- अयोध्या विधानसभा सीट का गठन 1967 में हुआ था और यह दक्षिणपंथी विचारधारा का गढ़ रही है
- लल्लू सिंह ने लगातार पांच चुनाव जीतकर इस सीट पर भाजपा का दबदबा बनाया था
- 2012 में समाजवादी पार्टी के पवन पांडेय ने लल्लू सिंह को हराकर राजनीतिक उलटफेर किया था
यूपी विधानसभा चुनाव में अभी कुछ महीने बाकी हैं, लेकिन अयोध्या की सीट फिलहाल चर्चा में है. अखिलेश यादव ने सीएम योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से लड़ने की चुनौती दी थी. इसको योगी आदित्यनाथ ने स्वीकार कर लिया, लेकिन उलटे अखिलेश यादव को ही चुनौती दी कि वह भी आ जाएं. आमना सामना हो जाए. इस पर अखिलेश यादव ने पहले तो यह कहा कि मेरी चुनौती नहीं बल्कि सलाह थी. इसके बाद बोले कि हमारा कोई भी पीडीए प्रहरी वहां से जीत हासिल कर लेगा. इस तरह अयोध्या विधानसभा सीट को लेकर माहौल गरमा गया है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि राम मंदिर वाली विधानसभा सीट का क्या इतिहास रहा है और यहां का समीकरण क्या कहता है.
अयोध्या विधानसभा सीट का गठन 1967 में हुआ था. इस सीट पर पहला चुनाव 1967 में हुआ, जिसमें बी. किशोर भारतीय जनसंघ के टिकट पर पहले विधायक निर्वाचित हुए. इस तरह यह सीट लंबे समय से दक्षिणपंथी विचारधारा वाले लोगों का गढ़ रही है. अयोध्या विधानसभा सीट पर सबसे लंबे समय तक भाजपा के लल्लू सिंह का दबदबा रहा. उन्होंने लगातार पांच चुनाव- 1991, 1993, 1996, 2002 और 2007 में जीत दर्ज कर रिकॉर्ड बनाया. इस सिलसिले पर साल 2012 में विराम लगा, जब समाजवादी पार्टी के पवन पांडेय ने लल्लू सिंह को हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया.
हालांकि 2017 और 2022 के चुनावों में भाजपा ने वापसी की और वेद प्रकाश गुप्ता लगातार दो बार विधायक चुने गए. लल्लू सिंह फिर सांसद बने थे, लेकिन 2024 में उस पर भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा. सपा ने इस बार यहां से उन्हीं तेज नारायण उर्फ पवन पांडेय को मैदान में उतारा है, जो यहां से 2012 में जीते थे. हालांकि 2017 और 2022 में वेदप्रकाश गुप्ता यहां से भाजपा के टिकट पर जीते हैं. भाजपा को यहां लगातार मिलने वाली बढ़त की वजह सामाजिक समीकरण भी हैं. यही कारण है कि 2012 में जब सपा यहां से जीती भी तो उसकी वजह पांडेय बने क्योंकि उनकी ब्राह्मण बिरादरी के यहां अच्छे खासे वोट हैं, जो भाजपा के समर्थक माने जाते हैं.
पवन पांडेय की जीत को लेकर माना गया था कि वह ब्राह्मणों के वोटों का एक हिस्सा अपनी तरफ लाने में सफल रहे हैं. अब यहां के समीकरणों की बात करें तो सबसे ज्यादा आबादी इस विधानसभा में ब्राह्मणों की है. यहां 45 हजार ब्राह्मण हैं. इसके अलावा 44 हजार मुसलमान और 42 हजार वैश्य समाज के लोग हैं. यादव यहां 36 हजार हैं तो वहीं लोनिया चौहान भी 33 हजार हैं. निषादों का आंकड़ा 24 हजार बताया जाता है, जबकि 22 हजार ठाकुर हैं. कुर्मी, कोरी, पासी, दलित और कायस्थ भी यहां अच्छी संख्या में हैं.
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