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गौरव गोगोई का रवैया, आलाकमान की उपेक्षा या निजी महत्वाकांक्षा: असम कांग्रेस के बड़े नेताओं के मोहभंग की इनसाइड स्टोरी 

गौरव के करीबियों को लगता है कि जिस तरह भूपेन बोरा और प्रद्युत बोरदोलोई जैसे बड़े नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी है उससे गौरव गोगोई कमजोर नहीं बल्कि सही साबित हुए हैं. आज असम में गौरव गोगोई की छवि एक “अकेले योद्धा” की है.

गौरव गोगोई का रवैया, आलाकमान की उपेक्षा या निजी महत्वाकांक्षा: असम कांग्रेस के बड़े नेताओं के मोहभंग की इनसाइड स्टोरी 
  • असम में कांग्रेस नेताओं के पार्टी छोड़ BJP में शामिल होने से गौरव गोगोई की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं.
  • कांग्रेस ने गौरव गोगोई को असम का प्रदेशाध्‍यक्ष बनाया, जिससे उनके पिता की विरासत और अहोम समुदाय को साध सकें.
  • कई वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी और उनके मुद्दों को गौरव गोगोई ने नजरअंदाज किया, जिससे पार्टी में असंतोष बढ़ा है.
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राजनीति में दलबदल कोई नई बात नहीं है, लेकिन असम कांग्रेस में जिस तरह बड़े नेता एक–एक कर पार्टी छोड़ रहे हैं उससे प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई के नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. कांग्रेस आलाकमान ने करीब दस महीने पहले तीन बार के लोकसभा सांसद गौरव गोगोई को असम प्रदेश की कमान सौंपी थी. कांग्रेस की रणनीति विधानसभा चुनाव में गौरव के जरिए उनके पिता और पंद्रह साल असम के मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई की विरासत और अहोम समुदाय को साधने की थी, लेकिन विधानसभा चुनाव करीब आते ही असम कांग्रेस के बड़े–बड़े नेताओं का पार्टी छोड़ कर बीजेपी में शामिल होने का सिलसिला शुरू हो गया. 

फरवरी में असम कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा बीजेपी में शामिल हो गए और महीने भर के भीतर नौगांव से सांसद प्रद्युत बोरदोलोई ने अब बीजेपी का दामन थाम लिया है. उनके साथ असम प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष नबज्योति तालुकदार भी सत्ताधारी पार्टी में शामिल हो गए. इससे पहले कांग्रेस के पांच मौजूदा विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं. 

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क्‍यों छोड़ी कांग्रेस? ये बताया कारण 

कांग्रेस छोड़ने वाले नेताओं ने अपनी-अपनी वजह बताई है. प्रद्युत बोरदोलोई अपने इलाके की एक सीट से विधायक आसिफ नजर की टिकट कटवाना चाहते थे. उनका आरोप है कि पंचायत चुनाव के समय आसिफ ने अपने करीबी से उनपर हमला करवाया. वहीं, भूपेन बोरा ने असम कांग्रेस में सांसद रकीबुल हुसैन के बढ़ते प्रभाव को अपने इस्तीफे की वजह बताया. दोनों नेताओं ने सीधे तौर पर गौरव गोगोई को पार्टी छोड़ने की वजह नहीं बताया है, लेकिन कहीं न कहीं इन सबकी जड़ में गौरव गोगोई का बढ़ता कद है. 

असम कांग्रेस पर धुबरी से सांसद रकीबुल हुसैन के नियंत्रण का मुद्दा हो या विधायक आसिफ नजर का मामला, असम कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो वरिष्ठ नेताओं की पनपती नाराजगी को गौरव गोगोई ने नजरअंदाज़ किया. ये अलग बात है कि भूपेन बोरा से लेकर प्रद्युत बोरदोलोई तक को मनाने के लिए गौरव गोगोई, प्रभारी जितेंद्र सिंह के साथ इन नेताओं के घर भी गए और बाद में सधी हुई प्रतिक्रिया दी. 

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Photo Credit: X/@GauravGogoiAsm

गौरव को पिता की विरासत का लाभ 

भले ही गौरव गोगोई 2014 से ही लोकसभा सांसद हों लेकिन उनके पास संगठन का काम करने का अनुभव नहीं है. उन्होंने एनएसयूआई, यूथ कांग्रेस में काम नहीं किया है. अपने सीएम पिता के कारण सीधे सांसद बने और अब प्रदेश अध्यक्ष हैं. आरोप लगाया जाता है कि उनकी जगह असम कांग्रेस के अहम राजनीतिक फैसले रकीबुल हुसैन करते हैं. 

रकीबुल हुसैन का प्रदेश में बढ़ता कद  

रकीबुल हुसैन के बढ़ते प्रभाव की दो मुख्य वजहें हैं. वो पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के करीबी रहे हैं. 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव में जब गौरव गोगोई कलियाबोर सीट से जीते तो उसमें रकीबुल हुसैन की अहम भूमिका थी. इसके अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव में रकीबुल हुसैन ने धुबरी सीट एआईयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल को करीब दस लाख वोटों से हरा दिया. इसके बाद वो कांग्रेस आलाकमान की नजरों में आ गए और उनकी अहमियत बढ़ती गई. 

गौरव गोगोई की कार्यशैली की बात करें तो असम कांग्रेस के एक नेता ने बताया, “गौरव गोगोई के काम करने का तरीका नेताओं की बजाय बॉस वाला है. राजनीति में आदेश देकर नहीं सम्मान देकर काम लिया जाता है, लेकिन गौरव में सुनने की क्षमता और विनम्रता की कमी है. वो बुरा नहीं लेकिन रूखा व्यवहार करते हैं. इन वजहों से वो पार्टी पर पकड़ नहीं बना पा रहे हैं. शायद सबको किनारे लगाकर वो 2031 विधानसभा चुनाव की तैयारी में लगे हैं!”

वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा या महत्वाकांक्षा

असम कांग्रेस के सारे नेता गौरव गोगोई से काफी वरिष्ठ हैं. प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद गौरव गोगोई युवा नेताओं को आगे बढ़ा कर अपनी टीम बना रहे थे और पुराने नेता किनारे लगाए जा रहे थे. विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने से भूपेन बोरा अपमानित महसूस कर रहे थे. वो बीते दो बार से विधानसभा चुनाव हार रहे थे. कांग्रेस के अनुभवी ओबीसी नेता की नाराजगी का फायदा उठाने में सीएम हिमंता बिस्वा सरमा देर क्यों करते ! 

इसी तरह मुस्लिम बहुल नौगांव सीट से सांसद प्रद्युत बोरदोलोई का अपने क्षेत्र के ही मुस्लिम विधायक से विवाद हो चुका था. उन्हें यह भी महसूस हो रहा था कि राज्य और केंद्र की सत्ता में कांग्रेस की जल्द वापसी की संभावना कम है. माना जा रहा है सियासी महत्वाकांक्षा के मद्देनजर प्रद्युत को लगा कि पुराने साथी हिमंता से हाथ मिलाने का यह सही समय है. दूसरी तरफ प्रद्युत और भूपेन के कांग्रेस से अलग होने के साथ ही सीएम हिमंता बिस्वा सरमा यह संदेश देने में जुटे हैं कि रकीबुल हुसैन के कारण असम के बड़े हिंदू नेता कांग्रेस छोड़ रहे हैं. उन्हें लगता है कि इससे हिंदू ध्रुवीकरण करने में मदद मिलेगी. 

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Photo Credit: IANS

राजा और राजकुमार का पेंच

असम कांग्रेस से बड़े नेताओं की विदाई के लिए प्रभारी जितेंद्र सिंह को भी जिम्मेवार माना जा रहा है. वो पिछले विधानसभा चुनाव से ही असम के प्रभारी हैं, लेकिन फिर भी उनसे संपर्क करने के लिए नेताओं को इंतजार करना पड़ता है. जितेंद्र सिंह राजस्थान के अलवर से आते हैं और पूर्व राज परिवार से ताल्लुक रखते हैं.

असम कांग्रेस के एक नेता तंज कसते हुए कहते हैं कि हम एक साथ एक राजा (जितेंद्र सिंह) और एक राजकुमार (गौरव गोगोई) का सामना कर रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि राजा और राजकुमार में भी आपसी मनमुटाव है. इसीलिए टिकट बंटवारे की जिम्मेदारी प्रियंका गांधी ने संभाली. 

बहरहाल, संगठन के विवादों को सुलझाने को लेकर कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल का रिपोर्ट कार्ड भी अच्छा नहीं है. बताया जाता है प्रद्युत बारदोलोई मिलकर बात करने के लिए वेणुगोपाल के घर गए लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई. 

गौरव गोगोई की मजबूत इमेज 

गौरव गोगोई की बात करें तो उनके सियासी सफर का सकारात्मक पहलू भी है. पिता तरुण गोगोई की वजह से उनकी शुरुआत सीधे संसद से जरूर हुई, लेकिन लोकसभा में अपनी गंभीरता और भाषण शैली से गौरव गोगोई ने अपनी अलग पहचान बनाई है. तभी 2019 से वो लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता हैं. 2024 लोकसभा चुनाव में परिसीमन के कारण उन्हें नई सीट चुननी थी. वो नौगांव से लड़ना चाहते थे लेकिन पार्टी ने उन्हें जोरहाट से लड़ने को कहा, जहां लड़ाई आसान नहीं थी. हालांकि गौरव ने जोरहाट जैसी कठिन सीट पर जीत दर्ज कर खुद को साबित किया. 

गौरव गोगोई की छवि ईमानदार नेता की है. कांग्रेस ने उन्हें पूर्व में बंगाल का प्रभारी बनाया और बीते राजस्थान चुनाव में स्क्रीनिंग कमेटी प्रमुख की जिम्मेदारी सौंपी. गोगोई ने अपने काम से आलाकमान का भरोसा जीता है. 

गौरव गोगोई के एक करीबी दावा करते हैं कि वो पूरे असम में सीएम हिमंता के बाद सबसे लोकप्रिय चेहरे हैं. भले ही उनकी उम्र कम है, लेकिन उन्हें एहसास था कि कांगेस के कई वरिष्ठ नेता और विधायक सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के संपर्क में हैं जो आगे चलकर गच्चा दे सकते हैं. इसीलिए उन्होंने अपनी अलग रणनीति पर काम किया. उन्होंने क्षेत्रीय दलों के साथ मजबूत गठबंधन बनाया. साथ ही पार्टी में टिकट बंटवारे का काम बेहतर तरीके से अंजाम दिया. 

गौरव के करीबियों को लगता है कि जिस तरह भूपेन बोरा और प्रद्युत बोरदोलोई जैसे बड़े नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी है उससे गौरव गोगोई कमजोर नहीं बल्कि सही साबित हुए हैं. आज असम में गौरव गोगोई की छवि एक “अकेला योद्धा” की है. सीएम उन पर निजी हमले करते हैं, अपने साथी लड़ाई का मैदान छोड़ कर विरोधी से जा मिले हैं. इससे अहोम समुदाय के लोगों में गौरव गोगोई को सहानुभूति मिल सकती है और कांग्रेस को बीजेपी के धार्मिक ध्रुवीकरण वाले दांव की काट. गौरव गोगोई खुद जोरहाट से विधानसभा का चुनाव भी लड़ रहे हैं. 

राज्य में दस सालों से बीजेपी की सरकार है. उससे पहले पंद्रह सालों तक तरुण गोगोई मुख्यमंत्री थे. उनके बेटे गौरव गोगोई अब असम में कांग्रेस के निर्विवाद नेता बन गए हैं, लेकिन इससे पार्टी को कितना लाभ या नुकसान हुआ है ये चुनाव नतीजों में ही स्पष्ट होगा. असम में 9 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे और 4 मई को नतीजे आएंगे.
 

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