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अवैध घुसपैठ, CAA, NRC; इस बार कितनी अलग होगी हिमंता सरकार 2.0, उम्मीदें और चुनौतियां दोनों हैं

CM Himanta Biswa Sarma Oath Today: असम सीएम से इस बार पहले से ज्यादा अपेक्षाएं जुड़ी हुई हैं. सीएम हिमंता के शब्दों में भी वह दिखता है जिसमें उन्होंने कहा कि सरकार का अगला चरण बड़े‑बड़े ऐलानों का नहीं, बल्कि पहले कार्यकाल में शुरू किए गए कामों को जमीन पर उतारने का होगा.

अवैध घुसपैठ, CAA, NRC; इस बार कितनी अलग होगी हिमंता सरकार 2.0, उम्मीदें और चुनौतियां दोनों हैं
assam cm oath ceremony
  • असम में बीजेपी ने प्रचंड जीत हासिल की है और हिमंता बिस्वा सरमा दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे
  • हिमंता बिस्वा सरमा का दूसरे कार्यकाल का मुख्य फोकस पहले कार्यकाल के कामों को जमीन पर लागू करना होगा
  • एनआरसी, अवैध घुसपैठ और नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे संवेदनशील मुद्दे सरकार की प्रमुख चुनौतियां बनी रहेंगी
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नई दिल्ली:

जिन तीन राज्यों में बीजेपी या उसके गठबंधन की जीत हुई है,उनमें एक असम भी है. यहां भी बीजेपी ने पश्चिम बंगाल की तरह प्रचंड जीत हासिल की है. इस जीत के नायक रहे हिमंता बिस्वा सरमा आज दूसरी बार प्रदेश की कमान संभालने से पहले शपथ लेंगे. बंगाल के बाद फिर एक बार भाजपा के कद्दावर नेताओं का महाजुटान होगा. असम सीएम से इस बार पहले से ज्यादा अपेक्षाएं जुड़ी हुई हैं. सीएम हिमंता के शब्दों में भी वह दिखता है जिसमें उन्होंने कहा कि सरकार का अगला चरण बड़े‑बड़े ऐलानों का नहीं, बल्कि पहले कार्यकाल में शुरू किए गए कामों को जमीन पर उतारने का होगा. बीजेपी के अन्य नेताओं ने भी इसी बात को दोहराया है कि वे नहीं चाहते कि सरकार का दूसरा कार्यकाल सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रह जाए. अब जनता जमीनी स्तर पर काम और ठोस सुधार, खासकर शहरी बुनियादी ढांचे में बदलाव, देखना चाहती है.

समर्थन, आलोचना और आगे की चुनौतियां: हिमंता बिस्वा सरमा का दूसरा कार्यकाल

बीजेपी समर्थकों का कहना है कि हिमंता बिस्वा सरमा सीधे और स्पष्ट तरीके से उन मुद्दों पर बोलते हैं, जिन्हें वे असम के लिए अहम मानते हैं, खासकर माइग्रेशन और जमीन पर दबाव जैसे विषय. वहीं, आलोचक उन पर राजनीति को ध्रुवीकरण की ओर ले जाने और इस्लामोफोबिया के आरोप लगाते हैं. अब जब उनके दूसरे कार्यकाल की बात आती है, तो यह साफ है कि सरकार को कई संवेदनशील और राजनीतिक रूप से अहम मुद्दों पर कसौटी पर परखा जाएगा.इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं.

➔एनआरसी (NRC)
➔अवैध घुसपैठ
➔नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA)

ये मुद्दे वर्षों से असम की राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं और सामाजिक तौर पर भी बेहद संवेदनशील बने हुए हैं. बीजेपी समर्थकों को उम्मीद है कि इस बार सरकार अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर पहले की सरकारों के मुकाबले ज्यादा साफ और सख्त रुख अपनाएगी. इसके उलट, राजनीतिक आलोचकों का कहना है कि इन नीतियों के क्रियान्वयन में समस्याएं आई हैं और इससे राज्य में सामाजिक तनाव भी बढ़ा है.
अब सबकी नजर इस पर है कि हिमंता बिस्वा सरमा का दूसरा कार्यकाल इन लंबे समय से चले आ रहे और अधूरे मुद्दों को किस तरह संभालता है.

हिमंता बिस्वा सरमा की शैली और दूसरे कार्यकाल की चुनौती

हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीतिक शैली हमेशा से मिश्रित प्रतिक्रियाएं पैदा करती रही है. उनके समर्थक उन्हें ऊर्जावान, सुलभ और तेज‑तर्रार नेता मानते हैं,वहीं विरोधी उन्हें ज्यादा आक्रामक, टकरावपूर्ण और केंद्रीकृत नेतृत्व वाला नेता कहते हैं. असम की राजनीति को कवर करने वाले पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य में शायद ही कोई राजनीतिक चर्चा होती हो जो किसी न किसी रूप में हिमंता बिस्वा सरमा पर आकर खत्म न होती हो.यही उनकी सबसे बड़ी खासियत और रहस्य भी है. अब जब वह दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की तैयारी कर रहे हैं, तो ध्यान धीरे‑धीरे चुनावी वादों और राजनीतिक बयानबाजी से हटकर शासन, जमीनी काम और नीतियों के क्रियान्वयन पर केंद्रित होगा.

राजनीतिक जीवन इतना आसान और सीधा नहीं 

कांग्रेस से राजनीतिक सफर शुरू कर कई महत्वपूर्ण पद संभालने के बाद, करीब एक दशक पहले बीजेपी में शामिल हुए हिमंता बिस्वा सरमा की यात्रा काफी लंबी रही है.हालांकि उन्होंने राजनीति में जल्दी कदम रखा था, लेकिन उनका यह सफर कभी भी आसान या सीधा नहीं रहा.मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ.1990 के दशक में कांग्रेस से जुड़े और 2001 में जलुकबाड़ी विधानसभा सीट से जीतकर विधायक बने. तरुण गोगोई सरकार के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली, जिनमें स्वास्थ्य,वित्त,शिक्षा और लोक निर्माण विभाग (PWD) शामिल थे.

2021 में वह पहली बार असम के मुख्यमंत्री बने. कांग्रेस में उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत काफी जल्दी हो गई थी और धीरे‑धीरे वह राज्य के सबसे तेज और प्रभावशाली संगठनकर्ताओं में गिने जाने लगे. तरुण गोगोई सरकार के दौरान उन्होंने अपने प्रभाव क्षेत्र को लगातार बढ़ाया और 2010 के शुरुआती वर्षों तक गुवाहाटी के राजनीतिक गलियारों में उन्हें गोगोई के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाने लगा था.

कांग्रेस से असंतुष्ट और बीजेपी के हो गए हिमंता

कांग्रेस के भीतर लंबे समय से चल रहे आंतरिक मतभेद (dissidence) के बाद आखिरकार हिमंता बिस्वा सरमा का पार्टी से संबंध टूट गया और उन्होंने बीजेपी का रुख कर लिया. इस बदलाव में वंशवाद (dynastic politics) एक अहम वजह माना गया.उस समय मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी कर लौटे थे और कांग्रेस के भीतर उनके पक्ष में पक्षपात को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं. कई लोगों का मानना था कि कांग्रेस में रहते हुए हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीतिक प्रगति ठहरने लगी थी, जिसके बाद उन्होंने यह बड़ा निर्णय लेकर पार्टी बदल दी.उनका कांग्रेस से बीजेपी में जाना असम की राजनीति में बड़ा झटका साबित हुआ.यह कदम काफी अप्रत्याशित था और इसका कांग्रेस पर गहरा असर पड़ा. कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पार्टी उस विभाजन से पूरी तरह कभी उबर नहीं पाई और संगठन में उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की गई.

हिमंता बिस्वा सरमा: प्रभाव और नेतृत्व की पहचान

शायद यही बात हिमंता बिस्वा सरमा की सबसे बड़ी ताकत है.आप उन्हें पसंद कर सकते हैं या नापसंद, लेकिन नजरअंदाज नहीं कर सकते.
बीजेपी में शामिल होने के बाद उनका राजनीतिक कद बहुत तेजी से बढ़ा.वह जल्दी ही एक क्षेत्रीय नेता से आगे बढ़कर उत्तर‑पूर्व के सबसे प्रभावशाली नेताओं और रणनीतिकारों में शामिल हो गए. उन्होंने खुद को ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया, जो लगातार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चाओं में बने रहते हैं और जिनकी वजह से उत्तर‑पूर्व को राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा पहचान मिली.

बीजेपी नेतृत्व ने भी उन पर भरोसा करते हुए उन्हें असम से बाहर पार्टी को मजबूत करने की जिम्मेदारी दी. समय के साथ हिमंता बिस्वा सरमा चुनावी रणनीति और राजनीतिक बातचीत के अहम चेहरा बन गए, खासकर मुश्किल हालात में. उनकी बातों और फैसलों का असर इतना बढ़ गया कि उन्हें अनदेखा करना अब संभव नहीं रहा.

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नीतियां, उपलब्धियां और विवाद

हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार की एक अहम रणनीति लगातार जनता के बीच मौजूदगी और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए जुड़ाव बढ़ाना रही. ओरुनोदॉय (Orunodoi) और निजुत मोइना (Nijut Moina) जैसी योजनाओं ने राज्य के कम आय वाले परिवारों और महिलाओं के बीच बीजेपी का मजबूत समर्थन आधार तैयार किया.इन योजनाओं को असम में बीजेपी के लिए गेम‑चेंजर माना गया. हालांकि, उनके कार्यकाल में सब कुछ आसान नहीं रहा.उनकी राजनीति को लेकर लगातार आलोचनाएं भी होती रहीं, खासकर इसे ध्रुवीकरण (polarising) वाली राजनीति बताया गया.

अवैध कब्जों के खिलाफ चलाए गए अभियान (eviction drives), पुलिस कार्रवाई का तरीका और अवैध घुसपैठ के खिलाफ सख्त रुख, इन सभी को लेकर विरोध होता रहा और आरोप लगे कि ये कदम मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने वाले हैं. इन विवादों का असर यह भी रहा कि अल्पसंख्यक समुदायों का पूरा भरोसा उनके पक्ष में नहीं आया, यहां तक कि उनके अपने विधानसभा क्षेत्र के कुछ हिस्सों में भी इसका असर देखा गया. ये मुद्दे सिर्फ असम तक सीमित नहीं रहे, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर बहस का कारण बने और उनके कार्यकाल को लेकर काफी चर्चा और विवाद दोनों साथ‑साथ चलते रहे.

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