- कोरवा में IRRPL ने पूरी तरह भारतीय पुर्जों से 'शेर' राइफल बनाई, पहले 50% पार्ट्स इंपोर्टेड होते थे.
- INSAS की जाम होने की शिकायत के बाद AK-203 को लाया गया.
- सितंबर 2026 में आर्मी ट्रायल होंगे, दिसंबर 2030 तक रोज 600 राइफल बनाने का लक्ष्य.
उत्तर प्रदेश के अमेठी की कोरवा ऑर्डनेंस फैक्ट्री ने INSAS राइफल को बदलने की भारत की कोशिश में एक अहम मुकाम हासिल किया है. भारत ने पूरी तरह से स्वदेशी पुर्जों से बनी AK-203 राइफल विकसित की है, जिसमें कोई भी हिस्सा बाहर से नहीं मंगाया गया है. इसका नाम 'शेर' रखा गया है. इस राइफल को इंडो-रशियन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड (IRRPL) में बनाया गया है. यह कंपनी एक जॉइंट वेंचर है, जो 2019 से भारत में AK-203 राइफलें बना रही है. इस राइफल का कोरवा में सफलतापूर्वक फायरिंग ट्रायल किया गया है, जिसमें ऑटोमैटिक और बर्स्ट फायरिंग भी शामिल है.
क्यों अलग है AK-203 राइफल?
भारत में पहले से बनी हजारों AK-203 राइफलों के मुकाबले यह नई राइफल इसलिए अलग है क्योंकि इसमें इस्तेमाल होने वाले सभी पार्ट्स और रॉ मटीरियल देश में ही तैयार किए गए हैं. यह कामयाबी डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है. सेना लंबे वक्त से INSAS राइफल को बदलने की कोशिश कर रही थी, क्योंकि सैनिकों ने ठंड के मौसम में राइफल के जाम होने और मैगजीन के चटकने जैसी कई शिकायतें की थीं.
साल 2024 से सेना को सौंपी गई पहली राइफलें इंपोर्टेड 'नॉक-डाउन किट' का इस्तेमाल करके बनाई गई थीं और धीरे-धीरे इनमें भारतीय पुर्जों का इस्तेमाल बढ़ाया गया.
IRRPL के CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर, मेजर जनरल एसके शर्मा ने कहा कि इस कामयाबी में राइफल के हर हिस्से को भारत में ही बनाना शामिल था, न कि सिर्फ उसे यहां असेंबल करना. AK-203 में करीब 50 मुख्य हिस्से, करीब 180 सब-कंपोनेंट और 120 मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस शामिल हैं. एसके शर्मा ने बताया कि हर हिस्से और प्रोसेस को धीरे-धीरे स्थानीय स्तर पर तैयार करने की जरूरत थी.
IRRPL को 2023-24 में अपने रूसी पार्टनर से टेक्नोलॉजी का पूरा ट्रांसफर मिला. हालांकि, मिलिट्री स्टैंडर्ड के हिसाब से पार्ट्स बनाने में सक्षम भारतीय वेंडर बेस तैयार करने में और वक्त लगा. लोकलाइजेशन प्रोग्राम कई चरणों में पूरा किया गया, जिसमें वेंडर डेवलपमेंट, इम्पोर्ट किए गए पार्ट्स की जगह भारतीय-निर्मित विकल्प लाना और देश में ही टेस्टिंग और क्वालिटी-कंट्रोल प्रोसेस बनाना शामिल था.
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AK-203 में कौन सा सिस्टम काम करता है?
AK-203 एक गैस-ऑपरेटेड, मैगजीन-फेड असॉल्ट राइफल है, जो 7.62x39 mm कार्ट्रिज के लिए बनी है और यह कलाश्निकोव AK-100 सीरीज का हिस्सा है. इसमें फोल्डिंग और एडजस्टेबल स्टॉक, आरामदायक ग्रिप और मॉडर्न ऑप्टिकल व अन्य एक्सेसरीज लगाने के लिए डिजाइन किया गया रेल सिस्टम है. इस राइफल का मकसद आखिरकार भारतीय सेना में INSAS की जगह लेना है.
नई समय-सीमा को पूरा करने के लिए, कोरवा प्लांट को हर दिन करीब 600 राइफलें बनानी होंगी, यानी लगभग हर 100 सेकंड में एक राइफल.
असेंबली से पूरी तरह से देश में ही मैन्युफैक्चरिंग करने की प्रक्रिया में कई साल लग गए. कंपनी के मुताबिक, 2025 के मध्य तक इसमें घरेलू हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी थी, जो अब 100 फीसदी हो गई है.
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