीजेपी के समर्थन से वे मुख्यमंत्री बन गए और उद्धव ठाकरे को इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद चुनाव आयोग ने शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न शिंदे गुट को सौंप दिया. यहां से लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं रही, बल् यह लड़ाई बालासाहेब ठाकरे की विरासत की बन गई कि असली शिवसेना कौन है?
जानकार मानते हैं कि "शिवसेना के विरासत की यह लड़ाई तब कभी नहीं होती जब खुद बालासाहेब ठाकरे थे. वो एक करिश्माई नेता थे जिनके फैसले अंतिम हुआ करते थे और उन फैसलों को लेकर बहस की गुंजाइश बहुत कम होती थी. उनके व्यक्तित्व के बिना आज शिवसेना अपनी पहचान ढूंढ रही है."

ठाकरे ब्रांड का राजनीतिक अवसान

शिवसेना की टूट ने महाराष्ट्र की राजनीति का पूरा संतुलन बदल दिया. आज अपनी पहचान ढूंढने की जद्दोजहद में शिवसेना (उद्धव) 20 साल बाद अपने चचेरे भाई राज ठाकरे की पार्टी के साथ गठबंधन करते हुए और मराठी अस्मिता की दुहाई देते हुए बीजेपी-शिंदे सरकार को चुनौती देने की कोशिश में महाराष्ट्र के निगम चुनाव में साथ उतरे. राजनीतिक विशेषज्ञों ने मुंबई के BMC चुनावों को ठाकरे परिवार की राजनीतिक विरासत की सबसे बड़ी परीक्षा माना. दोनों भाइयों ने मराठी वोटों को एकजुट करने की रणनीति अपनाई और यह उम्मीद जताई कि उनके गठबंधन से शिवसेना का गिरता प्रभाव रुक सकता है. लेकिन बीजेपी-एकनाथ शिंदे-नेतृत्व वाली शिवसेना ने 118 सीटें हासिल कर BMC पर ढाई दशक से चली आ रही ठाकरे परिवार के वर्चस्व को तोड़ दिया. उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने 65 सीटें तो राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) केवल 6 सीटों तक सीमित रही.

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क्या बालासाहेब ने पहले ही यह देख लिया था? 

महाराष्ट्र के राजनीतिक गढ़ मुंबई में यह पराजय साफ संकेत है कि ठाकरे ब्रांड फीका पड़ रहा है. बीते दशक के राजनीतिक बदलावों और गठबंधनों के बीच विभाजित हो चुके उनके मतदाताओं ने अब शायद मराठी पहचान की जगह विकास और कामकाज को अधिक अहमियत दी है. दोनों भाइयों ने कहा भी है कि वो आगे भी संघर्ष जारी रखेंगे पर ठाकरे परिवार का राजनीतिक प्रभुत्व और प्रभाव स्पष्ट रूप से कम हुआ है और कुल मिलाकर बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत आज एक जटिल स्थिति में है.

बालासाहेब ठाकरे ने कभी कहा था, “मेरे बाद शिवसेना का क्या होगा, यह समय तय करेगा.” शायद वही समय अब सामने है. उनकी विरासत सिर्फ एक नाम, एक चुनाव चिह्न या एक गुट नहीं है- बल्कि वह राजनीतिक शैली, भाषण की धार, और मराठी स्वाभिमान की आवाज है, जिसने दशकों तक मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति को दिशा दी.

अब 2029 के लोकसभा चुनाव और उसी साल के अंत में होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव यह बताएंगे कि राज्य की जनता बालासाहेब की राजनीतिक विरासत को किस रास्ते पर आगे बढ़ते देखना चाहती है.

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