बिहार के मधुबनी जिले के एक सुदूर गांव में एक शांत दिखने वाली कार्रवाई ने सुरक्षा एजेंसियों के सामने ऐसे कथित नेटवर्क की तस्वीर रख दी है. जिसके तार कई राज्यों से होते हुए पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों तक जुड़े होने की आशंका जताई जा रही है. जांच एजेंसियों का मानना है कि यह नेटवर्क देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों को कट्टरपंथ की तरफ धकेलकर उन्हें संभावित 'लोन वुल्फ' हमलावरों में बदलने की कोशिश कर रहा था. सोमवार को मध्य प्रदेश एटीएस और बिहार एटीएस की यह संयुक्त कार्रवाई थी. जिसमें मौलाना इजहार-उल-हक को मधुबनी से गिरफ्तार किया गया.
मदरसे से जुड़ा था इजहार-उल-हक
मधुबनी के पंडौल थाना क्षेत्र के नौतोल सरिसबपाली गांव का निवासी इजहार एक स्थानीय मदरसे से जुड़ा हुआ है. जांच एजेंसियों के अनुसार यह गिरफ्तारी अब तक की सबसे महत्वपूर्ण गिरफ्तारी बनकर उभरी है. जांचकर्ताओं का दावा है कि इजहार केवल कथित नेटवर्क का एक सदस्य नहीं था. एटीएस सूत्रों के मुताबिक वह इस मॉड्यूल का 'अमीर' यानी वैचारिक मार्गदर्शक और संचालक था. उस पर आरोप है कि वह अलग-अलग राज्यों में लोगों की पहचान कर उन्हें कट्टरपंथी विचारधारा से जोड़ने, उनकी ब्रेनवॉशिंग करने और कथित तौर पर उन्हें 'लोन वुल्फ' हमलों के लिए तैयार करने का काम कर रहा था. अधिकारियों का दावा है कि इजहार विदेश में बैठे हैंडलरों के लगातार संपर्क में था. उस पर स्लीपर सेल को दोबारा संगठित करने और आर्थिक संसाधनों की व्यवस्था करने और नेटवर्क का विस्तार करने की जिम्मेदारी होने का आरोप है. खुफिया एजेंसियों को संदेह है कि वह लंबे समय से बेहद गोपनीय तरीके से यह गतिविधियां संचालित कर रहा था.
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भोपाल में होगी पूछताछ
इजहार की गिफ्तारी गिरफ्तारी बेहद गोपनीय तरीके से की गई है. हिरासत में लेने के तुरंत बाद स्थानीय अदालत ने उसे 72 घंटे की ट्रांजिट रिमांड पर मध्य प्रदेश एटीएस को सौंप दिया ताकि उसे आगे की पूछताछ के लिए भोपाल लाया जा सके. एटीएस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने NDTV को बताया कि इजहार-उल-हक से पूछताछ पूरे नेटवर्क को समझने में निर्णायक साबित हो सकती है. 'इजहार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह सीमांचल क्षेत्र से आता है. हम यह समझना चाहते हैं कि वह लोगों को किस तरह मोटिवेट करता था, संभावित लोगों की पहचान कैसे करता था, किस तरह के युवाओं को टारगेट करता था और धीरे-धीरे उन्हें इस नेटवर्क से कैसे जोड़ता था.'

पाकिस्तान-अफगानिस्तान से मिला संपर्क
जांच एजेंसियों का फोकस अब गिरफ्तार आरोपियों से मिले डिजिटल सबूतों पर भी है. शुरुआती जांच में जब्त मोबाइल फोन से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के नंबरों से संपर्क के संकेत मिले हैं. सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कथित नेटवर्क किस तरह संचालित हो रहा था, इसका संचालन कौन कर रहा था और इसमें कितने लोग शामिल थे. सूत्रों के अनुसार जांच में यह जानकारी भी सामने आई है कि नईम ने कथित तौर पर उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानों की तस्वीरें और वीडियो पाकिस्तान में बैठे संपर्कों को भेजे थे. इनका आदान-प्रदान का उद्देश्य क्या था, इसकी जांच की जा रही है.
भोपाल में फराज से हुई थी मुलाकात
एटीएस सूत्रों का दावा है कि पूरे मॉड्यूल को पाकिस्तान में बैठा एक हैंडलर निर्देशित कर रहा था. जांच एजेंसियों का मानना है कि वह देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद लोगों से ऑनलाइन संपर्क में रहता था और वैचारिक रूप से उन्हें कट्टरपंथ की ओर धकेलने का प्रयास करता था. सूत्रों के मुताबिक इस कथित नेटवर्क के अधिकांश सदस्य कभी आमने-सामने नहीं मिले थे. वे व्हाट्सऐप, टेलीग्राम और अन्य एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म के जरिए जुड़े हुए थे. हालांकि जांच में यह सामने आया है कि नईम एक-दो बार भोपाल आया था और उसने फराज से मुलाकात की थी. फराज के मोबाइल फोन की डिजिटल फॉरेंसिक जांच में भी कई महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं. एटीएस सूत्रों के अनुसार ऐसे संकेत मिले हैं कि वह विदेशी संपर्कों से बातचीत के लिए एक विशेष ऐप का इस्तेमाल करता था. जांच एजेंसियां अब उसके चैट रिकॉर्ड, कॉल डिटेल, फाइल ट्रांसफर और डिजिटल गतिविधियों की गहन पड़ताल कर रही हैं. जांचकर्ताओं का मानना है कि इजहार से पूछताछ उस नेटवर्क की परतें खोल सकती है, जिसकी पहली झलक पिछले सप्ताह भोपाल में सामने आई थी.
12 जून को गिरफ्तार हुआ था फराज
मामले की शुरुआत 12 जून को हुई, जब मध्य प्रदेश एटीएस ने पुराने भोपाल की तंग गलियों में एक बेहद गोपनीय ऑपरेशन चलाकर काजी कैंप इलाके में नन्हे बी की मस्जिद के पास से 35 साल के मोहम्मद फराज को गिरफ्तार किया था. सूत्रों के अनुसार कार्रवाई इतनी गुप्त थी कि स्थानीय पुलिस को भी गिरफ्तारी पूरी होने तक इसकी जानकारी नहीं थी. एक डॉक्टर के क्लीनिक में काम करने वाला फराज देखते ही देखते एक बड़े आतंकी जांच का केंद्र बन गया. एटीएस का आरोप है कि वह विदेश से भेजी जा रही कट्टरपंथी सामग्री पढ़ रहा था और एन्क्रिप्टेड ऑनलाइन चैनलों के माध्यम से तेजी से कट्टरपंथ की ओर बढ़ रहा था. उसके मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों की जांच में कथित जिहादी साहित्य और पीडीएफ दस्तावेज मिलने का दावा किया गया. इसके बाद एजेंसियों ने यह जांच शुरू की कि वह अकेले काम कर रहा था या किसी बड़े और संगठित नेटवर्क का हिस्सा था.

अफगानिस्तान जाने की तैयारी में था फराज
मामला तब और गंभीर हो गया जब जांच एजेंसियों को जानकारी मिली कि फराज कथित तौर पर विशेष प्रशिक्षण के लिए अफगानिस्तान जाने की तैयारी कर रहा था. जांच में यह भी सामने आया कि वह मार्शल आर्ट्स का प्रशिक्षण ले रहा था, जिससे एजेंसियों की चिंता और बढ़ गई.
राजस्थान-यूपी से हुई गिरफ्तारियां
फराज की गिरफ्तारी के अगले दिन एटीएस ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के नानौता क्षेत्र से 38 साल के नईम अब्दुल्ला कुरैशी को गिरफ्तार किया. एटीएस सूत्रों के अनुसार नईम और फराज ने देवबंद के एक मदरसे में साथ पढ़ाई की थी और नईम ने ही कथित तौर पर फराज को इस नेटवर्क से जोड़ा था. इसके बाद रविवार को राजस्थान पुलिस के सहयोग से राजस्थान-हरियाणा सीमा से लगे अलवर जिले से 34 वर्षीय मोहम्मद शाकिर मेव को गिरफ्तार किया गया. तीन गिरफ्तारियों के बाद जांच एजेंसियों को एक संगठित मॉड्यूल के संकेत मिलने लगे थे. लेकिन बिहार से इजहार-उल-हक की गिरफ्तारी ने इस आशंका को और मजबूत कर दिया कि पूरे नेटवर्क का संचालन एक तय नेतृत्व संरचना के तहत किया जा रहा था.
फराज को दिया था आतंकी का नाम
एटीएस सूत्रों के मुताबिक फराज को कथित तौर पर 'खालिद सैफुल्लाह' नाम दिया गया था. खालिद सैफुल्लाह पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा का वह आतंकी था, जिसका नाम भारत में हुए कई बड़े आतंकी हमलों से जोड़ा गया था. जांचकर्ताओं का मानना है कि यह नाम कथित तौर पर सदस्यों को प्रेरित करने और उन्हें वैचारिक रूप से प्रभावित करने के लिए दिया गया था. पूरी जांच में डिजिटल फॉरेंसिक सबसे अहम कड़ी बनकर उभरा है. अधिकारियों का दावा है कि आरोपियों के मोबाइल फोन से एन्क्रिप्टेड बातचीत, कट्टरपंथी प्रचार सामग्री और विदेश में मौजूद लोगों से संपर्क के संकेत मिले हैं. जांच एजेंसियां पाकिस्तान और अफगानिस्तान से जुड़े संभावित नंबरों और बंद ऑनलाइन समूहों की भी जांच कर रही हैं.

लोन वुल्फ पर कर रहा था काम
सूत्रों का दावा है कि कथित नेटवर्क के सदस्यों को आतंकी प्रशिक्षण शिविरों के वीडियो, हिंसक प्रचार सामग्री और सशस्त्र जिहाद को बढ़ावा देने वाली सामग्री दिखाई जाती थी. साथ ही भारतीय शहरों की तस्वीरें और वीडियो सीमा पार भेजे जाने के आरोपों की भी जांच की जा रही है. सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह मॉड्यूल कथित तौर पर 'लोन वुल्फ' मॉडल पर काम कर रहा था. इस मॉडल में किसी व्यक्ति को ऑनलाइन कट्टरपंथी बनाया जाता है, दूर बैठकर निर्देश दिए जाते हैं और फिर उसे अकेले हमला करने के लिए प्रेरित किया जाता है. यही वजह है कि ऐसे हमलों का पता लगाना बेहद कठिन माना जाता है.
फिलहाल जांच एजेंसियों के सामने तीन बड़े सवाल हैं. विदेश में बैठा वह हैंडलर कौन है जो पूरे नेटवर्क को निर्देश दे रहा था? इस कथित मॉड्यूल से कितने लोग जुड़े हुए थे? और सबसे अहम, क्या आरोपी केवल वैचारिक स्तर तक सीमित थे या किसी बड़ी साजिश को अंजाम देने के करीब पहुंच चुके थे?. अब इजहार-उल-हक को भोपाल लाकर लंबी पूछताछ की तैयारी है. सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस कथित पैन-इंडिया कट्टरपंथी नेटवर्क की असली तस्वीर सामने आ सकती है, जो अब तक चुपचाप और परछाइयों में काम कर रहा था.
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