उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने अपनी राजनीतिक सक्रियता काफी पहले ही तेज कर दी है. चुनाव में अभी लगभग 7 महीने का समय बाकी है, लेकिन ओवैसी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अपना मुख्य रणनीतिक केंद्र बनाकर ताबड़तोड़ रैलियां शुरू कर दी हैं. 15 जून को बहराइच से 'मिशन यूपी 2027' का शंखनाद करने के बाद 18 जुलाई को सहारनपुर में जनसभा और इसके बाद मुरादाबाद में प्रस्तावित कार्यक्रमों के जरिए ओवैसी पार्टी की जमीन मजबूत करने में जुटे हैं.
पश्चिमी यूपी का क्या है समीकरण?
उत्तर प्रदेश में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रोहिलखंड के क्षेत्र मुस्लिम और दलित आबादी के लिहाज से बेहद संवेदनशील और राजनीतिक रूप से निर्णायक माने जाते हैं. ओवैसी की इस नई कवायद के पीछे का मकसद इन क्षेत्रों का खास समीकरण साधना और रणनीति के तहत मुस्लिम मतदाताओ तक पहुंचने का है. उत्तर प्रदेश के बहराइच की बात करें अगर तो यहां करीबन मुस्लिम आबादी लगभग 33.5% है. AIMIM ने इसी को आधार बनाकर प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली को मटेरा विधानसभा सीट से संभावित उम्मीदवार घोषित भी कर दिया है.
वहीं सहारनपुर की बात की जाए तो यहां लगभग 41.95% मुस्लिम आबादी है. देवबंद और बेहट जैसी विधानसभा सीटें पूरी तरह मुस्लिम मतदाताओं के रुख पर निर्भर करती हैं. मुरादाबाद और रोहिलखंड, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, अमरोहा और रामपुर जैसे जिलों में मुस्लिम और दलित (जाटव) आबादी का बड़ा हिस्सा है. ओवैसी का प्रयास इसी 'मुस्लिम-दलित' गठजोड़ को अपने पाले में लाने का है. मुस्लिम मतदाताओं के साथ-साथ ओवैसी अपनी पार्टी का संगठन भी मजबूत करने में जुटे हैं.
संगठन का विस्तार
पार्टी सूत्रों और जानकारों के मुताबिक ओवैसी की पार्टी उत्तर प्रदेश चुनाव को देखते हुए एक ब्लू प्रिंट को तैयार कर चुकी है. पार्टी सूत्रों के अनुसार यूपी की लगभग 200 विधानसभा सीटों पर सक्रिय रूप से संगठन खड़ा करने की योजना को तैयार किया गया है. नगर निकाय और पंचायत स्तर पर नए चेहरों को आगे लाकर स्थानीय नेतृत्व तैयार किया जा रहा है.
गठबंधन के लिए भी ओवैसी इंतज़ार में
असदुद्दीन ओवैसी ने कुछ दिन पहले पहले कहा था कि भाजपा को हराने के लिए वह गठबंधन करने को भी तैयार हैं, लेकिन यह केवल 'वोट ट्रांसफर' करने वाली भूमिका में नहीं होगा. हिस्सेदारी बराबरी और सम्मान के आधार पर होनी चाहिए ताकि मुस्लिम समाज को स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सके.
गठबंधन का इतिहास
AIMIM ने 2022 में बाबू सिंह कुशवाहा और वामन मेश्राम के साथ 'भागीदारी परिवर्तन मोर्चा' बनाया था। वहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव में पल्लवी पटेल की अपना दल (कमेरावादी) के साथ मिलकर PDM (पिछड़ा-दलित-मुस्लिम) का प्रयोग किया. हालांकि चुनावी नतीजों में सफलता हाथ नहीं लगी. गठबंधन का प्रयोग फेल होता दिखाई दिया. लेकिन एक बार फिर AIMIM नए प्रयोग के साथ कोशिश में जुटी दिखाई दे रही हैं.
यूपी की राजनीति पर प्रभाव और सपा-कांग्रेस के खेल पर असर
उत्तर प्रदेश में AIMIM का चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड अब तक खाली रहा है. 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 95 सीटों पर किस्मत आजमाई, लेकिन 4.5 लाख वोटों के साथ एक भी सीट नहीं जीत सकी. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी खाता नहीं खुला. राजनीतिक जानकारों का कहना है बिहार, महाराष्ट्र चुनाव लड़ने के बाद इस बार ओवैसी का फोकस यूपी में खुद को कड़ा करने का है. अब यह कोशिश कितनी कामयाब होगी यह आने वाला वक्त बताएगा. वहीं चुनाव से पहले अपनी सांगठनिक ताकत और जनाधार को इतना मजबूत कर लेना चाहते हैं कि यदि 2027 के चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी (SP) या कांग्रेस जैसे बड़े विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की नौबत आए तो AIMIM सौदेबाजी की मजबूत स्थिति में हो.
जीतेंगे नहीं, पर खेल बिगाड़ सकते हैं असदुद्दीन ओवैसी
यदि वे अकेले भी लड़ते हैं, तो पश्चिमी यूपी में उनका मजबूत होना सीधे तौर पर सपा-कांग्रेस गठबंधन के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा सकता है. जिससे राज्य का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल जाएगा. ओवैसी के यूपी में दाखिल होते ही सपा और कांग्रेस की मुसीबत बढ़ती दिखाई दे सकती हैं, सपा और कांग्रेस का भी मुस्लिम वोटर हैं. वहीं ओवैसी भी मुस्लिम मतदाताओं तक पहुचने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं. खास तौर पर मौजूदा वक्त में देखें तो पश्चिम उत्तर प्रदेश में इससे ज़्यादा नुक़सान सपा और फिर कांग्रेस को होने की संभावना है. वहीं आने वाले यूपी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र अलग-अलग दल अपनी तमाम कोशिशों में जुटे दिखाई दे रहे हैं, लेकिन देखना होगा की यह रणनीति और कोशिशें किस और पार्टियो को लेकर जाती हैं.
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